अन-नहल · 48/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَىٰ مَا خَلَقَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ يَتَفَيَّأُ ظِلَالُهُ عَنِ الْيَمِينِ وَالشَّمَائِلِ سُجَّدًا لِّلَّهِ وَهُمْ دَاخِرُونَ ۝٤٨
Awa lam yaraw ilaa maa khalaqal laahu min shai`iny-yatafaiya`u zilaaluhoo `anil yameeni washshamaaa` ili sujjadal lillaahi wa hum daakhiroon
📖 हिंदी अर्थ
क्या उन लोगों ने ख़ुदा की मख़लूक़ात में से कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जिसका साया (कभी) दाहिनी तरफ और कभी बायीं तरफ पलटा रहता है कि (गोया) ख़ुदा के सामने सर सजदा है और सब इताअत का इज़हार करते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَتَفَيَّأُ – लौटना, पलटना, इधर-उधर झुकना (छाया का एक ओर से दूसरी ओर खिसकना)।
  • ظِلَالُهُ – उसकी छायाएँ (बहुवचन)।
  • عَنِ الْيَمِينِ وَالشَّمَائِلِ – दाएँ और बाएँ ओर से (अर्थात् छाया का दाएँ-बाएँ झुकना)।
  • سُجَّدًا – सजदा करते हुए, झुकते हुए, आज्ञाकारी होकर।
  • دَاخِرُونَ – दबे-कुचले, अपमानित, पूर्ण रूप से वशीभूत।

तफ़सीर:

क्या इन इनकार करने वालों ने कभी आँखें खोलकर अल्लाह की बनाई हुई चीज़ों को नहीं देखा? पहाड़, पेड़, इमारतें — हर उस चीज़ को जिसकी छाया बनती है — वह छाया सुबह से शाम तक लगातार बदलती रहती है। पहले दाईं ओर झुकती है, फिर बाईं ओर खिसकती है, और यह क्रम सूरज और चाँद की गति के साथ बदलता रहता है। यह छायाओं का यह निरंतर बदलना और झुकना किसी यादृच्छिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उनका अपने रब के प्रति सजदा है — वे अल्लाह के आगे पूरी तरह झुकी हुई हैं, उसकी आज्ञा के प्रति समर्पित हैं। वे चीज़ें जिन्हें देखकर भी ये लोग सबक नहीं लेते, वे स्वयं अपनी छाया के माध्यम से अल्लाह की अज़मत का इज़हार कर रही हैं। वे पूरी तरह वशीभूत हैं, उनके सामने कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, बल्कि वे हर पल उसी के इशारे पर चल रही हैं। यह दृश्य हर रोज़ सामने आता है, फिर भी इनकार करने वाले इससे सबक नहीं लेते।


फ़ायदे:

  1. क़ुदरत-ए-इलाही पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र की तरग़ीब: यह आयत हमें सिखाती है कि ब्रह्मांड की हर चीज़ — यहाँ तक कि छाया का बदलना भी — अल्लाह की क़ुदरत की निशानी है। जो लोग सोचते हैं कि यह सब अपने आप हो रहा है, वे ग़लत हैं। हर पल, हर गति में अल्लाह का हुक्म चल रहा है।
  2. विनम्रता और समर्पण का पाठ: जब पेड़, पहाड़ और हर चीज़ अपनी छाया के साथ अल्लाह के आगे झुकती है, तो इंसान को भी अपने रब के सामने विनम्र होना चाहिए। अगर बेजान चीज़ें उसकी आज्ञा का पालन करती हैं, तो इंसान जो अक्ल और समझ रखता है, उसे तो और भी अधिक समर्पण करना चाहिए।
  3. इस्लाम का सौंदर्य: इस्लाम सिखाता है कि पूरी कायनात एक ही रब की आज्ञा में बँधी हुई है — कोई अराजकता नहीं, कोई बेकार की चीज़ नहीं। यह विश्वास इंसान को एक सुव्यवस्थित, उद्देश्यपूर्ण और शांतिपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। जब इंसान यह देखता है कि हर चीज़ अल्लाह की तस्बीह कर रही है, तो उसका दिल भी उसी की याद में लग जाता है और उसे एक अजीब सुकून मिलता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 46-50 — अन-नहल

46أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِي تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُم بِمُعْجِزِينَ
उनके चलते फिरते (ख़ुदा का अज़ाब) उन्हें गिरफ्तार करे तो वह लोग उसे ज़ेर नहीं कर सकते
47أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ
या वह अज़ाब से डरते हो तो (उसी हालत में) धर पकड़ करे इसमें तो शक नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बड़ा शफीक़ रहम वाला है
48أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَىٰ مَا خَلَقَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ يَتَفَيَّأُ ظِلَالُهُ عَنِ الْيَمِينِ وَالشَّمَائِلِ سُجَّدًا لِّلَّهِ وَهُمْ دَاخِرُونَ
क्या उन लोगों ने ख़ुदा की मख़लूक़ात में से कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जिसका साया (कभी) दाहिनी तरफ और कभी बायीं तरफ पलटा रहता है कि (गोया) ख़ुदा के सामने सर सजदा है और सब इताअत का इज़हार करते हैं
49وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ مِن دَابَّةٍ وَالْمَلَائِكَةُ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ
और जितनी चीज़ें (चादँ सूरज वग़ैरह) आसमानों में हैं और जितने जानवर ज़मीन में हैं सब ख़ुदा ही के आगे सर सजूद हैं और फरिश्ते तो (है ही) और वह हुक्में ख़ुदा से सरकशी नहीं करते (49) (सजदा)
50يَخَافُونَ رَبَّهُم مِّن فَوْقِهِمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ۩
और अपने परवरदिगार से जो उनसे (कहीं) बरतर (बड़ा) व आला है डरते हैं और जो हुक्में दिया जाता है फौरन बजा लाते हैं
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अनुवाद — अन-नहल 48

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Tuesday, August 18, 2026

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