अन-नहल · 47/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ ۝٤٧
Aw yaakhuzahum `alaa takhawwuf; fa inna Rabbakum la Ra`oofur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
या वह अज़ाब से डरते हो तो (उसी हालत में) धर पकड़ करे इसमें तो शक नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बड़ा शफीक़ रहम वाला है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَخَوُّفٍ: डर की हालत में, या धीरे-धीरे कम करते हुए (नुक़्सान पहुँचाते हुए)।
  • لَرَءُوفٌ: बहुत ही दयालु और मेहरबान।
  • رَّحِيمٌ: अत्यंत दयावान, जो अपने बंदों पर रहम फ़रमाता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

क्या ये काफ़िर, जो अल्लाह के ख़िलाफ़ साज़िशें करते हैं और उसकी आयतों को झुठलाते हैं, इस बात से बेख़ौफ़ हो गए हैं कि अल्लाह उन्हें उस वक़्त पकड़ ले जब वे डर और ख़ौफ़ की हालत में हों? यानी अल्लाह उन्हें धीरे-धीरे नुक़्सान पहुँचाता है — उनके माल, जान, और फलों में कमी करता है — यहाँ तक कि वे हलाक हो जाएँ। या वह उन्हें उस हालत में अज़ाब दे जब वे उसके अज़ाब से डर रहे हों और उम्मीद कर रहे हों कि शायद अज़ाब न आए, लेकिन अचानक अज़ाब आ जाए। अल्लाह हर हाल में उन्हें पकड़ने पर पूरी तरह क़ादिर है, और वे उससे बचकर नहीं निकल सकते।

लेकिन अल्लाह तआला अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है, इसलिए वह जल्दी अज़ाब नहीं भेजता और उन्हें मोहलत देता है, ताकि वे तौबा कर लें और अपनी ग़लतियों से बाज़ आ जाएँ। अगर वह चाहता तो उन्हें फ़ौरन पकड़ लेता, लेकिन उसकी रहमत और शफ़्क़त उन्हें मोहलत देने पर मजबूर करती है।

फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह तआला की रहमत बेहद वसीअ है — वह गुनाहगारों को भी मोहलत देता है ताकि वे पलट आएँ, और यह उसकी मेहरबानी की निशानी है।
  2. अल्लाह की पकड़ कभी भी और किसी भी हालत में आ सकती है, इसलिए इंसान को हर वक़्त उससे डरते रहना चाहिए और उसकी नाफ़रमानी से बचना चाहिए।
  3. अल्लाह का डर और उसकी रहमत की उम्मीद — दोनों एक साथ होने चाहिए। डर इसलिए कि वह क़ादिर है, और उम्मीद इसलिए कि वह रहीम है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की पनाह में रहना ही सबसे बड़ी नेमत है, और उसकी रहमत से मायूस होना गुनाह है।
🎧 सुनें

📜 आयत 45-49 — अन-नहल

45أَفَأَمِنَ الَّذِينَ مَكَرُوا السَّيِّئَاتِ أَن يَخْسِفَ اللَّهُ بِهِمُ الْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ
तो क्या जो लोग बड़ी बड़ी मक्कारियाँ (शिर्क वग़ैरह) करते थे (उनको इस बात का इत्मिनान हो गया है (और मुत्तलिक़ ख़ौफ नहीं) कि ख़ुदा उन्हें ज़मीन में धसा दे या ऐसी तरफ से उन पर अज़ाब आ पहुँचे कि उसकी उनको ख़बर भी न हो
46أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِي تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُم بِمُعْجِزِينَ
उनके चलते फिरते (ख़ुदा का अज़ाब) उन्हें गिरफ्तार करे तो वह लोग उसे ज़ेर नहीं कर सकते
47أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ
या वह अज़ाब से डरते हो तो (उसी हालत में) धर पकड़ करे इसमें तो शक नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बड़ा शफीक़ रहम वाला है
48أَوَلَمْ يَرَوْا إِلَىٰ مَا خَلَقَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ يَتَفَيَّأُ ظِلَالُهُ عَنِ الْيَمِينِ وَالشَّمَائِلِ سُجَّدًا لِّلَّهِ وَهُمْ دَاخِرُونَ
क्या उन लोगों ने ख़ुदा की मख़लूक़ात में से कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जिसका साया (कभी) दाहिनी तरफ और कभी बायीं तरफ पलटा रहता है कि (गोया) ख़ुदा के सामने सर सजदा है और सब इताअत का इज़हार करते हैं
49وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ مِن دَابَّةٍ وَالْمَلَائِكَةُ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ
और जितनी चीज़ें (चादँ सूरज वग़ैरह) आसमानों में हैं और जितने जानवर ज़मीन में हैं सब ख़ुदा ही के आगे सर सजूद हैं और फरिश्ते तो (है ही) और वह हुक्में ख़ुदा से सरकशी नहीं करते (49) (सजदा)
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अनुवाद — अन-नहल 47

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Tuesday, August 18, 2026

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