अल-इसरा · 29/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَّحْسُورًا ۝٢٩
Wa laa taj`al yadaka maghloolatan il `unuqika wa laa tabsut haa kullal basti fataq`uda maloomam mahsooraa
📖 हिंदी अर्थ
और अपने हाथ को न तो गर्दन से बँधा हुआ (बहुत तंग) कर लो (कि किसी को कुछ दो ही नहीं) और न बिल्कुल खोल दो कि सब कुछ दे डालो और आख़िर तुम को मलामत ज़दा हसरत से बैठना पड़े

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَغْلُولَةً: बंधी हुई, जकड़ी हुई (गले से हाथ बंधा होना कंजूसी की स्थिति को दर्शाता है)।
  • تَبْسُطْهَا: उसे फैलाना, यानी खर्च करने में पूरी तरह खुल जाना।
  • مَلُومًا: मलामत किया हुआ, जिसे लोग बुरा भला कहें।
  • مَحْسُورًا: थका-हारा, सख्त पछतावे की हालत में, या ऐसा व्यक्ति जिसके पास खर्च करने के लिए कुछ बचा ही न हो।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों को खर्च करने में सही दरमियाना रास्ता (संतुलन) अपनाने की शिक्षा देता है। वह फरमाता है कि न तो अपना हाथ गर्दन से बंधा हुआ रखो—यानी कंजूसी और तंगदिली से खर्च करना बंद कर दो, जिससे तुम खुद भी तंगी में रहो और दूसरों की मदद से भी वंचित रहो—और न ही इसे पूरी तरह खोल दो कि जो कुछ पास है सब कुछ एक साथ लुटा दो। क्योंकि इस अति-उदारता (फिजूलखर्ची) का अंजाम यह होगा कि तुम बाद में खाली हाथ रह जाओगे, लोग तुम्हें मलामत करेंगे कि तुमने अपनी हैसियत का ख्याल नहीं रखा, और तुम खुद भी पछतावे और हसरत (मायूसी) के साथ बैठे रहोगे, जबकि तुम्हारे पास खर्च करने के लिए कुछ नहीं बचेगा। यह आयत उस समय उतरी जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एक सवाल पूछने वाले को अपना कुर्ता दे दिया और उनके पास दूसरा कपड़ा न बचा, जिससे वे नमाज़ के लिए निकल पाते। इससे सबक यह है कि खर्च में न कंजूसी करनी चाहिए और न ही इस हद तक सखावत (दरियादिली) कि आदमी खुद ही मुहताज हो जाए।

फ़ायदे (सबक):

  1. इस्लाम दीन में संतुलन और इतिदाल (मध्यम मार्ग) की तालीम देता है—खर्च में भी और हर मामले में भी। कंजूसी और फिजूलखर्ची दोनों ही नापसंद हैं।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों की मदद करना अच्छा है, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारियों और हैसियत का ख्याल रखना भी ज़रूरी है, ताकि हम खुद किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत न आएं।
  3. अल्लाह तआला अपने बंदों की भलाई चाहता है—वह हमें ऐसे रास्ते पर चलने की हिदायत देता है जिससे हम दुनिया में इज़्ज़त से जिएं और आख़िरत में भी कामयाब हों।
  4. इससे पता चलता है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सखावत (दरियादिली) किस कदर थी कि वे अपनी ज़रूरत को भूलकर दूसरों को दे देते थे—यह हमारे लिए मोहब्बत और फ़िदा (त्याग) की आला मिसाल है।


📜 आयत 27-31 — सूरा अल-इसरा

27إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ ۖ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا
क्योंकि फुज़ूलख़र्ची करने वाले यक़ीनन शैतानों के भाई है और शैतान अपने परवरदिगार का बड़ा नाशुक्री करने वाला है
28وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ مِّن رَّبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُل لَّهُمْ قَوْلًا مَّيْسُورًا
और तुमको अपने परवरदिगार के फज़ल व करम के इन्तज़ार में जिसकी तुम को उम्मीद हो (मजबूरन) उन (ग़रीबों) से मुँह मोड़ना पड़े तो नरमी से उनको समझा दो
29وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَّحْسُورًا
और अपने हाथ को न तो गर्दन से बँधा हुआ (बहुत तंग) कर लो (कि किसी को कुछ दो ही नहीं) और न बिल्कुल खोल दो कि सब कुछ दे डालो और आख़िर तुम को मलामत ज़दा हसरत से बैठना पड़े
30إِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا
इसमें शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ (बढ़ा) देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग रखता है इसमें शक़ नहीं कि वह अपने बन्दों से बहुत बाख़बर और देखभाल रखने वाला है
31وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَاقٍ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَإِيَّاكُمْ ۚ إِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْئًا كَبِيرًا
और (लोगों) मुफलिसी (ग़रीबी) के ख़ौफ से अपनी औलाद को क़त्ल न करो (क्योंकि) उनको और तुम को (सबको) तो हम ही रोज़ी देते हैं बेशक औलाद का क़त्ल करना बहुत सख्त गुनाह है
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अनुवाद — अल-इसरा 29

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Thursday, October 1, 2026

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