अल-इसरा · 28/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ مِّن رَّبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُل لَّهُمْ قَوْلًا مَّيْسُورًا ۝٢٨
Wa immaa turidanna `anhumub tighaaa`a rahmatim mir rabbika tarjoohaa faqul lahum qawlam maisooraa
📖 हिंदी अर्थ
और तुमको अपने परवरदिगार के फज़ल व करम के इन्तज़ार में जिसकी तुम को उम्मीद हो (मजबूरन) उन (ग़रीबों) से मुँह मोड़ना पड़े तो नरमी से उनको समझा दो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُعْرِضَنَّ عَنْهُمْ: उनसे मुँह मोड़ना, उन्हें कुछ न दे पाने की वजह से उनसे किनारा करना।
  • ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ: किसी रहमत (अनुग्रह) की तलाश में, यानी रोज़ी का इंतज़ार करते हुए।
  • تَرْجُوهَا: जिसकी तुम आशा रखते हो।
  • قَوْلًا مَّيْسُورًا: नरम और आसान बात, ऐसी बात जो सुनने में अच्छी लगे और दिल को छू जाए।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उस स्थिति के बारे में बताती है जब एक मुसलमान के पास किसी ज़रूरतमंद को देने के लिए कुछ न हो। अल्लाह तआला ने पहले हुक्म दिया था कि रिश्तेदारों, मिस्कीनों और मुसाफिरों को उनका हक़ दो। लेकिन अगर किसी वक्त आपके पास देने को कुछ न हो, और आप उनसे मुँह मोड़ने पर मजबूर हों — इसलिए नहीं कि आप उन्हें नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि आप अल्लाह से रोज़ी की उम्मीद रखते हैं और उसके आने का इंतज़ार कर रहे हैं — तो उस हालत में भी आप उन्हें सख्ती से न टालें, बल्कि उनसे नरम और मीठी ज़बान में बात करें। उन्हें यह उम्मीद दिलाएँ कि जब अल्लाह तआला अपने फज़ल से रोज़ी देगा, तो आप उन्हें ज़रूर देंगे। उनके लिए दुआ करें, जैसे यह कहें: "अल्लाह हमें और तुम्हें रोज़ी देगा।" यह तरीका उनके दिल को तसल्ली देता है और रिश्तों में मोहब्बत बनाए रखता है।

फ़ायदे (सबक):

  1. इस आयत से हमें सिख मिलती है कि जब हम किसी की मदद न कर सकें, तो भी हमें उसे निराश नहीं करना चाहिए। एक अच्छी बात और प्यारा अंदाज़ भी एक तरह की मदद है।
  2. मुसलमान को चाहिए कि वह हमेशा अल्लाह से उम्मीद रखे और उसकी रहमत का इंतज़ार करे। मुश्किल वक्त में भी उसका भरोसा अल्लाह पर कायम रहे।
  3. इस्लाम सिखाता है कि इंसान के साथ अच्छा सुलूक सिर्फ पैसे देने से नहीं, बल्कि अच्छे अख़लाक़ (शिष्टाचार) से भी होता है। एक नरम बात दिलों को जोड़ती है और दुश्मनी को मिटाती है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि ज़रूरतमंदों से वादा करना और उन्हें उम्मीद देना एक नेक काम है, बशर्ते वादा सच्चा हो और पूरा करने की नीयत हो।


📜 आयत 26-30 — अल-इसरा

26وَآتِ ذَا الْقُرْبَىٰ حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا
और क़राबतदारों और मोहताज और परदेसी को उनका हक़ दे दो और ख़बरदार फुज़ूल ख़र्ची मत किया करो
27إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ ۖ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا
क्योंकि फुज़ूलख़र्ची करने वाले यक़ीनन शैतानों के भाई है और शैतान अपने परवरदिगार का बड़ा नाशुक्री करने वाला है
28وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ مِّن رَّبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُل لَّهُمْ قَوْلًا مَّيْسُورًا
और तुमको अपने परवरदिगार के फज़ल व करम के इन्तज़ार में जिसकी तुम को उम्मीद हो (मजबूरन) उन (ग़रीबों) से मुँह मोड़ना पड़े तो नरमी से उनको समझा दो
29وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَّحْسُورًا
और अपने हाथ को न तो गर्दन से बँधा हुआ (बहुत तंग) कर लो (कि किसी को कुछ दो ही नहीं) और न बिल्कुल खोल दो कि सब कुछ दे डालो और आख़िर तुम को मलामत ज़दा हसरत से बैठना पड़े
30إِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا
इसमें शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार जिसके लिए चाहता है रोज़ी को फराख़ (बढ़ा) देता है और जिसकी रोज़ी चाहता है तंग रखता है इसमें शक़ नहीं कि वह अपने बन्दों से बहुत बाख़बर और देखभाल रखने वाला है
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अनुवाद — अल-इसरा 28

सूरा अल-इसरा आयत 28 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुमको अपने परवरदिगार के फज़ल व करम के इन्तज़ार…

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Tuesday, August 18, 2026

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