अल-इसरा · 41/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ لِيَذَّكَّرُوا وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًا ۝٤١
Wa laqad sarrafnaa fee haazal Quraani liyazzakkaroo wa maa yazeeduhum illaa nufooraa
📖 हिंदी अर्थ
और हमने तो इसी क़ुरान में तरह तरह से बयान कर दिया ताकि लोग किसी तरह समझें मगर उससे तो उनकी नफरत ही बढ़ती गई

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • صَرَّفْنَا: हमने विभिन्न प्रकार से प्रस्तुत किया, अर्थात् भिन्न-भिन्न शैलियों और तरीकों से बयान किया।
  • لِيَذَّكَّرُوا: ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें, सीखें और चेतावनी पाएँ।
  • نُفُورًا: दूर भागना, विमुख होना, क्रोध और घृणा के साथ पलायन करना।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस पवित्र कुरआन में अपने बंदों की भलाई के लिए अपनी बातों को विभिन्न रूपों और शैलियों में प्रस्तुत किया है। कभी आदेशों के रूप में, कभी निषेधों के रूप में, कभी उपदेशों और सीखों के रूप में, कभी दृष्टांतों (मिसालों) के रूप में, कभी डराने-धमकाने के रूप में, और कभी प्रलोभन और आशा देने के रूप में। इसका उद्देश्य यह है कि लोग इस पर गहराई से विचार करें, अपने लाभ की चीज़ों को अपनाएँ और हानिकारक चीज़ों से बचें, तथा अपने रब की ओर लौट आएँ।

लेकिन जिन लोगों की फ़ितरत (स्वाभाविक प्रवृत्ति) विकृत हो चुकी है और जिनके दिलों पर अहंकार और हठधर्मिता हावी है, उनके लिए यह स्पष्टीकरण और विस्तार किसी काम नहीं आता। इसके विपरीत, जब भी वे कुरआन की कोई आयत सुनते हैं, तो उनका सत्य से विमुख होना और घृणा और बढ़ जाती है। वे सत्य से दूर भागते हैं और उसे स्वीकार करने से और अधिक कतराते हैं। यह उनके अपने हठ और अहंकार का परिणाम है, क्योंकि कुरआन तो हिदायत और रहमत है, लेकिन जिसने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया, उसके लिए यही कुरआन उसकी गुमराही और दूरी का कारण बन जाता है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. कुरआन में बातों को विभिन्न शैलियों में प्रस्तुत करना अल्लाह की ओर से अपने बंदों पर विशेष कृपा और दया है, ताकि हर इंसान अपनी समझ के अनुसार उससे लाभ उठा सके।
  2. कुरआन का असली उद्देश्य लोगों को जागरूक करना और उन्हें सीधे मार्ग पर लाना है, न कि केवल पढ़ने या सुनने की रस्म अदा करना।
  3. हिदायत पाना अल्लाह की मर्ज़ी पर निर्भर करता है; जिसके दिल में सच्चाई की तलाश होती है, कुरआन उसके लिए रहमत बन जाता है, और जो अहंकारी और हठधर्मी होता है, उसके लिए वही कुरआन उसकी दूरी का कारण बन जाता है।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने दिलों को नम्र और सीखने के लिए तैयार रखना चाहिए, ताकि अल्लाह की आयतें हमारे लिए हिदायत का ज़रिया बनें, न कि हम उनसे दूर भागें।
  5. इस आयत में उन लोगों के लिए चेतावनी है जो कुरआन की आयतों को सुनकर भी उनसे मुँह मोड़ लेते हैं — उनका यह रवैया उन्हें और अधिक गुमराही में डाल देता है।


📜 आयत 39-43 — सूरा अल-इसरा

39ذَٰلِكَ مِمَّا أَوْحَىٰ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتُلْقَىٰ فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدْحُورًا
ये बात तो हिकमत की उन बातों में से जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास 'वही' भेजी और ख़ुदा के साथ कोई दूसरा माबूद न बनाना और न तू मलामत ज़दा राइन्द (धुत्कारा) होकर जहन्नुम में झोंक दिया जाएगा
40أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُم بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا
(ऐ मुशरेकीन मक्का) क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें चुन चुन कर बेटे दिए हैं और खुद बेटियाँ ली हैं (यानि) फरिश्ते इसमें शक़ नहीं कि बड़ी (सख्त) बात कहते हो
41وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ لِيَذَّكَّرُوا وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًا
और हमने तो इसी क़ुरान में तरह तरह से बयान कर दिया ताकि लोग किसी तरह समझें मगर उससे तो उनकी नफरत ही बढ़ती गई
42قُل لَّوْ كَانَ مَعَهُ آلِهَةٌ كَمَا يَقُولُونَ إِذًا لَّابْتَغَوْا إِلَىٰ ذِي الْعَرْشِ سَبِيلًا
(ऐ रसूल उनसे) तुम कह दो कि अगर ख़ुदा के साथ जैसा ये लोग कहते हैं और माबूद भी होते तो अब तक उन माबूदों ने अर्श तक (पहुँचाने की कोई न कोई राह निकाल ली होती
43سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يَقُولُونَ عُلُوًّا كَبِيرًا
जो बेहूदा बातें ये लोग (ख़ुदा की निस्बत) कहा करते हैं वह उनसे बहुत बढ़के पाक व पाकीज़ा और बरतर है
अल-इसराकुरान सूची
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41आयत

अनुवाद — अल-इसरा 41

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Thursday, October 1, 2026

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