अल-इसरा · 40/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُم بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا ۝٤٠
Afa asfaakum rabbukum bilbaneena wattakhaza minal malaaa`ikati inaasaa; innakum lataqooloona qawlan `azeema
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ मुशरेकीन मक्का) क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें चुन चुन कर बेटे दिए हैं और खुद बेटियाँ ली हैं (यानि) फरिश्ते इसमें शक़ नहीं कि बड़ी (सख्त) बात कहते हो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَفَأَصْفَاكُمْ: क्या उसने तुम्हें ख़ास कर दिया? यानी क्या उसने तुम्हें चुन लिया और तुम्हें विशेष दर्जा दे दिया?
  • بِالْبَنِينَ: बेटों के साथ (यानी तुम्हें बेटे दिए)
  • وَاتَّخَذَ: और उसने बना लिया / अपना लिया
  • إِنَاثًا: लड़कियाँ (बेटियाँ)
  • قَوْلًا عَظِيمًا: बहुत बड़ी बात / अत्यंत गंभीर और भयानक बात

तफ़सीर (व्याख्या):

हे मुशरिकों (बहुदेववादियों)! तुम कहते हो कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं। अल्लाह तआला इस बात को बड़ी सख्ती से टोकते हुए फ़रमाते हैं: क्या तुम्हारे रब ने तुम्हें बेटों के साथ ख़ास कर दिया और अपने लिए फ़रिश्तों को बेटियाँ बना लिया? यानी तुम अपने लिए बेटों को पसंद करते हो और अल्लाह के लिए बेटियाँ मानते हो — यह कैसा बेतुका और बेहूदा विभाजन है!

अरब के मुशरिकों का यह कुत्सित विचार था कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं, जबकि वे खुद बेटियों को बुरा मानते थे और बेटियों के जन्म पर शर्मिंदा होते थे। वे जिस चीज़ को अपने लिए अपमानजनक समझते थे, उसे अल्लाह की तरफ़ निस्बत करते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह बात अत्यंत गंभीर और भयानक है — यह अल्लाह के शान के खिलाफ़ सबसे बड़ा अपमान है। यह सिर्फ़ एक ग़लतफ़हमी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा जुर्म और कु्फ़्र है, क्योंकि इसमें अल्लाह की पाक ज़ात के लिए औलाद साबित की जा रही है, जो उसकी पाकी के बिल्कुल खिलाफ़ है।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. अल्लाह तआला हर उस चीज़ से पाक और बेनियाज़ है जो उसकी शान के खिलाफ़ हो। उसकी ज़ात के लिए औलाद, जीवनसाथी, या कोई साझीदार साबित करना सबसे बड़ा अपराध है।
  2. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को कभी भी अपनी नापसंद या बुरी चीज़ों को अल्लाह की तरफ़ निस्बत नहीं करनी चाहिए। जो बात हम अपने लिए बुरी समझते हैं, वह अल्लाह के लिए कैसे जायज़ हो सकती है?
  3. इस्लाम हमें अल्लाह के प्रति अदब (सम्मान) और उसकी पाकी का सही अक़ीदा सिखाता है। हमें अपनी ज़ुबान से भी ऐसी बातें कहने से बचना चाहिए जो अल्लाह की शान के खिलाफ़ हों।
  4. यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह तआला अपने बंदों पर कितना मेहरबान है कि वह उनकी ग़लत बातों को साफ़ तौर पर बयान करता है ताकि वे समझ सकें और अपनी ग़लती से बाज़ आएँ। यह अल्लाह की रहमत और मार्गदर्शन की एक बड़ी मिसाल है।


📜 आयत 38-42 — सूरा अल-इसरा

38كُلُّ ذَٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِندَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا
(ऐ रसूल) इन सब बातों में से जो बुरी बात है वह तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक नापसन्द है
39ذَٰلِكَ مِمَّا أَوْحَىٰ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتُلْقَىٰ فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدْحُورًا
ये बात तो हिकमत की उन बातों में से जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास 'वही' भेजी और ख़ुदा के साथ कोई दूसरा माबूद न बनाना और न तू मलामत ज़दा राइन्द (धुत्कारा) होकर जहन्नुम में झोंक दिया जाएगा
40أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُم بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا
(ऐ मुशरेकीन मक्का) क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें चुन चुन कर बेटे दिए हैं और खुद बेटियाँ ली हैं (यानि) फरिश्ते इसमें शक़ नहीं कि बड़ी (सख्त) बात कहते हो
41وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ لِيَذَّكَّرُوا وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًا
और हमने तो इसी क़ुरान में तरह तरह से बयान कर दिया ताकि लोग किसी तरह समझें मगर उससे तो उनकी नफरत ही बढ़ती गई
42قُل لَّوْ كَانَ مَعَهُ آلِهَةٌ كَمَا يَقُولُونَ إِذًا لَّابْتَغَوْا إِلَىٰ ذِي الْعَرْشِ سَبِيلًا
(ऐ रसूल उनसे) तुम कह दो कि अगर ख़ुदा के साथ जैसा ये लोग कहते हैं और माबूद भी होते तो अब तक उन माबूदों ने अर्श तक (पहुँचाने की कोई न कोई राह निकाल ली होती
अल-इसराकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
40आयत

अनुवाद — अल-इसरा 40

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Thursday, October 1, 2026

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