अल-इसरा · 68/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
أَفَأَمِنتُمْ أَن يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ الْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ وَكِيلًا ۝٦٨
Afa amintum any yakhsifa bikum jaanibal barri aw yursil `alaikum haasiban summa laa tajidoo lakum wakeelaa
📖 हिंदी अर्थ
तो क्या तुम उसको इस का भी इत्मिनान हो गया कि वह तुम्हें खुश्की की तरफ (ले जाकर) (क़ारुन की तरह) ज़मीन में धंसा दे या तुम पर (क़ौम) लूत की तरह पत्थरों का मेंह बरसा दे फिर (उस वक्त) तुम किसी को अपना कारसाज़ न पाओगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ख़स्फ़ (خسف): धरती में धँस जाना, धरती का फटकर किसी को निगल लेना।
  • जानिबुल बर्र (جانب البر): ज़मीन का किनारा, सूखी ज़मीन का हिस्सा।
  • हासिब (حاصب): वह तेज़ हवा या आँधी जो छोटे-छोटे पत्थरों को उड़ाकर लाए, या आसमान से बरसाए जाने वाले पत्थर।
  • वकील (وكيل): रक्षक, सहारा देने वाला, काम संभालने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने बंदों को उस एहसान की याद दिलाते हुए उन्हें सावधान कर रहे हैं। जब इंसान समुद्र में सफ़र करता है और खतरे में पड़ता है, तो वह अल्लाह को पुकारता है, और जब अल्लाह उसे बचाकर सूखी ज़मीन (किनारे) तक पहुँचा देता है, तो वह अपने रब को भूल जाता है और निश्चिंत हो जाता है। अल्लाह फ़रमाता है: क्या तुम उस अल्लाह के अज़ाब से बेख़ौफ़ हो गए हो जिसने अभी-अभी तुम्हें समुद्र के खतरे से बचाया है? क्या तुमने ये समझ लिया कि अब तुम उसकी पकड़ से निकल गए?

अल्लाह तआला फ़रमाता है: “क्या तुम इस बात से निडर हो गए हो कि वह तुम्हें सूखी ज़मीन पर ही धँसा दे (यानी ज़मीन तुम्हें निगल जाए), जैसा उसने क़ारून के साथ किया था? या वह तुम पर पत्थर बरसाने वाली आँधी भेज दे, जैसा उसने क़ौमे लूत के साथ किया था? फिर उस वक़्त तुम्हें कोई रक्षक, कोई सहारा देने वाला, कोई पनाह देने वाला न मिलेगा जो तुम्हें उस अज़ाब से बचा सके।”

ये आयत उन लोगों के लिए बड़ी चेतावनी है जो अल्लाह की नेअमतों को भूलकर अपनी ताक़त और साधनों पर इतराते हैं। इंसान चाहे कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकता। जिस अल्लाह ने समुद्र में तुम्हें बचाया, वही ज़मीन पर भी तुम्हें पकड़ सकता है। इसलिए हर हाल में उसी की तरफ़ रुजू करना चाहिए, उसी से डरना चाहिए और उसी पर भरोसा रखना चाहिए।

ये आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की पकड़ से बचने का कोई रास्ता नहीं, और न ही उसके अज़ाब से बचाने वाला कोई वकील और मददगार है। अगर अल्लाह किसी पर अज़ाब भेजना चाहे, तो न ज़मीन उसे बचा सकती है, न आसमान, न कोई इंसान, न कोई ताक़त। इसलिए ईमानवाले को चाहिए कि वह हर वक़्त अल्लाह से डरे, उसकी नेअमतों का शुक्र अदा करे और उसकी नाफ़रमानी से बचे। अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत उन्हीं के लिए है जो उसके आगे झुकते हैं, उसकी पनाह चाहते हैं और उसके दीन पर साबित क़दम रहते हैं।



📜 आयत 66-70 — अल-इसरा

66رَّبُّكُمُ الَّذِي يُزْجِي لَكُمُ الْفُلْكَ فِي الْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا
लोगों) तुम्हारा परवरदिगार वह (क़ादिरे मुत्तलिक़) है जो तुम्हारे लिए समन्दर में जहाज़ों को चलाता है ताकि तुम उसके फज़ल व करम (रोज़ी) की तलाश करो इसमें शक़ नहीं कि वह तुम पर बड़ा मेहरबान है
67وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ كَفُورًا
और जब समन्दर में कभी तुम को कोई तकलीफ पहुँचे तो जिनकी तुम इबादत किया करते थे ग़ायब हो गए मगर बस वही (एक ख़ुदा याद रहता है) उस पर भी जब ख़ुदा ने तुम को छुटकारा देकर खुशकी तक पहुँचा दिया तो फिर तुम इससे मुँह मोड़ बैठें और इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है
68أَفَأَمِنتُمْ أَن يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ الْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ وَكِيلًا
तो क्या तुम उसको इस का भी इत्मिनान हो गया कि वह तुम्हें खुश्की की तरफ (ले जाकर) (क़ारुन की तरह) ज़मीन में धंसा दे या तुम पर (क़ौम) लूत की तरह पत्थरों का मेंह बरसा दे फिर (उस वक्त) तुम किसी को अपना कारसाज़ न पाओगे
69أَمْ أَمِنتُمْ أَن يُعِيدَكُمْ فِيهِ تَارَةً أُخْرَىٰ فَيُرْسِلَ عَلَيْكُمْ قَاصِفًا مِّنَ الرِّيحِ فَيُغْرِقَكُم بِمَا كَفَرْتُمْ ۙ ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِ تَبِيعًا
या तुमको इसका भी इत्मेनान हो गया कि फिर तुमको दोबारा इसी समन्दर में ले जाएगा उसके बाद हवा का एक ऐसा झोका जो (जहाज़ के) परख़चे उड़ा दे तुम पर भेजे फिर तुम्हें तुम्हारे कुफ्र की सज़ा में डुबा मारे फिर तुम किसी को (ऐसा हिमायती) न पाओगे जो हमारा पीछा करे और (तुम्हें छोड़ा जाए)
70۞ وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ وَحَمَلْنَاهُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَرَزَقْنَاهُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَىٰ كَثِيرٍ مِّمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِيلًا
और हमने यक़ीनन आदम की औलाद को इज्ज़त दी और खुश्की और तरी में उनको (जानवरों कश्तियों के ज़रिए) लिए लिए फिरे और उन्हें अच्छी अच्छी चीज़ें खाने को दी और अपने बहुतेरे मख़लूक़ात पर उनको अच्छी ख़ासी फज़ीलत दी
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अनुवाद — अल-इसरा 68

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Wednesday, August 19, 2026

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