अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الضُّرّ (अज़-ज़ुर्र): कष्ट, विपत्ति, संकट
- ضَلَّ (ज़ल्ला): गायब हो जाना, भूल जाना, खो जाना
- تَدْعُونَ (तद्ऊन): जिन्हें तुम पुकारते हो
- أَعْرَضْتُمْ (आरज़्तुम): मुँह फेर लिया, विमुख हो गए
- كَفُورًا (कफ़ूरा): अत्यधिक कृतघ्न, नेमतों का इनकार करने वाला
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपने बंदों पर अपनी असीम दया और कृपा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि जब तुम पर समुद्र में कोई मुसीबत आती है—जैसे तूफ़ान, डूबने का ख़तरा, या कोई और भयानक संकट—तो उस घड़ी तुम्हारे वे सारे झूठे माबूद जिन्हें तुम पुकारते थे, तुम्हारे दिमाग़ से ग़ायब हो जाते हैं। न तो तुम अपने बुतों को याद करते हो, न अपने तथाकथित देवी-देवताओं को। उस वक़्त तुम्हारी ज़ुबान पर सिर्फ़ एक ही नाम आता है—अल्लाह। तुम उसी को पुकारते हो, उसी से फ़रियाद करते हो, और अपने दिल की गहराई से उसी से मदद माँगते हो। यह फ़ितरत (स्वाभाविक प्रवृत्ति) की गवाही है कि असल में मदद देने वाला और मुसीबत टालने वाला सिर्फ़ अल्लाह ही है।
जब अल्लाह तआला अपनी कृपा से तुम्हें उस संकट से बचाकर सूखी ज़मीन पर ले आता है, तो तुम उसकी नेमतों को भूल जाते हो और उसकी तौहीद (एकता) से मुँह मोड़ लेते हो। फिर से अपने उन्हीं झूठे माबूदों की तरफ़ लौट जाते हो, जिन्होंने न तुम्हें कोई नुक़सान पहुँचाया था और न कोई फ़ायदा दे सकते हैं। यही इंसान की कृतघ्नता है—वह नेमत मिलने पर अल्लाह को भूल जाता है, और मुसीबत में ही उसे याद करता है।
इंसान अपनी फ़ितरत के अनुसार बड़ा नेमतों का इनकार करने वाला है। वह अल्लाह की अनगिनत नेमतों को भूल जाता है और उसकी नाफ़रमानी करता है। यहाँ "इंसान" से मुराद सामान्य रूप से सभी इंसान हैं, क्योंकि अधिकतर लोग अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते जैसा कि करना चाहिए।
दावत और नसीहत:
प्यारे भाइयों! यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम किसी मुसीबत में होते हैं, तो हम सिर्फ़ अल्लाह को याद करते हैं, लेकिन जब हालात ठीक हो जाते हैं, तो हम उसे भूल जाते हैं। यह हमारे लिए एक बड़ी नसीहत है कि हम हर हालत में अल्लाह को याद रखें—सुख में भी और दुख में भी। जब अल्लाह हमें नेमतें देता है, तो हमें उसका शुक्र अदा करना चाहिए, न कि उससे मुँह मोड़ लेना चाहिए। अल्लाह वही है जो मुसीबत में हमारी मदद करता है, इसलिए उसी की इबादत करनी चाहिए और उसी के आगे सिर झुकाना चाहिए। याद रखिए, अल्लाह के सिवा कोई मददगार नहीं है, और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करना ही हमारी सफलता की कुंजी है।
📜 आयत 65-69 — अल-इसरा
अनुवाद — अल-इसरा 67
सूरा अल-इसरा आयत 67 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जब समन्दर में कभी तुम को कोई तकलीफ पहुँचे…सूरा आयत 67/111 — अल-इसरा الإسراء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-इसरा सुनें, अल-इसरा अनुवाद, अल-इसरा mp3, अल-इसरा pdf. आयत 65–69. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए








