अल-इसरा · 67/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ كَفُورًا ۝٦٧
Wa izaa massakumuddurru fil bahri dalla man tad`oona illaaa iyyaahu falammaa najjaakum ilal barri a`radtum; wa kaanal insaanu kafooraa
📖 हिंदी अर्थ
और जब समन्दर में कभी तुम को कोई तकलीफ पहुँचे तो जिनकी तुम इबादत किया करते थे ग़ायब हो गए मगर बस वही (एक ख़ुदा याद रहता है) उस पर भी जब ख़ुदा ने तुम को छुटकारा देकर खुशकी तक पहुँचा दिया तो फिर तुम इससे मुँह मोड़ बैठें और इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الضُّرّ (अज़-ज़ुर्र): कष्ट, विपत्ति, संकट
  • ضَلَّ (ज़ल्ला): गायब हो जाना, भूल जाना, खो जाना
  • تَدْعُونَ (तद्ऊन): जिन्हें तुम पुकारते हो
  • أَعْرَضْتُمْ (आरज़्तुम): मुँह फेर लिया, विमुख हो गए
  • كَفُورًا (कफ़ूरा): अत्यधिक कृतघ्न, नेमतों का इनकार करने वाला

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों पर अपनी असीम दया और कृपा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि जब तुम पर समुद्र में कोई मुसीबत आती है—जैसे तूफ़ान, डूबने का ख़तरा, या कोई और भयानक संकट—तो उस घड़ी तुम्हारे वे सारे झूठे माबूद जिन्हें तुम पुकारते थे, तुम्हारे दिमाग़ से ग़ायब हो जाते हैं। न तो तुम अपने बुतों को याद करते हो, न अपने तथाकथित देवी-देवताओं को। उस वक़्त तुम्हारी ज़ुबान पर सिर्फ़ एक ही नाम आता है—अल्लाह। तुम उसी को पुकारते हो, उसी से फ़रियाद करते हो, और अपने दिल की गहराई से उसी से मदद माँगते हो। यह फ़ितरत (स्वाभाविक प्रवृत्ति) की गवाही है कि असल में मदद देने वाला और मुसीबत टालने वाला सिर्फ़ अल्लाह ही है।

जब अल्लाह तआला अपनी कृपा से तुम्हें उस संकट से बचाकर सूखी ज़मीन पर ले आता है, तो तुम उसकी नेमतों को भूल जाते हो और उसकी तौहीद (एकता) से मुँह मोड़ लेते हो। फिर से अपने उन्हीं झूठे माबूदों की तरफ़ लौट जाते हो, जिन्होंने न तुम्हें कोई नुक़सान पहुँचाया था और न कोई फ़ायदा दे सकते हैं। यही इंसान की कृतघ्नता है—वह नेमत मिलने पर अल्लाह को भूल जाता है, और मुसीबत में ही उसे याद करता है।

इंसान अपनी फ़ितरत के अनुसार बड़ा नेमतों का इनकार करने वाला है। वह अल्लाह की अनगिनत नेमतों को भूल जाता है और उसकी नाफ़रमानी करता है। यहाँ "इंसान" से मुराद सामान्य रूप से सभी इंसान हैं, क्योंकि अधिकतर लोग अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते जैसा कि करना चाहिए।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों! यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम किसी मुसीबत में होते हैं, तो हम सिर्फ़ अल्लाह को याद करते हैं, लेकिन जब हालात ठीक हो जाते हैं, तो हम उसे भूल जाते हैं। यह हमारे लिए एक बड़ी नसीहत है कि हम हर हालत में अल्लाह को याद रखें—सुख में भी और दुख में भी। जब अल्लाह हमें नेमतें देता है, तो हमें उसका शुक्र अदा करना चाहिए, न कि उससे मुँह मोड़ लेना चाहिए। अल्लाह वही है जो मुसीबत में हमारी मदद करता है, इसलिए उसी की इबादत करनी चाहिए और उसी के आगे सिर झुकाना चाहिए। याद रखिए, अल्लाह के सिवा कोई मददगार नहीं है, और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करना ही हमारी सफलता की कुंजी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 65-69 — अल-इसरा

65إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ ۚ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ وَكِيلًا
बेशक जो मेरे (ख़ास) बन्दें हैं उन पर तेरा ज़ोर नहीं चल (सकता) और कारसाज़ी में तेरा परवरदिगार काफी है
66رَّبُّكُمُ الَّذِي يُزْجِي لَكُمُ الْفُلْكَ فِي الْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ ۚ إِنَّهُ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا
लोगों) तुम्हारा परवरदिगार वह (क़ादिरे मुत्तलिक़) है जो तुम्हारे लिए समन्दर में जहाज़ों को चलाता है ताकि तुम उसके फज़ल व करम (रोज़ी) की तलाश करो इसमें शक़ नहीं कि वह तुम पर बड़ा मेहरबान है
67وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ الْإِنسَانُ كَفُورًا
और जब समन्दर में कभी तुम को कोई तकलीफ पहुँचे तो जिनकी तुम इबादत किया करते थे ग़ायब हो गए मगर बस वही (एक ख़ुदा याद रहता है) उस पर भी जब ख़ुदा ने तुम को छुटकारा देकर खुशकी तक पहुँचा दिया तो फिर तुम इससे मुँह मोड़ बैठें और इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है
68أَفَأَمِنتُمْ أَن يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ الْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ وَكِيلًا
तो क्या तुम उसको इस का भी इत्मिनान हो गया कि वह तुम्हें खुश्की की तरफ (ले जाकर) (क़ारुन की तरह) ज़मीन में धंसा दे या तुम पर (क़ौम) लूत की तरह पत्थरों का मेंह बरसा दे फिर (उस वक्त) तुम किसी को अपना कारसाज़ न पाओगे
69أَمْ أَمِنتُمْ أَن يُعِيدَكُمْ فِيهِ تَارَةً أُخْرَىٰ فَيُرْسِلَ عَلَيْكُمْ قَاصِفًا مِّنَ الرِّيحِ فَيُغْرِقَكُم بِمَا كَفَرْتُمْ ۙ ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِ تَبِيعًا
या तुमको इसका भी इत्मेनान हो गया कि फिर तुमको दोबारा इसी समन्दर में ले जाएगा उसके बाद हवा का एक ऐसा झोका जो (जहाज़ के) परख़चे उड़ा दे तुम पर भेजे फिर तुम्हें तुम्हारे कुफ्र की सज़ा में डुबा मारे फिर तुम किसी को (ऐसा हिमायती) न पाओगे जो हमारा पीछा करे और (तुम्हें छोड़ा जाए)
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अनुवाद — अल-इसरा 67

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Tuesday, August 18, 2026

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