अल-इसरा · 80/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَقُل رَّبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَل لِّي مِن لَّدُنكَ سُلْطَانًا نَّصِيرًا ۝٨٠
Wa qur Rabbi adkhilnee mudkhala sidqinw wa akhrijnee mukhraja sidqinw waj`al lee milladunka sultaanan naseeraa
📖 हिंदी अर्थ
और ये दुआ माँगा करो कि ऐ मेरे परवरदिगार मुझे (जहाँ) पहुँचा अच्छी तरह पहुँचा और मुझे (जहाँ से निकाल) तो अच्छी तरह निकाल और मुझे ख़ास अपनी बारगाह से एक हुकूमत अता फरमा जिस से (हर क़िस्म की) मदद पहुँचे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُدْخَلَ صِدْقٍ — सच्चाई और भलाई के साथ प्रवेश (ऐसा प्रवेश जो सत्य और ईमानदारी पर हो)।
  • مُخْرَجَ صِدْقٍ — सच्चाई और भलाई के साथ निकास (ऐसा निकास जो सत्य और ईमानदारी पर हो)।
  • سُلْطَانًا نَّصِيرًا — ऐसा प्रमाण या शक्ति जो मेरी सहायता करे (दृढ़ हुज्जत और मददगार ताकत)।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को हिदायत दे रहा है कि आप दुआ करें: "ऐ मेरे रब! मुझे सच्चाई और भलाई के साथ दाखिल कर, और सच्चाई और भलाई के साथ निकाल।" यानी जहाँ भी मैं जाऊँ, जिस काम में भी प्रवेश करूँ, जिस शहर या मैदान में कदम रखूँ, वह सब कुछ तेरी रज़ा और तेरी इताअत के लिए हो। मेरा हर दाखिला और हर निकास सच्चाई, ईमानदारी और तेरी मर्ज़ी के मुताबिक हो — न कि दिखावे या मतलब के लिए। यह दुआ सिखाई गई ताकि इंसान की ज़िंदगी का हर पहलू — चाहे वह घर में दाखिल होना हो, मस्जिद में जाना हो, सफर पर निकलना हो या किसी ज़िम्मेदारी को संभालना हो — सब कुछ अल्लाह की रज़ा की तलब में हो।

फिर अल्लाह ने यह भी सिखाया कि आप दुआ करें: "ऐ मेरे रब! मुझे अपनी तरफ से एक ऐसा सुल्तान (प्रमाण और शक्ति) अता फरमा जो मेरी मदद करे।" यानी एक ऐसी दलील और हुज्जत जो मेरे दुश्मनों के मुकाबले में मेरी सहायता करे, और एक ऐसी ताकत जो सच्चाई को क़ायम करने और बातिल को मिटाने में मेरा साथ दे। यह सुल्तान सिर्फ ज़ाहिरी ताकत नहीं है, बल्कि इसमें इल्म, हिकमत, सच्चाई का जोश और अल्लाह की नुसरत सब शामिल है।

इस आयत में अल्लाह ने अपने नबी को मक्का से मदीना हिजरत के वक्त यह दुआ सिखाई — कि जब आप मक्का से निकलें तो सच्चाई के साथ निकलें, और जब मदीना में दाखिल हों तो सच्चाई के साथ दाखिल हों। यानी हर कदम पर नीयत साफ हो, मकसद सिर्फ अल्लाह की रज़ा हो, और हर अमल में सिद्क (सच्चाई) शामिल हो।

दावती पहलू:

यह दुआ हमारे लिए भी बहुत बड़ी नेमत है। अगर हम इसे अपनी ज़िंदगी में अपना लें — हर काम की शुरुआत में, हर सफर में, हर नए कदम पर — तो हमारी ज़िंदगी बरकत वाली बन जाएगी। यह दुआ हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह अपने हर अमल को अल्लाह की रज़ा के तहत करे, और अल्लाह से मदद माँगे। जब हम सच्चाई के साथ चलेंगे, तो अल्लाह हमें ऐसी ताकत और दलील देगा जो हमें दुनिया और आखिरत में कामयाब करेगी। यह दुआ हमें यह भी सिखाती है कि किसी भी काम में जल्दबाज़ी न करें, बल्कि अल्लाह से हिदायत और नुसरत की दुआ करें, क्योंकि कामयाबी अल्लाह के हाथ में है।



📜 आयत 78-82 — अल-इसरा

78أَقِمِ الصَّلَاةَ لِدُلُوكِ الشَّمْسِ إِلَىٰ غَسَقِ اللَّيْلِ وَقُرْآنَ الْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا
(ऐ रसूल) सूरज के ढलने से रात के अंधेरे तक नमाज़े ज़ोहर, अस्र, मग़रिब, इशा पढ़ा करो और नमाज़ सुबह (भी) क्योंकि सुबह की नमाज़ पर (दिन और रात दोनों के फरिश्तों की) गवाही होती है
79وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَّكَ عَسَىٰ أَن يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَّحْمُودًا
और रात के ख़ास हिस्से में नमाजे तहज्जुद पढ़ा करो ये सुन्नत तुम्हारी खास फज़ीलत हैं क़रीब है कि क़यामत के दिन ख़ुदा तुमको मक़ामे महमूद तक पहुँचा दे
80وَقُل رَّبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَل لِّي مِن لَّدُنكَ سُلْطَانًا نَّصِيرًا
और ये दुआ माँगा करो कि ऐ मेरे परवरदिगार मुझे (जहाँ) पहुँचा अच्छी तरह पहुँचा और मुझे (जहाँ से निकाल) तो अच्छी तरह निकाल और मुझे ख़ास अपनी बारगाह से एक हुकूमत अता फरमा जिस से (हर क़िस्म की) मदद पहुँचे
81وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ ۚ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا
और (ऐ रसूल) कह दो कि (दीन) हक़ आ गया और बातिल नेस्तनाबूद हुआ इसमें शक़ नहीं कि बातिल मिटने वाला ही था
82وَنُنَزِّلُ مِنَ الْقُرْآنِ مَا هُوَ شِفَاءٌ وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ ۙ وَلَا يَزِيدُ الظَّالِمِينَ إِلَّا خَسَارًا
और हम तो क़ुरान में वही चीज़ नाज़िल करते हैं जो मोमिनों के लिए (सरासर) शिफा और रहमत है (मगर) नाफरमानों को तो घाटे के सिवा कुछ बढ़ाता ही नहीं
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अनुवाद — अल-इसरा 80

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Tuesday, August 18, 2026

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