अल-कहफ · 27/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
وَاتْلُ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِن كِتَابِ رَبِّكَ ۖ لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَلَن تَجِدَ مِن دُونِهِ مُلْتَحَدًا ۝٢٧
Watlu maaa oohiya ilaika min Kitaabi Rabbika laa mubaddila li Kalimaatihee wa lan tajida min doonihee multahadaa
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से वही के ज़रिए से नाज़िल हुईहै उसको पढ़ा करो उसकी बातों को कोई बदल नहीं सकता और तुम उसके सिवा कहीं कोई हरगिज़ पनाह की जगह (भी) न पाओगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اتْلُ: पढ़ो, पालन करो
  • مُبَدِّلَ: बदलने वाला
  • كَلِمَاتِهِ: उसकी बातें (अल्लाह के वचन)
  • مُلْتَحَدًا: शरण स्थल, पनाह की जगह, भागने की जगह

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप उस किताब को पढ़ें और उस पर अमल करें जो आपके रब की ओर से आप पर उतारी गई है, यानी क़ुरआन। यह वह किताब है जिसकी बातों को कोई बदलने की ताक़त नहीं रखता, क्योंकि यह पूरी तरह सच्ची और न्यायपूर्ण है। अल्लाह की हर बात सत्य है, हर फ़ैसला अदल (न्याय) पर आधारित है, और उसका हर वादा पूरा होकर रहता है। इसलिए इस किताब को बदलने, इसमें कमी या ज़्यादती करने की कोई शक्ति किसी को हासिल नहीं।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐ नबी! अगर तुम अल्लाह के हुक्म से हटकर कहीं और जाना चाहो, या उसकी पकड़ से बचने के लिए कोई पनाह तलाश करो, तो याद रखो कि अल्लाह के सिवा तुम्हें कोई शरण स्थल नहीं मिलेगा। न कोई ऐसी जगह है जहाँ तुम छिप सको, न कोई ऐसा सहारा है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सके। अल्लाह ही एकमात्र पनाह देने वाला है, और उसी की तरफ लौटना है।

यह आयत हमें सिखाती है कि क़ुरआन अल्लाह की आख़िरी और अटल किताब है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। यही हमारी रहनुमाई का ज़रिया है और यही हमारी नजात (मुक्ति) का रास्ता है। जो व्यक्ति इस किताब को थाम लेता है, वह कभी गुमराह नहीं होता, और जो इसे छोड़ देता है, उसे कोई और सहारा नहीं मिल सकता।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह का कलाम (क़ुरआन) ही हमारी असली पनाह है। दुनिया की हर चीज़ फ़ानी है, हर सहारा कमज़ोर है, लेकिन अल्लाह की बातें क़ियामत तक क़ायम रहेंगी। इसलिए हमें चाहिए कि हम क़ुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें। यही हमारी कामयाबी की कुंजी है। अल्लाह से दुआ है कि वह हमें क़ुरआन को पढ़ने, समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 25-29 — अल-कहफ

25وَلَبِثُوا فِي كَهْفِهِمْ ثَلَاثَ مِائَةٍ سِنِينَ وَازْدَادُوا تِسْعًا
और असहाब कहफ अपने ग़ार में नौ ऊपर तीन सौ बरस रहे
26قُلِ اللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا لَبِثُوا ۖ لَهُ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ أَبْصِرْ بِهِ وَأَسْمِعْ ۚ مَا لَهُم مِّن دُونِهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا يُشْرِكُ فِي حُكْمِهِ أَحَدًا
(ऐ रसूल) अगर वह लोग इस पर भी न मानें तो तुम कह दो कि ख़ुदा उनके ठहरने की मुद्दत से बखूबी वाक़िफ है सारे आसमान और ज़मीन का ग़ैब उसी के वास्ते ख़ास है (अल्लाह हो अकबर) वो कैसा देखने वाला क्या ही सुनने वाला है उसके सिवा उन लोगों का कोई सरपरस्त नहीं और वह अपने हुक्म में किसी को अपना दख़ील (शरीक) नहीं बनाता
27وَاتْلُ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِن كِتَابِ رَبِّكَ ۖ لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَلَن تَجِدَ مِن دُونِهِ مُلْتَحَدًا
और (ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से वही के ज़रिए से नाज़िल हुईहै उसको पढ़ा करो उसकी बातों को कोई बदल नहीं सकता और तुम उसके सिवा कहीं कोई हरगिज़ पनाह की जगह (भी) न पाओगे
28وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُ ۖ وَلَا تَعْدُ عَيْنَاكَ عَنْهُمْ تُرِيدُ زِينَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَا تُطِعْ مَنْ أَغْفَلْنَا قَلْبَهُ عَن ذِكْرِنَا وَاتَّبَعَ هَوَاهُ وَكَانَ أَمْرُهُ فُرُطًا
और (ऐ रसूल) जो लोग अपने परवरदिगार को सुबह सवेरे और झटपट वक्त शाम को याद करते हैं और उसकी खुशनूदी के ख्वाहाँ हैं उनके उनके साथ तुम खुद (भी) अपने नफस पर जब्र करो और उनकी तरफ से अपनी नज़र (तवज्जो) न फेरो कि तुम दुनिया में ज़िन्दगी की आराइश चाहने लगो और जिसके दिल को हमने (गोया खुद) अपने ज़िक्र से ग़ाफिल कर दिया है और वह अपनी ख्वाहिशे नफसानी के पीछे पड़ा है और उसका काम सरासर ज्यादती है उसका कहना हरगिज़ न मानना
29وَقُلِ الْحَقُّ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَن شَاءَ فَلْيُؤْمِن وَمَن شَاءَ فَلْيَكْفُرْ ۚ إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا ۚ وَإِن يَسْتَغِيثُوا يُغَاثُوا بِمَاءٍ كَالْمُهْلِ يَشْوِي الْوُجُوهَ ۚ بِئْسَ الشَّرَابُ وَسَاءَتْ مُرْتَفَقًا
और (ऐ रसूल) तुम कह दों कि सच्ची बात (कलमए तौहीद) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (नाज़िल हो चुकी है) बस जो चाहे माने और जो चाहे न माने (मगर) हमने ज़ालिमों के लिए वह आग (दहका के) तैयार कर रखी है जिसकी क़नातें उन्हें घेर लेगी और अगर वह लोग दोहाई करेगें तो उनकी फरियाद रसी खौलते हुए पानी से की जाएगी जो मसलन पिघले हुए ताबें की तरह होगा (और) वह मुँह को भून डालेगा क्या बुरा पानी है और (जहन्नुम भी) क्या बुरी जगह है
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अनुवाद — अल-कहफ 27

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Tuesday, August 18, 2026

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