अल-कहफ · 33/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
كِلْتَا الْجَنَّتَيْنِ آتَتْ أُكُلَهَا وَلَمْ تَظْلِم مِّنْهُ شَيْئًا ۚ وَفَجَّرْنَا خِلَالَهُمَا نَهَرًا ۝٣٣
Kiltal jannataini aatat ukulahaa wa lam tazlim minhu shai`anw wa fajjarnaa khi laalahumaa naharaa
📖 हिंदी अर्थ
वह दोनों बाग़ खूब फल लाए और फल लाने में कुछ कमी नहीं की और हमने उन दोनों बाग़ों के दरमियान नहर भी जारी कर दी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آتَتْ أُكُلَهَا: अपना फल दिया, अर्थात भरपूर फल प्रदान किया।
  • وَلَمْ تَظْلِمْ: और कमी नहीं की, अर्थात किसी भी प्रकार की कमी नहीं हुई।
  • وَفَجَّرْنَا: और हमने फोड़कर बहाया, अर्थात ज़मीन को चीरकर निकाला।
  • خِلَالَهُمَا: दोनों के बीच में, अर्थात दोनों बागों के मध्य से।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस व्यक्ति के दो बागों का वर्णन करती है जिसे अल्लाह ने अपार धन-दौलत और भरपूर फल-फूल दिए थे। अल्लाह तआला फरमाता है कि उन दोनों बागों में से हर एक ने अपना फल पूरा-पूरा दिया, और उसमें कोई कमी नहीं हुई। यानी खजूर, अंगूर, अनाज और अन्य फल इतनी प्रचुर मात्रा में पैदा हुए कि किसी चीज़ की कमी नज़र नहीं आई। फिर अल्लाह ने अपनी कुदरत से दोनों बागों के बीच एक नहर जारी कर दी, जो उन्हें सींचती थी, ताकि पानी की कोई कमी न हो और बागों की रौनक और खूबसूरती और बढ़ जाए।

यह अल्लाह की अपने बंदे पर असीम मेहरबानी का प्रतीक है कि उसने उसे न सिर्फ़ ज़मीन दी, बल्कि उसमें फल पैदा करने की ताक़त भी दी, और पानी का इंतज़ाम भी किया। यह उस इंसान के लिए एक बड़ी नेमत थी, लेकिन अफ़सोस कि उसने इस नेमत का शुक्र अदा नहीं किया और अपने रब की नेमतों पर घमंड कर बैठा।

इस आयत से हमें सबक मिलता है कि अल्लाह की दी हुई नेमतें हमारे लिए इम्तिहान हैं। हमें चाहिए कि जब अल्लाह हमें धन, फल, पानी और सुख-सुविधाएँ दे, तो हम उसका शुक्र अदा करें, उसकी नेमतों को अपने अहंकार का ज़रिया न बनाएँ, बल्कि उसे अल्लाह की देन समझकर उसके हुक्म के मुताबिक इस्तेमाल करें। याद रखें, जो शख्स अल्लाह का शुक्र अदा करता है, अल्लाह उसे और नेमतें देता है, और जो कृतघ्न होता है, वह अपनी नेमतें खो बैठता है। अल्लाह हमें शुक्रगुज़ार बंदे बनाए, आमीन।



📜 आयत 31-35 — अल-कहफ

31أُولَٰئِكَ لَهُمْ جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِن ذَهَبٍ وَيَلْبَسُونَ ثِيَابًا خُضْرًا مِّن سُندُسٍ وَإِسْتَبْرَقٍ مُّتَّكِئِينَ فِيهَا عَلَى الْأَرَائِكِ ۚ نِعْمَ الثَّوَابُ وَحَسُنَتْ مُرْتَفَقًا
ये वही लोग हैं जिनके (रहने सहने के) लिए सदाबहार (बेहश्त के) बाग़ात हैं उनके (मकानात के) नीचे नहरें जारी होगीं वह उन बाग़ात में दमकते हुए कुन्दन के कंगन से सँवारे जाँएगें और उन्हें बारीक रेशम (क्रेब) और दबीज़ रेश्म (वाफते)के धानी जोड़े पहनाए जाएँगें और तख्तों पर तकिए लगाए (बैठे) होगें क्या ही अच्छा बदला है और (बेहश्त भी आसाइश की) कैसी अच्छी जगह है
32۞ وَاضْرِبْ لَهُم مَّثَلًا رَّجُلَيْنِ جَعَلْنَا لِأَحَدِهِمَا جَنَّتَيْنِ مِنْ أَعْنَابٍ وَحَفَفْنَاهُمَا بِنَخْلٍ وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمَا زَرْعًا
और (ऐ रसूल) इन लोगों से उन दो शख़्शों की मिसाल बयान करो कि उनमें से एक को हमने अंगूर के दो बाग़ दे रखे है और हमने चारो ओर खजूर के पेड़ लगा दिये है और उन दोनों बाग़ के दरमियान खेती भी लगाई है
33كِلْتَا الْجَنَّتَيْنِ آتَتْ أُكُلَهَا وَلَمْ تَظْلِم مِّنْهُ شَيْئًا ۚ وَفَجَّرْنَا خِلَالَهُمَا نَهَرًا
वह दोनों बाग़ खूब फल लाए और फल लाने में कुछ कमी नहीं की और हमने उन दोनों बाग़ों के दरमियान नहर भी जारी कर दी है
34وَكَانَ لَهُ ثَمَرٌ فَقَالَ لِصَاحِبِهِ وَهُوَ يُحَاوِرُهُ أَنَا أَكْثَرُ مِنكَ مَالًا وَأَعَزُّ نَفَرًا
और उसे फल मिला तो अपने साथी से जो उससे बातें कर रहा था बोल उठा कि मै तो तुझसे माल में (भी) ज्यादा हूँ और जत्थे में भी बढ़ कर हूँ
35وَدَخَلَ جَنَّتَهُ وَهُوَ ظَالِمٌ لِّنَفْسِهِ قَالَ مَا أَظُنُّ أَن تَبِيدَ هَٰذِهِ أَبَدًا
और ये बातें करता हुआ अपने बाग़ मे भी जा पहुँचा हालॉकि उसकी आदत ये थी कि (कुफ्र की वजह से) अपने ऊपर आप ज़ुल्म कर रहा था (ग़रज़ वह कह बैठा) कि मुझे तो इसका गुमान नहीं तो कि कभी भी ये बाग़ उजड़ जाए
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अनुवाद — अल-कहफ 33

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Tuesday, August 18, 2026

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