अल-बकरा · 101/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ۝١٠١
Wa lammaa jaaa`ahum Rasoolum min `indil laahi musaddiqul limaa ma`ahum nabaza fareequm minal lazeena ootul Kitaaba Kitaabal laahi waraaa`a zuhoorihim ka annahum laa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनके पास खुदा की तरफ से रसूल (मोहम्मद) आया और उस किताब (तौरेत) की जो उनके पास है तसदीक़ भी करता है तो उन अहले किताब के एक गिरोह ने किताबे खुदा को अपने पसे पुश्त फेंक दिया गोया वह लोग कुछ जानते ही नहीं और उस मंत्र के पीछे पड़ गए
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नबज़ा (नबज़): फेंक दिया, पीछे डाल दिया।
  • वरा-ए ज़ुहूरिहिम: अपनी पीठ के पीछे, यानी पूरी तरह त्याग दिया।
  • किताबुल्लाह: अल्लाह की किताब (यहाँ तौरात या उसमें मौजूद सच्चाई)।
  • कअन्नहुम ला यअ्लमून: जैसे कि वे (उसकी सच्चाई को) जानते ही नहीं।

तफसीर (व्याख्या):

जब अल्लाह की ओर से उनके पास एक रसूल (मुहम्मद ﷺ) आए, जो उनके पास मौजूद (तौरात) की पुष्टि करने वाले थे और उनकी सिफ़ात (विशेषताएँ) उनकी किताब में मौजूद थीं, तो अह्ले-किताब (यहूदियों) में से एक समूह ने अल्लाह की किताब (तौरात) को अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया। उन्होंने उसके बताए हुए मार्ग पर चलना छोड़ दिया और उस सच्चाई को नकार दिया जो उनके रसूल के आने की गवाही देती थी। उनका यह व्यवहार उन लोगों जैसा था जो किसी चीज़ की सच्चाई को जानते ही नहीं, हालाँकि वे उसे पढ़ते और जानते थे, लेकिन उस पर अमल न करके वे अज्ञानियों की तरह बन गए। उन्होंने अपने ज्ञान को त्याग दिया और उसे बेकार कर दिया, क्योंकि उन्होंने उस पर अमल नहीं किया और न ही उसके अनुसार अपने रसूल को माना।


फ़ायदे (सीख):

  1. इल्म के साथ अमल ज़रूरी है: केवल किताब पढ़ लेना या जान लेना काफी नहीं, बल्कि उस पर अमल करना ही असली इल्म है। जो जानकर न माने, वह जाहिल से भी बदतर है।
  2. रसूलों की पुष्टि: हर नबी अपने से पहले की किताबों की सच्चाई की गवाही देता है। मुहम्मद ﷺ ने तौरात और इंजील की मूल शिक्षाओं की पुष्टि की, इसलिए उन्हें न मानना अपनी ही किताब को झुठलाना है।
  3. अल्लाह की किताब को त्यागने का अंजाम: जो लोग अल्लाह की किताब को पीठ के पीछे डालते हैं, वे दुनिया और आख़िरत दोनों में नुकसान उठाते हैं। किताब को त्यागने का मतलब हिदायत को त्यागना है।
  4. ज्ञान का दुरुपयोग: यहूदियों ने अपने ज्ञान का सही इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उसे अपनी स्वार्थी इच्छाओं के आगे झुका दिया। हमें चाहिए कि हम अपने ज्ञान को अल्लाह की राह में इस्तेमाल करें।
  5. क़ुरआन की महानता: यह आयत हमें सिखाती है कि क़ुरआन वह आख़िरी किताब है जो पिछली सभी किताबों की सच्चाई की पुष्टि करती है। इसे थामे रहना ही हमारी सफलता है, और इसे छोड़ना हमारी बर्बादी है।
🎧 सुनें

📜 आयत 99-103 — अल-बकरा

99وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۖ وَمَا يَكْفُرُ بِهَا إِلَّا الْفَاسِقُونَ
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर ऐसी निशानियाँ नाज़िल की हैं जो वाजेए और रौशन हैं और ऐसे नाफरमानों के सिवा उनका कोई इन्कार नहीं कर सकता
100أَوَكُلَّمَا عَاهَدُوا عَهْدًا نَّبَذَهُ فَرِيقٌ مِّنْهُم ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
और उनकी ये हालत है कि जब कभी कोई अहद किया तो उनमें से एक फरीक़ ने तोड़ डाला बल्कि उनमें से अक्सर तो ईमान ही नहीं रखते
101وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
और जब उनके पास खुदा की तरफ से रसूल (मोहम्मद) आया और उस किताब (तौरेत) की जो उनके पास है तसदीक़ भी करता है तो उन अहले किताब के एक गिरोह ने किताबे खुदा को अपने पसे पुश्त फेंक दिया गोया वह लोग कुछ जानते ही नहीं और उस मंत्र के पीछे पड़ गए
102وَاتَّبَعُوا مَا تَتْلُو الشَّيَاطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَانَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَانُ وَلَٰكِنَّ الشَّيَاطِينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَ وَمَا أُنزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَا إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِهِ ۚ وَمَا هُم بِضَارِّينَ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا لَمَنِ اشْتَرَاهُ مَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
जिसको सुलेमान के ज़माने की सलतनत में शयातीन जपा करते थे हालाँकि सुलेमान ने कुफ्र नहीं इख़तेयार किया लेकिन शैतानों ने कुफ्र एख़तेयार किया कि वह लोगों को जादू सिखाया करते थे और वह चीज़ें जो हारूत और मारूत दोनों फ़रिश्तों पर बाइबिल में नाज़िल की गई थी हालाँकि ये दोनों फ़रिश्ते किसी को सिखाते न थे जब तक ये न कह देते थे कि हम दोनों तो फ़क़त (ज़रियाए आज़माइश) है पस तो (इस पर अमल करके) बेईमान न हो जाना उस पर भी उनसे वह (टोटके) सीखते थे जिनकी वजह से मिया बीवी में तफ़रक़ा डालते हालाँकि बग़ैर इज्ने खुदावन्दी वह अपनी इन बातों से किसी को ज़रर नहीं पहुँचा सकते थे और ये लोग ऐसी बातें सीखते थे जो खुद उन्हें नुक़सान पहुँचाती थी और कुछ (नफा) पहुँचाती थी बावजूद कि वह यक़ीनन जान चुके थे कि जो शख्स इन (बुराईयों) का ख़रीदार हुआ वह आख़िरत में बेनसीब हैं और बेशुबह (मुआवज़ा) बहुत ही बड़ा है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेचा काश (उसे कुछ) सोचे समझे होते
103وَلَوْ أَنَّهُمْ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَمَثُوبَةٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ خَيْرٌ ۖ لَّوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
और अगर वह ईमान लाते और जादू वग़ैरह से बचकर परहेज़गार बनते तो खुदा की दरगाह से जो सवाब मिलता वह उससे कहीं बेहतर होता काश ये लोग (इतना तो) समझते
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अनुवाद — अल-बकरा 101

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Tuesday, August 18, 2026

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