अल-बकरा · 100/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
أَوَكُلَّمَا عَاهَدُوا عَهْدًا نَّبَذَهُ فَرِيقٌ مِّنْهُم ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ ۝١٠٠
Awa kullamaa `aahadoo ahdan nabazahoo fareequm minhum; bal aksaruhum laa u`minoon
📖 हिंदी अर्थ
और उनकी ये हालत है कि जब कभी कोई अहद किया तो उनमें से एक फरीक़ ने तोड़ डाला बल्कि उनमें से अक्सर तो ईमान ही नहीं रखते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • عَاهَدُوا عَهْدًا: उन्होंने कोई वचन या प्रतिज्ञा की।
  • نَبَذَهُ: उसे तोड़ दिया, फेंक दिया, त्याग दिया।
  • فَرِيقٌ: एक समूह, एक गिरोह।
  • لَا يُؤْمِنُونَ: वे ईमान नहीं लाते, सच्चा विश्वास नहीं रखते।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत बनी इस्राईल (यहूदियों) के उस बुरे चरित्र को उजागर करती है जो उनकी आदत बन चुकी थी। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "क्या अजीब बात है! जब भी उन्होंने कोई वचन या अहद किया, तो उनमें से एक गिरोह ने उसे तोड़ दिया और उसे पीछे फेंक दिया।" यह उनकी पुरानी आदत थी—आज वचन देते, कल ही उसे भूल जाते या तोड़ देते।

यहूदियों ने अल्लाह से और उसके रसूलों से कई वचन लिए, जैसे तौरात में मुहम्मद ﷺ के आने की खबर थी और उनसे वचन लिया गया था कि जब वह अंतिम रसूल आएँ तो वे उन पर ईमान लाएँगे। लेकिन जब मुहम्मद ﷺ आए, तो उन्होंने उस वचन को तोड़ दिया और उन पर ईमान नहीं लाए।

आयत में आगे कहा गया: "बल्कि उनमें से अधिकतर ईमान ही नहीं लाते।" यानी यह केवल एक छोटा समूह नहीं था जो वचन तोड़ता था, बल्कि उनकी अधिकांश जनता ही ईमान से वंचित थी। उनका ईमान सिर्फ ज़ुबानी था, दिल से नहीं। अगर उन्हें सच्चा ईमान होता, तो वे अपने वचनों पर कायम रहते, क्योंकि सच्चा ईमान इंसान को वफ़ादारी और अमानतदारी सिखाता है।

फ़ायदे (सबक):

  1. वचन तोड़ना मुनाफ़िक़ों की निशानी है: इस आयत से सीख मिलती है कि वचन को पूरा करना ईमान का हिस्सा है। जो लोग वचन तोड़ते हैं, उनका ईमान कमज़ोर या अधूरा है। एक सच्चा मुसलमान अपने वादे का पक्का होता है, चाहे वह अल्लाह से हो या इंसानों से।
  2. अल्लाह के दीन पर स्थिर रहना: यहूदियों की तरह हमें भी अपने अहद (प्रतिज्ञा) पर कायम रहना चाहिए जो हमने अल्लाह से किया है—कि हम उसकी इबादत करेंगे, उसके हुक्म मानेंगे और उसके रसूल ﷺ की पैरवी करेंगे।
  3. ईमान का असर अमल पर पड़ता है: सच्चा ईमान सिर्फ दिल का दावा नहीं, बल्कि अमल में नज़र आता है। जिसके दिल में सच्चा ईमान होता है, उसके अमल सुधर जाते हैं और वह अल्लाह के हुक्मों का पालन करता है।
  4. अल्लाह की नेमतों की क़द्र करना: बनी इस्राईल को अल्लाह ने बहुत नेमतें दीं, लेकिन उन्होंने अहद तोड़कर उन नेमतों को गंवा दिया। यह हमारे लिए सबक है कि अल्लाह की नेमतों की क़द्र करें और उसके हुक्मों पर चलें, वरना नेमतें छीन ली जाती हैं।
  5. कुरआन और रसूल ﷺ पर ईमान लाना: यह आयत हमें बताती है कि जो लोग रसूल ﷺ पर ईमान नहीं लाते, वे अल्लाह की किताबों पर सच्चा ईमान नहीं रखते। इसलिए हमें रसूल ﷺ की सुन्नत को अपनाना चाहिए और उनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए।

📜 आयत 98-102 — अल-बकरा

98مَن كَانَ عَدُوًّا لِّلَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَرُسُلِهِ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَالَ فَإِنَّ اللَّهَ عَدُوٌّ لِّلْكَافِرِينَ
जो शख्स ख़ुदा और उसके फरिश्तों और उसके रसूलों और (ख़ासकर) जिबराईल व मीकाइल का दुशमन हो तो बेशक खुदा भी (ऐसे) काफ़िरों का दुश्मन है
99وَلَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكَ آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۖ وَمَا يَكْفُرُ بِهَا إِلَّا الْفَاسِقُونَ
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर ऐसी निशानियाँ नाज़िल की हैं जो वाजेए और रौशन हैं और ऐसे नाफरमानों के सिवा उनका कोई इन्कार नहीं कर सकता
100أَوَكُلَّمَا عَاهَدُوا عَهْدًا نَّبَذَهُ فَرِيقٌ مِّنْهُم ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
और उनकी ये हालत है कि जब कभी कोई अहद किया तो उनमें से एक फरीक़ ने तोड़ डाला बल्कि उनमें से अक्सर तो ईमान ही नहीं रखते
101وَلَمَّا جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌ مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ كِتَابَ اللَّهِ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
और जब उनके पास खुदा की तरफ से रसूल (मोहम्मद) आया और उस किताब (तौरेत) की जो उनके पास है तसदीक़ भी करता है तो उन अहले किताब के एक गिरोह ने किताबे खुदा को अपने पसे पुश्त फेंक दिया गोया वह लोग कुछ जानते ही नहीं और उस मंत्र के पीछे पड़ गए
102وَاتَّبَعُوا مَا تَتْلُو الشَّيَاطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَانَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَانُ وَلَٰكِنَّ الشَّيَاطِينَ كَفَرُوا يُعَلِّمُونَ النَّاسَ السِّحْرَ وَمَا أُنزِلَ عَلَى الْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَارُوتَ وَمَارُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَا إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِ بَيْنَ الْمَرْءِ وَزَوْجِهِ ۚ وَمَا هُم بِضَارِّينَ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا لَمَنِ اشْتَرَاهُ مَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِنْ خَلَاقٍ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ
जिसको सुलेमान के ज़माने की सलतनत में शयातीन जपा करते थे हालाँकि सुलेमान ने कुफ्र नहीं इख़तेयार किया लेकिन शैतानों ने कुफ्र एख़तेयार किया कि वह लोगों को जादू सिखाया करते थे और वह चीज़ें जो हारूत और मारूत दोनों फ़रिश्तों पर बाइबिल में नाज़िल की गई थी हालाँकि ये दोनों फ़रिश्ते किसी को सिखाते न थे जब तक ये न कह देते थे कि हम दोनों तो फ़क़त (ज़रियाए आज़माइश) है पस तो (इस पर अमल करके) बेईमान न हो जाना उस पर भी उनसे वह (टोटके) सीखते थे जिनकी वजह से मिया बीवी में तफ़रक़ा डालते हालाँकि बग़ैर इज्ने खुदावन्दी वह अपनी इन बातों से किसी को ज़रर नहीं पहुँचा सकते थे और ये लोग ऐसी बातें सीखते थे जो खुद उन्हें नुक़सान पहुँचाती थी और कुछ (नफा) पहुँचाती थी बावजूद कि वह यक़ीनन जान चुके थे कि जो शख्स इन (बुराईयों) का ख़रीदार हुआ वह आख़िरत में बेनसीब हैं और बेशुबह (मुआवज़ा) बहुत ही बड़ा है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेचा काश (उसे कुछ) सोचे समझे होते
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अनुवाद — अल-बकरा 100

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Tuesday, August 18, 2026

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