अल-बकरा · 128/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
رَبَّنَا وَاجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَا أُمَّةً مُّسْلِمَةً لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ ۝١٢٨
Rabbanaa waj`alnaa muslimaini laka wa min zurriyyatinaaa ummatam muslimatal laka wa arinaa manaasikanaa wa tub `alainaa innaka antat Tawwaabur Raheem
📖 हिंदी अर्थ
(और) ऐ हमारे पालने वाले तू हमें अपना फरमाबरदार बन्दा बना हमारी औलाद से एक गिरोह (पैदा कर) जो तेरा फरमाबरदार हो, और हमको हमारे हज की जगहों दिखा दे और हमारी तौबा क़ुबूल कर, बेशक तू ही बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُسْلِمَيْنِ: आपके आज्ञाकारी, आपके समक्ष समर्पित।
  • ذُرِّيَّتِنَا: हमारी संतान।
  • أُمَّةً: एक समुदाय या जमात।
  • مَنَاسِكَنَا: हमारी इबादत के तरीके, विशेषकर हज के अनुष्ठान।
  • تُبْ عَلَيْنَا: हमारी तौबा कबूल फ़रमा, हमें क्षमा कर दे।

तफसीर (व्याख्या):

यह दुआ हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल (अलैहिमुस्सलाम) की है, जब वे काबा की नींव उठा रहे थे। वे अल्लाह से प्रार्थना कर रहे हैं: "ऐ हमारे रब! हमें अपना सच्चा मुसलमान (आज्ञाकारी) बना, जो पूरी तरह तेरे हुक्म के सामने झुके हुए हों, तेरी वहदानियत के गवाह हों, और तेरी इबादत में किसी को शरीक न करें। हालाँकि वे पहले से ही मुसलमान थे, लेकिन उन्होंने यह दुआ इसलिए की ताकि अल्लाह उन्हें इस हालत पर क़ायम रखे और उन्हें इस्लाम पर स्थिरता प्रदान करे।"

फिर उन्होंने अपनी संतान के लिए दुआ की: "हमारी नस्ल में से एक ऐसा समुदाय पैदा कर जो तेरे आगे पूरी तरह सर झुकाने वाला हो, तेरे हुक्मों का पालन करने वाला हो।" उन्होंने "मिन" (से) शब्द का प्रयोग किया, जो आंशिकता दर्शाता है, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें बता दिया था कि उनकी संतान में से कुछ लोग ज़ालिम भी होंगे। इसलिए उन्होंने सिर्फ उस हिस्से के लिए दुआ की जो ईमान लाएगा।

इसके बाद उन्होंने अल्लाह से माँगा: "हमें अपनी इबादत के तरीके सिखा दे, खासकर हज के अनुष्ठान (मनासिक) समझा दे, ताकि हम तेरी इबादत उसी तरह कर सकें जैसा तू चाहता है।" और अंत में उन्होंने अपनी कमियों और भूलों की क्षमा माँगी: "हमारी तौबा कबूल फरमा और हमारी गलतियों से दरगुज़र कर, बेशक तू ही तौबा कबूल करने वाला और बेहद रहम करने वाला है।"

फ़ायदे (सबक):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अच्छे से अच्छे नेक इंसान को भी अल्लाह से दुआ करते रहना चाहिए कि वह उसे इस्लाम पर स्थिर रखे, क्योंकि स्थिरता अल्लाह ही की तरफ से मिलती है।
  2. माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी संतान की नेकी और ईमान के लिए दुआ करें, और यह दुआ हमारे लिए एक बेहतरीन नमूना है।
  3. इबादत के सही तरीके सीखने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इबादत सिर्फ अल्लाह के बताए हुए तरीके से ही कबूल होती है।
  4. इंसान को कभी भी अपनी इबादत और अमल पर नाज़ नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा अल्लाह से क्षमा की दुआ करते रहना चाहिए, क्योंकि अल्लाह तौबा कबूल करने वाला और रहम करने वाला है।


📜 आयत 126-130 — अल-बकरा

126وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ اجْعَلْ هَٰذَا بَلَدًا آمِنًا وَارْزُقْ أَهْلَهُ مِنَ الثَّمَرَاتِ مَنْ آمَنَ مِنْهُم بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۖ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُ قَلِيلًا ثُمَّ أَضْطَرُّهُ إِلَىٰ عَذَابِ النَّارِ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
और (ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब इबराहीम ने दुआ माँगी कि ऐ मेरे परवरदिगार इस (शहर) को पनाह व अमन का शहर बना, और उसके रहने वालों में से जो खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए उसको तरह-तरह के फल खाने को दें खुदा ने फरमाया (अच्छा मगर) वो कुफ्र इख़तेयार करेगा उसकी दुनिया में चन्द रोज़ (उन चीज़ो से) फायदा उठाने दूँगा फिर (आख़ेरत में) उसको मजबूर करके दोज़ख़ की तरफ खींच ले जाऊँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है
127وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَاهِيمُ الْقَوَاعِدَ مِنَ الْبَيْتِ وَإِسْمَاعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا ۖ إِنَّكَ أَنتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है
128رَبَّنَا وَاجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَا أُمَّةً مُّسْلِمَةً لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَا ۖ إِنَّكَ أَنتَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ
(और) ऐ हमारे पालने वाले तू हमें अपना फरमाबरदार बन्दा बना हमारी औलाद से एक गिरोह (पैदा कर) जो तेरा फरमाबरदार हो, और हमको हमारे हज की जगहों दिखा दे और हमारी तौबा क़ुबूल कर, बेशक तू ही बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है
129رَبَّنَا وَابْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
(और) ऐ हमारे पालने वाले मक्के वालों में उन्हीं में से एक रसूल को भेज जो उनको तेरी आयतें पढ़कर सुनाए और आसमानी किताब और अक्ल की बातें सिखाए और उन (के नुफ़ूस) के पाकीज़ा कर दें बेशक तू ही ग़ालिब और साहिबे तदबीर है
130وَمَن يَرْغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبْرَاهِيمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفْسَهُ ۚ وَلَقَدِ اصْطَفَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُ فِي الْآخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ
और कौन है जो इबराहीम के तरीक़े से नफरत करे मगर जो अपने को अहमक़ बनाए और बेशक हमने उनको दुनिया में भी मुन्तिख़ब कर लिया और वह ज़रूर आख़ेरत में भी अच्छों ही में से होगे
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अनुवाद — अल-बकरा 128

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Tuesday, August 18, 2026

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