Wa iz yarfa`u Ibraaheemul qawaa`ida minal Baitiwa Ismaa`eelu Rabbanaa taqabbal minnaa innaka Antas Samee`ul Aleem
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है
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اور جب ابراہیم اور اسمٰعیل بیت الله کی بنیادیں اونچی کر رہے تھے (تو دعا کئے جاتے تھے کہ) اے پروردگار، ہم سے یہ خدمت قبول فرما۔ بےشک تو سننے والا (اور) جاننے والا ہے
और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
يَرْفَعُ الْقَوَاعِدَ: नींव को ऊपर उठाना, यानी दीवारें खड़ी करना।
الْبَيْتِ: काबा (बैतुल्लाह)।
تَقَبَّلْ مِنَّا: हमारी ओर से स्वीकार कर लीजिए।
السَّمِيعُ: सब कुछ सुनने वाला।
الْعَلِيمُ: सब कुछ जानने वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी! आप उस समय को याद कीजिए जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनके बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) काबा की नींव को ऊपर उठा रहे थे, यानी उसकी दीवारें बना रहे थे। यह कार्य अल्लाह के आदेश से हो रहा था, और वे दोनों अत्यंत विनम्रता और खुशू-खुज़ू के साथ दुआ कर रहे थे: "ऐ हमारे रब! हमारी ओर से यह नेक काम (बैतुल्लाह की तामीर) स्वीकार फ़रमा। बेशक तू ही सब कुछ सुनने वाला है — हमारी दुआओं और पुकार को सुनता है — और तू ही सब कुछ जानने वाला है — हमारी नीयतों और कर्मों से पूरी तरह अवगत है।"
यह दुआ उन्होंने अपने काम के दौरान की, ताकि अल्लाह उनकी मेहनत और इबादत को क़ुबूल करे। यह घटना इस बात की गवाह है कि अल्लाह के नेक बंदे अपने सबसे बड़े अच्छे कामों में भी अल्लाह से क़ुबूलियत की दरख्वास्त करते हैं, क्योंकि क़ुबूलियत अल्लाह ही के हाथ में है।
फ़ायदे (सबक):
अल्लाह के प्यारे नबी इब्राहीम और इस्माईल (अलैहिमास्सलाम) ने सिखाया कि कोई भी नेक काम करते समय अल्लाह से उसे क़ुबूल करने की दुआ करनी चाहिए, चाहे वह काम कितना ही बड़ा और पवित्र क्यों न हो।
इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह की इबादत और उसके दीन की खिदमत में विनम्रता और अख़लाक़ का होना बहुत ज़रूरी है — इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) जैसे अज़ीम नबी भी अल्लाह के सामने झुककर दुआ माँगते हैं।
हमें सिखाया गया कि अपने अच्छे कामों पर घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा अल्लाह से उसकी क़ुबूलियत की उम्मीद रखनी चाहिए, क्योंकि असली कामयाबी अल्लाह की मंज़ूरी में है।
यह आयत मुसलमानों को बैतुल्लाह (काबा) की अज़मत और उसकी तामीर की फ़ज़ीलत की याद दिलाती है, जो इस्लाम का क़िबला और दिलों की जानिब है — इससे अल्लाह के घर से मुहब्बत और उसकी तरफ रुजू करने का जज़्बा पैदा होता है।
दुआ में "السَّمِيعُ الْعَلِيمُ" (सुनने वाला और जानने वाला) के नामों का ज़िक्र हमें सिखाता है कि अल्लाह हमारी हर पुकार सुनता है और हमारी नीयतों को जानता है, इसलिए हमें अपनी दुआओं में सच्ची नीयत और पूरा भरोसा रखना चाहिए।
(ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (उस) घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो
और (ऐ रसूल वह वक्त भी याद दिलाओ) जब इबराहीम ने दुआ माँगी कि ऐ मेरे परवरदिगार इस (शहर) को पनाह व अमन का शहर बना, और उसके रहने वालों में से जो खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए उसको तरह-तरह के फल खाने को दें खुदा ने फरमाया (अच्छा मगर) वो कुफ्र इख़तेयार करेगा उसकी दुनिया में चन्द रोज़ (उन चीज़ो से) फायदा उठाने दूँगा फिर (आख़ेरत में) उसको मजबूर करके दोज़ख़ की तरफ खींच ले जाऊँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है
और (वह वक्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (ये ख़िदमत) कुबूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला है
(और) ऐ हमारे पालने वाले तू हमें अपना फरमाबरदार बन्दा बना हमारी औलाद से एक गिरोह (पैदा कर) जो तेरा फरमाबरदार हो, और हमको हमारे हज की जगहों दिखा दे और हमारी तौबा क़ुबूल कर, बेशक तू ही बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है
(और) ऐ हमारे पालने वाले मक्के वालों में उन्हीं में से एक रसूल को भेज जो उनको तेरी आयतें पढ़कर सुनाए और आसमानी किताब और अक्ल की बातें सिखाए और उन (के नुफ़ूस) के पाकीज़ा कर दें बेशक तू ही ग़ालिब और साहिबे तदबीर है
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