अल-मोमिनुन · 109/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ ۝١٠٩
Innahoo kaana fareequm min `ibaadee yaqooloona Rabbanaaa aamannaa faghfir lanaa warhamnaa wa Anta khairur raahimeen
📖 हिंदी अर्थ
मेरे बन्दों में से एक गिरोह ऐसा भी था जो (बराबर) ये दुआ करता था कि ऐ हमारे पालने वाले हम ईमान लाए तो तू हमको बख्श दे और हम पर रहम कर तू तो तमाम रहम करने वालों से बेहतर है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَرِيقٌ – एक समूह, एक जत्था
  • آمَنَّا – हम ईमान लाए, हमने विश्वास किया
  • فَاغْفِرْ لَنَا – हमारे गुनाह माफ कर दे
  • وَارْحَمْنَا – हम पर रहम फरमा, हम पर दया कर
  • خَيْرُ الرَّاحِمِينَ – सबसे बेहतर रहम करने वाला

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने उन नेक बंदों का ज़िक्र कर रहा है जो ईमान लाए और उन्होंने अपने रब से गिड़गिड़ाकर दुआ माँगी। यह वह लोग थे जिन्होंने दिल से अल्लाह को अपना रब माना, उसकी वहदानियत (एकता) पर यक़ीन किया और अपने अमल से इस ईमान को साबित किया। उनकी ज़ुबान पर यह दुआ जारी थी:

"ऐ हमारे रब! हम तुझ पर ईमान लाए, हमने तुझे अपना मालिक और मेहरबान माना, इसलिए हमारे गुनाहों को माफ कर दे और हम पर रहम फरमा। बेशक तू ही सबसे बेहतर रहम करने वाला है।"

यह दुआ उनके ईमान की गहराई और अल्लाह के सामने अपनी बेबसी का इज़हार है। वे जानते थे कि माफ़ी और रहमत सिर्फ अल्लाह ही से मिल सकती है, क्योंकि वही सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है। उन्होंने अल्लाह से दो चीज़ें माँगीं: एक माफ़ी (गुनाहों की पनाह), और दूसरी रहमत (दया और करम)। यह दुआ सिखाती है कि एक मोमिन को चाहिए कि वह हमेशा अल्लाह की तरफ रुजू करे, अपनी कमज़ोरियों का इज़हार करे और उससे माफ़ी और रहमत की उम्मीद रखे।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह के नेक बंदों की पहचान यह है कि वे दुआ में लगे रहते हैं, अपने गुनाहों का एहसास रखते हैं और अल्लाह की रहमत से निराश नहीं होते। वे जानते हैं कि अल्लाह सबसे अच्छा रहम करने वाला है, इसलिए वे उसी से उम्मीद रखते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हर मुसलमान के लिए एक खूबसूरत सबक़ है। अल्लाह तआला हमें सिखा रहा है कि उसके पास जाने का रास्ता दुआ है, और दुआ का सबसे अच्छा अंदाज़ यह है कि हम अपने ईमान का इज़हार करें, अपने गुनाहों का एहसास करें और अल्लाह से माफ़ी और रहमत की भीख माँगें। यह दुआ हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत असीम है, और वह अपने बंदों को माफ करना पसंद करता है। अगर हम सच्चे दिल से उसकी तरफ रुजू करें, तो वह हमें कभी निराश नहीं करता। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाता है, जैसा कि इस आयत के बाद अल्लाह ने इन्हीं बंदों को जन्नत का वारिस बनाने का वादा किया है। तो आइए, हम भी इस दुआ को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ और अल्लाह से माफ़ी और रहमत की उम्मीद रखें।



📜 आयत 107-111 — अल-मोमिनुन

107رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَالِمُونَ
परवरदिगार हमको (अबकी दफा) किसी तरह इस जहन्नुम से निकाल दे फिर अगर दोबारा हम ऐसा करें तो अलबत्ता हम कुसूरवार हैं
108قَالَ اخْسَئُوا فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ
ख़ुदा फरमाएगा दूर हो इसी में (तुम को रहना होगा) और (बस) मुझ से बात न करो
109إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ
मेरे बन्दों में से एक गिरोह ऐसा भी था जो (बराबर) ये दुआ करता था कि ऐ हमारे पालने वाले हम ईमान लाए तो तू हमको बख्श दे और हम पर रहम कर तू तो तमाम रहम करने वालों से बेहतर है
110فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِي وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ
तो तुम लोगों ने उन्हें मसखरा बना लिया-यहाँ तक कि (गोया) उन लोगों ने तुम से मेरी याद भुला दी और तुम उन पर (बराबर) हँसते रहे
111إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ
मैने आज उनको उनके सब्र का अच्छा बदला दिया कि यही लोग अपनी (ख़ातिरख्वाह) मुराद को पहुँचने वाले हैं
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 109

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Tuesday, August 18, 2026

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