अल-फुरकान · 40/77
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-फुरकान
وَلَقَدْ أَتَوْا عَلَى الْقَرْيَةِ الَّتِي أُمْطِرَتْ مَطَرَ السَّوْءِ ۚ أَفَلَمْ يَكُونُوا يَرَوْنَهَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ نُشُورًا ۝٤٠
Wa laqad ataw `alal qaryatil lateee umtirat mataras saw`; afalam yakoonoo yarawnahaa; bal kaanoo laa yarjoona nushooraa
📖 हिंदी अर्थ
हमने उनको ख़ूब सत्यानास कर छोड़ा और ये लोग (कुफ्फ़ारे मक्का) उस बस्ती पर (हो) आए हैं जिस पर (पत्थरों की) बुरी बारिश बरसाई गयी तो क्या उन लोगों ने इसको देखा न होगा मगर (बात ये है कि) ये लोग मरने के बाद जी उठने की उम्मीद नहीं रखते (फिर क्यों ईमान लाएँ)

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अम्तरत मतरस्सौ: यानी उस पर पत्थरों की बारिश की गई।
  • मतरस्सौ: बुरी बारिश, यानी पत्थरों की बारिश।
  • ला यरजूना नुशूरन: वे पुनर्जीवित होने की उम्मीद नहीं रखते थे, यानी उन्हें क़ियामत और हिसाब पर विश्वास नहीं था।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में मक्का के काफ़िरों की उस हालत की ओर इशारा कर रहे हैं जब वे व्यापार के सिलसिले में शाम (सीरिया) की तरफ़ जाते थे। रास्ते में वे उस बस्ती (सदूम) से गुज़रते थे जो हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम की बस्ती थी। उस बस्ती पर अल्लाह का अज़ाब नाज़िल हुआ था—उन पर आसमान से पत्थरों की बारिश की गई थी, और उन्हें उलट दिया गया था। यह वह बस्ती थी जिसका विनाश इतिहास में एक सबक़ के तौर पर दर्ज है।

अल्लाह फ़रमाता है: क्या ये लोग उस बस्ती से गुज़रते हुए उसे नहीं देखते थे? क्या वे उसके खंडहरों और तबाही के निशानों से सबक़ नहीं सीखते थे? हक़ीक़त यह है कि वे देखते तो थे, लेकिन उनके दिलों पर मुहर लग चुकी थी। वे सिर्फ़ इसलिए सबक़ नहीं लेते थे क्योंकि उन्हें मरने के बाद दोबारा जीवित होने और हिसाब-किताब पर यक़ीन ही नहीं था। अगर उन्हें यक़ीन होता कि एक दिन उन्हें भी अपने आमाल का हिसाब देना है, तो वे उस बस्ती के हालात से ज़रूर इबरत हासिल करते और अपने कु़फ़्र और गुनाहों से बाज़ आते।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इतिहास में गुज़री हुई क़ौमों के हालात पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करना ईमान की निशानी है। अल्लाह तआला ने पिछली क़ौमों के विनाश के निशान इसलिए बाक़ी रखे ताकि आने वाली नस्लें उनसे सबक़ सीखें। जो लोग क़ियामत और हिसाब पर ईमान रखते हैं, वे हर निशान से सबक़ लेते हैं और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ ढालते हैं। यही ईमान इंसान को गुनाहों से रोकता है और नेकी की तरफ़ राग़िब करता है। हमें चाहिए कि हम अपने आस-पास की निशानियों और इतिहास के सबक़ों से हिदायत हासिल करें, और उस दिन की तैयारी करें जब हर इंसान को अपने आमाल का हिसाब देना होगा। अल्लाह तआला हमें सच्चा ईमान और अमल-ए-सालिह की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 38-42 — सूरा अल-फुरकान

38وَعَادًا وَثَمُودَ وَأَصْحَابَ الرَّسِّ وَقُرُونًا بَيْنَ ذَٰلِكَ كَثِيرًا
और (इसी तरह) आद और समूद और नहर वालों और उनके दरमियान में बहुत सी जमाअतों को (हमने हलाक कर डाला)
39وَكُلًّا ضَرَبْنَا لَهُ الْأَمْثَالَ ۖ وَكُلًّا تَبَّرْنَا تَتْبِيرًا
और हमने हर एक से मिसालें बयान कर दी थीं और (खूब समझाया) मगर न माना
40وَلَقَدْ أَتَوْا عَلَى الْقَرْيَةِ الَّتِي أُمْطِرَتْ مَطَرَ السَّوْءِ ۚ أَفَلَمْ يَكُونُوا يَرَوْنَهَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَرْجُونَ نُشُورًا
हमने उनको ख़ूब सत्यानास कर छोड़ा और ये लोग (कुफ्फ़ारे मक्का) उस बस्ती पर (हो) आए हैं जिस पर (पत्थरों की) बुरी बारिश बरसाई गयी तो क्या उन लोगों ने इसको देखा न होगा मगर (बात ये है कि) ये लोग मरने के बाद जी उठने की उम्मीद नहीं रखते (फिर क्यों ईमान लाएँ)
41وَإِذَا رَأَوْكَ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَٰذَا الَّذِي بَعَثَ اللَّهُ رَسُولًا
और (ऐ रसूल) ये लोग तुम्हें जब देखते हैं तो तुम से मसख़रा पन ही करने लगते हैं कि क्या यही वह (हज़रत) हैं जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है (माज़ अल्लाह)
42إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ آلِهَتِنَا لَوْلَا أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ الْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا
अगर बुतों की परसतिश पर साबित क़दम न रहते तो इस शख्स ने हमको हमारे माबूदों से बहका दिया था और बहुत जल्द (क़यामत में) जब ये लोग अज़ाब को देखेंगें तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि राहे रास्त से कौन ज्यादा भटका हुआ था
अल-फुरकानकुरान सूची
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40आयत

अनुवाद — अल-फुरकान 40

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Thursday, October 1, 2026

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