अल-क़सस · 51/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ ۝٥١
Wa laqad wassalnaa lahumul qawla la`allahum yatazakkaroon
📖 हिंदी अर्थ
और हम यक़ीनन लगातार (अपने एहकाम भेजकर) उनकी नसीहत करते रहे ताकि वह लोग नसीहत हासिल करें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَصَّلْنَا: हमने लगातार (क्रमबद्ध रूप से) पहुँचाया, जोड़ा, विस्तार से दिया।
  • الْقَوْل: यहाँ अर्थ है क़ुरआन (अल्लाह का कलाम)।
  • لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ: ताकि वे सोचें, समझें, सीख लें और नसीहत हासिल करें।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने पैग़म्बर ﷺ और उनकी उम्मत पर अपनी बड़ी रहमत और एहसान का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि हमने उन (क़ुरैश के काफ़िरों और अहले-किताब) के लिए अपना कलाम (क़ुरआन) लगातार और क्रमबद्ध रूप से नाज़िल किया। यह क़ुरआन एक ही बार में नहीं उतारा गया, बल्कि तेईस साल की अवधि में थोड़ा-थोड़ा करके, हर हालात और हर ज़रूरत के मुताबिक़ उतारा गया, ताकि उनके दिलों पर इसका गहरा असर हो और वे इसे अच्छी तरह समझ सकें।

इस क़ुरआन में अल्लाह ने पिछली उम्मतों के क़िस्से बयान किए, उनके अंजाम को सामने रखा, जिन्होंने पैग़म्बरों को झुठलाया उन पर आज़ाब नाज़िल हुए, और जिन्होंने ईमान लाया उन्हें कामयाबी मिली। यह सब कुछ इसलिए बयान किया गया ताकि ये लोग इन क़िस्सों से सबक़ हासिल करें, अपनी ग़लतियों से बाज़ आएं, और उन अज़ाबों से बचें जो पिछली उम्मतों पर उनके कुफ़्र और नाफ़रमानी की वजह से आए थे।

अल्लाह तआला का यह एहसान है कि उसने क़ुरआन को आसान बनाया, उसमें हर तरह की मिसालें, वादे, डरावनियाँ और खुशख़बरियाँ रखीं, ताकि लोग जागें, अपनी आँखें खोलें और सीधे रास्ते पर आ जाएँ। यह अल्लाह की रहमत है कि उसने हमें किताब दी, जो हमें ज़िंदगी का सही रास्ता दिखाती है, अंधेरों से निकालकर रोशनी की तरफ ले जाती है।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि क़ुरआन सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समझने, सोचने और उस पर अमल करने के लिए नाज़िल हुआ है। अल्लाह ने इसे हम तक पहुँचाया है ताकि हम उसकी आयतों पर ग़ौर करें, अपनी ज़िंदगी को उसके मुताबिक़ ढालें और उस दिन की तैयारी करें जब हमें अपने आमाल का हिसाब देना होगा। क़ुरआन हमारे लिए रहमत, शिफ़ा और हिदायत है — काश हम इसे अपने दिलों में उतार लें और इसकी रोशनी में अपनी ज़िंदगी गुज़ारें।

🎧 सुनें

📜 आयत 49-53 — अल-क़सस

49قُلْ فَأْتُوا بِكِتَابٍ مِّنْ عِندِ اللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَا أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और ये भी कह चुके कि हम एब के मुन्किर हैं (ऐ रसूल) तुम (इन लोगों से) कह दो कि अगर सच्चे हो तो ख़ुदा की तरफ से एक ऐसी किताब जो इन दोनों से हिदायत में बेहतर हो ले आओ
50فَإِن لَّمْ يَسْتَجِيبُوا لَكَ فَاعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ اتَّبَعَ هَوَاهُ بِغَيْرِ هُدًى مِّنَ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
कि मै भी उस पर चलँ फिर अगर ये लोग (इस पर भी) न मानें तो समझ लो कि ये लोग बस अपनी हवा व हवस की पैरवी करते है और जो शख्स ख़ुदा की हिदायत को छोड़ कर अपनी हवा व हवस की पैरवी करते है उससे ज्यादा गुमराह कौन होगा बेशक ख़ुदा सरकश लोगों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता
51۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
और हम यक़ीनन लगातार (अपने एहकाम भेजकर) उनकी नसीहत करते रहे ताकि वह लोग नसीहत हासिल करें
52الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِن قَبْلِهِ هُم بِهِ يُؤْمِنُونَ
जिन लोगों को हमने इससे पहले किताब अता की है वह उस (क़ुरान) पर ईमान लाते हैं
53وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ
और जब उनके सामने ये पढ़ा जाता है तो बोल उठते हैं कि हम तो इस पर ईमान ला चुके बेशक ये ठीक है (और) हमारे परवरदिगार की तरफ से है हम तो इसको पहले ही मानते थे
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अनुवाद — अल-क़सस 51

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सूरा आयत 51/88 — अल-क़सस القصص (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़सस सुनें, अल-क़सस अनुवाद, अल-क़सस mp3, अल-क़सस pdf. आयत 49–53. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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