अल-क़सस · 53/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़सस
وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ ۝٥٣
Wa izaa yutlaa `alaihim qaaloo aamannaa biheee innahul haqqu mir rabbinaaa innaa kunnaa min qablihee muslimeen
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनके सामने ये पढ़ा जाता है तो बोल उठते हैं कि हम तो इस पर ईमान ला चुके बेशक ये ठीक है (और) हमारे परवरदिगार की तरफ से है हम तो इसको पहले ही मानते थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يُتْلَىٰ – पढ़ा जाता है, सुनाया जाता है
  • آمَنَّا – हम ईमान लाए
  • الْحَقُّ – सत्य, सच्चाई
  • مُسْلِمِينَ – आज्ञाकारी, एकेश्वरवादी, इस्लाम पर चलने वाले

तफ़सीर:

जब इस क़ुरआन की आयतें उन लोगों के सामने पढ़ी जाती हैं जिन्हें हमने पहले किताब (तौरात और इंजील) दी थी, और वे सच्चे दिल से उस पर अमल करने वाले हैं, तो वे फ़ौरन कहते हैं: "हम इस पर ईमान लाए, यक़ीनन यह सत्य है जो हमारे रब की ओर से उतरा है।" वे इसमें कोई संदेह नहीं करते, क्योंकि उन्होंने अपनी किताबों में इसकी पहचान कर ली थी। वे आगे कहते हैं: "हम तो इसके आने से पहले ही मुसलमान (अल्लाह के आज्ञाकारी) थे," यानी हम पहले से ही एकेश्वरवादी थे, हमने अपने नबियों की शिक्षाओं पर ईमान रखा और उन्होंने जो बताया कि एक आख़िरी नबी आएंगे, हमने उन पर ईमान लाने का वादा किया था। उनका दीन हमेशा से एक ही रहा है—इस्लाम, और सभी नबियों का संदेश एक ही था।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान वही है जो दिल की गहराई से निकले, जो सिर्फ़ ज़ुबानी न हो बल्कि अमल से साबित हो। ये लोग क़ुरआन को सुनते ही पहचान गए कि यह वही सच्चाई है जिसका ज़िक्र उनकी किताबों में था, और उन्होंने बिना किसी झिझक के उसे क़बूल कर लिया। यह हमारे लिए एक बेहतरीन सबक़ है कि हम भी क़ुरआन को खुले दिल से सुनें, उस पर ग़ौर करें और उसे अपनी ज़िंदगी में लागू करें।

इस आयत से हमें यह भी पता चलता है कि इस्लाम कोई नया दीन नहीं है, बल्कि यह उसी सच्चाई का नाम है जो आदम (अलैहिस्सलाम) से लेकर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तक सभी नबियों ने पेश की। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ़ रुजू करते हैं, अल्लाह उन्हें सच्चाई पहचानने की तौफ़ीक़ देता है। यह आयत हमें बशारत देती है कि जो लोग अपने दिलों को साफ़ रखते हैं और सच्चाई की तलाश में रहते हैं, अल्लाह उन्हें कभी गुमराह नहीं होने देता। हमें भी चाहिए कि हम क़ुरआन को सुनें, समझें और उस पर अमल करें, ताकि हम भी उन लोगों में शामिल हों जिनके बारे में अल्लाह ने यह गवाही दी कि उन्होंने सच्चाई को पहचाना और उसे क़बूल किया।



📜 आयत 51-55 — सूरा अल-क़सस

51۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
और हम यक़ीनन लगातार (अपने एहकाम भेजकर) उनकी नसीहत करते रहे ताकि वह लोग नसीहत हासिल करें
52الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِن قَبْلِهِ هُم بِهِ يُؤْمِنُونَ
जिन लोगों को हमने इससे पहले किताब अता की है वह उस (क़ुरान) पर ईमान लाते हैं
53وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ
और जब उनके सामने ये पढ़ा जाता है तो बोल उठते हैं कि हम तो इस पर ईमान ला चुके बेशक ये ठीक है (और) हमारे परवरदिगार की तरफ से है हम तो इसको पहले ही मानते थे
54أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
यही वह लोग हैं जिन्हें (इनके आमाले ख़ैर की) दोहरी जज़ा दी जाएगी-चूँकि उन लोगों ने सब्र किया और बदी को नेकी से दफ़ा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (हमारी राह में) ख़र्च करते हैं
55وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ
और जब किसी से कोई बुरी बात सुनी तो उससे किनारा कश रहे और साफ कह दिया कि हमारे वास्ते हमारी कारगुज़ारियाँ हैं और तुम्हारे वास्ते तुम्हारी कारस्तानियाँ (बस दूर ही से) तुम्हें सलाम है हम जाहिलो (की सोहबत) के ख्वाहॉ नहीं
अल-क़ससकुरान सूची
88आयत
मक्कीअवतरण स्थान
53आयत

अनुवाद — अल-क़सस 53

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Friday, October 2, 2026

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