आल-इमरान · 123/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ بِبَدْرٍ وَأَنتُمْ أَذِلَّةٌ ۖ فَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ ۝١٢٣
Wa laqad nasarakumul laahu bi-Badrinw wa antum azillatun fattaqul laaha la`allakum tashkuroon
📖 हिंदी अर्थ
यक़ीनन ख़ुदा ने जंगे बदर में तुम्हारी मदद की (बावजूद के) तुम (दुश्मन के मुक़ाबले में) बिल्कुल बे हक़ीक़त थे (फिर भी) ख़ुदा ने फतेह दी
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بِبَدْرٍ: बद्र के मैदान में (यह मक्का और मदीना के बीच एक प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ पहला महान युद्ध हुआ)।
  • أَذِلَّةٌ: यहाँ अर्थ है संख्या में कम और कमज़ोर, न कि अपमानित या दीन-हीन। अर्थात् साधन और शक्ति की दृष्टि से कमज़ोर होना।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे ईमानवालों! अल्लाह ने तुम्हें बद्र के मैदान में सहायता प्रदान की, जबकि तुम संख्या में बहुत कम थे और तुम्हारे पास युद्ध की सामग्री भी न के बराबर थी। शत्रु की संख्या और हथियार तुमसे कई गुना अधिक थे, फिर भी अल्लाह ने अपनी शक्ति से तुम्हें विजय प्रदान की। यह अल्लाह की ओर से एक स्पष्ट निशानी और महान कृपा थी। इसलिए, हे ईमानवालों! अल्लाह का भय रखो, उसके आदेशों का पालन करो और उसकी मनाही से बचो, ताकि तुम उसकी इन अनगिनत नेमतों के लिए आभार व्यक्त कर सको। यह आभार केवल ज़ुबान से नहीं, बल्कि अल्लाह की आज्ञाकारिता और उसकी इबादत में सच्चाई से प्रकट होता है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की सहायता किसी भी परिस्थिति में उसके वफ़ादार बंदों के साथ होती है, चाहे वे कितने भी कमज़ोर और कम क्यों न हों। यह हमें सिखाता है कि विजय का भरोसा साधनों पर नहीं, बल्कि अल्लाह पर होना चाहिए।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वही सबसे बड़ा सहायक है।
  3. अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करने का सबसे अच्छा तरीका है उसकी आज्ञा का पालन करना और उसकी नाराज़गी से बचना। यही सच्चा तक़वा है।
  4. यह आयत मुसलमानों को प्रोत्साहित करती है कि जब अल्लाह ने कम संख्या और कम साधनों के बावजूद उन्हें विजय दी, तो आज भी अगर वे अल्लाह पर भरोसा करें और तक़वा अपनाएँ, तो अल्लाह उन्हें हर मुश्किल से निकाल सकता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 121-125 — आल-इमरान

121وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ الْمُؤْمِنِينَ مَقَاعِدَ لِلْقِتَالِ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
और (ऐ रसूल) एक वक्त वो भी था जब तुम अपने बाल बच्चों से तड़के ही निकल खड़े हुए और मोमिनीन को लड़ाई के मोर्चों पर बिठा रहे थे और खुदा सब कुछ जानता और सुनता है
122إِذْ هَمَّت طَّائِفَتَانِ مِنكُمْ أَن تَفْشَلَا وَاللَّهُ وَلِيُّهُمَا ۗ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
ये उस वक्त क़ा वाक़या है जब तुममें से दो गिरोहों ने ठान लिया था कि पसपाई करें और फिर (सॅभल गए) क्योंकि ख़ुदा तो उनका सरपरस्त था और मोमिनीन को ख़ुदा ही पर भरोसा रखना चाहिये
123وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ بِبَدْرٍ وَأَنتُمْ أَذِلَّةٌ ۖ فَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
यक़ीनन ख़ुदा ने जंगे बदर में तुम्हारी मदद की (बावजूद के) तुम (दुश्मन के मुक़ाबले में) बिल्कुल बे हक़ीक़त थे (फिर भी) ख़ुदा ने फतेह दी
124إِذْ تَقُولُ لِلْمُؤْمِنِينَ أَلَن يَكْفِيَكُمْ أَن يُمِدَّكُمْ رَبُّكُم بِثَلَاثَةِ آلَافٍ مِّنَ الْمَلَائِكَةِ مُنزَلِينَ
पस तुम ख़ुदा से डरते रहो ताकि (उनके) शुक्रगुज़ार बनो (ऐ रसूल) उस वक्त तुम मोमिनीन से कह रहे थे कि क्या तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है कि तुम्हारा परवरदिगार तीन हज़ार फ़रिश्ते आसमान से भेजकर तुम्हारी मदद करे हॉ (ज़रूर काफ़ी है)
125بَلَىٰ ۚ إِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا وَيَأْتُوكُم مِّن فَوْرِهِمْ هَٰذَا يُمْدِدْكُمْ رَبُّكُم بِخَمْسَةِ آلَافٍ مِّنَ الْمَلَائِكَةِ مُسَوِّمِينَ
बल्कि अगर तुम साबित क़दम रहो और (रसूल की मुख़ालेफ़त से) बचो और कुफ्फ़ार अपने (जोश में) तुमपर चढ़ भी आये तो तुम्हारा परवरदिगार ऐसे पॉच हज़ार फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद करेगा जो निशाने जंग लगाए हुए डटे होंगे और ख़ुदा ने ये मदद सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी के लिए की है
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अनुवाद — आल-इमरान 123

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Tuesday, August 18, 2026

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