आल-इमरान · 188/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَفْرَحُونَ بِمَا أَتَوا وَّيُحِبُّونَ أَن يُحْمَدُوا بِمَا لَمْ يَفْعَلُوا فَلَا تَحْسَبَنَّهُم بِمَفَازَةٍ مِّنَ الْعَذَابِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝١٨٨
Laa tahsabannal lazeena yafrahoona bimaaa ataw wa yuhibbona ai yuhmadoo bimaa lam yaf`aloo falaa tahsabunnahum bimafaazatim minal `azaabi wa lahum `azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम उन्हें ख्याल में भी न लाना जो अपनी कारस्तानी पर इतराए जाते हैं और किया कराया ख़ाक नहीं (मगर) तारीफ़ के ख़ास्तगार (चाहते) हैं पस तुम हरगिज़ ये ख्याल न करना कि इनको अज़ाब से छुटकारा है बल्कि उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَفْرَحُونَ – खुश होते हैं, प्रसन्न होते हैं।
  • أَتَوا – किए, कमाए (यहाँ बुरे कर्मों का उल्लेख है)।
  • يُحْمَدُوا – उनकी प्रशंसा की जाए, उन्हें सराहा जाए।
  • مَفَازَةٍ – नजात, छुटकारा, सुरक्षित स्थान।
  • عَذَابٌ أَلِيمٌ – दर्दनाक और पीड़ादायक यातना।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप उन लोगों के बारे में कभी यह ख़याल न करें जो अपने किए हुए बुरे कर्मों पर खुश होते हैं और चाहते हैं कि लोग उनकी उन अच्छाइयों के लिए प्रशंसा करें जो उन्होंने की ही नहीं। यह हालत मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) और यहूदियों जैसे लोगों की थी, जो अच्छे कामों को छोड़कर बुराइयों में मशगूल रहते थे, फिर भी लोगों से तारीफ़ की उम्मीद रखते थे।

ऐ नबी! आप हरगिज़ यह न समझें कि ऐसे लोग अज़ाब से बच निकलने की जगह पा लेंगे। सच तो यह है कि उनके लिए आख़िरत में बहुत ही दर्दनाक और तकलीफ़देह यातना तैयार है। यह इसलिए कि उन्होंने नेकी का दिखावा किया, झूठी प्रशंसा चाही, और अपने बुरे कर्मों पर इतराए, जबकि हक़ीक़त में वे अल्लाह की नाफ़रमानी में डूबे हुए थे। यह आयत उन सभी लोगों के लिए सख्त चेतावनी है जो बुराई पर खुश होते हैं, अपने गुनाहों पर घमंड करते हैं, और जो काम उन्होंने नहीं किए उनकी तारीफ़ के भूखे रहते हैं।

फ़ायदे (सबक़):

  1. इंसान को अपने अच्छे कामों पर भी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि घमंड नेकियों को बर्बाद कर देता है। जो लोग अपनी बुराइयों पर खुश होते हैं, वह अल्लाह के करीब नहीं बल्कि उसकी नाराज़गी के पात्र बनते हैं।
  2. दिखावे के लिए अच्छाई का जतलाना और लोगों से प्रशंसा चाहना अल्लाह के यहाँ बहुत बड़ा गुनाह है। मुसलमान को चाहिए कि उसकी नीयत सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए हो, न कि लोगों की तारीफ़ के लिए।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नज़र में इंसान की हक़ीक़त उसके ज़ाहिरी दिखावे से नहीं, बल्कि उसके अंदरूनी ईमान और अच्छे आचरण से होती है। जो लोग झूठ और दिखावे का सहारा लेते हैं, वे अल्लाह की पकड़ से नहीं बच सकते।
  4. मोमिन को चाहिए कि वह सच्चाई और ईमानदारी की ज़िंदगी गुज़ारे, अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हो और अल्लाह से माफ़ी माँगे, क्योंकि अल्लाह तौबा करने वालों को माफ़ कर देता है, लेकिन दिखावे और घमंड वालों के लिए दर्दनाक अज़ाब है।


📜 आयत 186-190 — आल-इमरान

186۞ لَتُبْلَوُنَّ فِي أَمْوَالِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ وَلَتَسْمَعُنَّ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلِكُمْ وَمِنَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا أَذًى كَثِيرًا ۚ وَإِن تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ ذَٰلِكَ مِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ
(मुसलमानों) तुम्हारे मालों और जानों का तुमसे ज़रूर इम्तेहान लिया जाएगा और जिन लोगो को तुम से पहले किताबे ख़ुदा दी जा चुकी है (यहूद व नसारा) उनसे और मुशरेकीन से बहुत ही दुख दर्द की बातें तुम्हें ज़रूर सुननी पड़ेंगी और अगर तुम (उन मुसीबतों को) झेल जाओगे और परहेज़गारी करते रहोगे तो बेशक ये बड़ी हिम्मत का काम है
187وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَتُبَيِّنُنَّهُ لِلنَّاسِ وَلَا تَكْتُمُونَهُ فَنَبَذُوهُ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ وَاشْتَرَوْا بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا ۖ فَبِئْسَ مَا يَشْتَرُونَ
और (ऐ रसूल) इनको वह वक्त तो याद दिलाओ जब ख़ुदा ने अहले किताब से एहद व पैमान लिया था कि तुम किताबे ख़ुदा को साफ़ साफ़ बयान कर देना और (ख़बरदार) उसकी कोई बात छुपाना नहीं मगर इन लोगों ने (ज़रा भी ख्याल न किया) और उनको पसे पुश्त फेंक दिया और उसके बदले में (बस) थोड़ी सी क़ीमत हासिल कर ली पस ये क्या ही बुरा (सौदा) है जो ये लोग ख़रीद रहे हैं
188لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَفْرَحُونَ بِمَا أَتَوا وَّيُحِبُّونَ أَن يُحْمَدُوا بِمَا لَمْ يَفْعَلُوا فَلَا تَحْسَبَنَّهُم بِمَفَازَةٍ مِّنَ الْعَذَابِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
(ऐ रसूल) तुम उन्हें ख्याल में भी न लाना जो अपनी कारस्तानी पर इतराए जाते हैं और किया कराया ख़ाक नहीं (मगर) तारीफ़ के ख़ास्तगार (चाहते) हैं पस तुम हरगिज़ ये ख्याल न करना कि इनको अज़ाब से छुटकारा है बल्कि उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
189وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
और आसमान व ज़मीन सब ख़ुदा ही का मुल्क है और ख़ुदा ही हर चीज़ पर क़ादिर है
190إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ
इसमें तो शक ही नहीं कि आसमानों और ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के फेर बदल में अक्लमन्दों के लिए (क़ुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियॉ हैं
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अनुवाद — आल-इमरान 188

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Tuesday, August 18, 2026

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