आल-इमरान · 190/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ ۝١٩٠
Inna fee khalqis samaawati wal ardi wakhtilaafil laili wannahaari la Aayaatil liulil albaab
📖 हिंदी अर्थ
इसमें तो शक ही नहीं कि आसमानों और ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के फेर बदल में अक्लमन्दों के लिए (क़ुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियॉ हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ: आकाशों और धरती की रचना (बिना किसी पूर्व नमूने के, शून्य से पैदा करना)।
  • اخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ: रात और दिन का एक-दूसरे के पीछे आना-जाना, और उनका लंबा-छोटा होना।
  • لَآيَاتٍ: बड़े निशान और प्रमाण।
  • لِأُولِي الْأَلْبَابِ: उन लोगों के लिए जो बुद्धि और समझ रखते हैं (स्वस्थ दिमाग वाले)।

विस्तृत व्याख्या:

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला अपनी महान शक्ति और एकता की ओर संकेत करते हुए कहता है कि आकाशों और धरती की रचना — जो बिना किसी सांचे या पूर्व नमूने के शून्य से की गई है, और रात तथा दिन का बारी-बारी से आना, उनका लंबा और छोटा होना, कभी रात बड़ी होना और दिन छोटा, तो कभी इसका उलट — ये सब चीज़ें उन लोगों के लिए स्पष्ट प्रमाण और निशानियाँ हैं जिनके पास सही अक्ल और समझ है। ये निशानियाँ उन्हें इस बात की ओर मार्गदर्शन करती हैं कि इस कायनात का कोई ख़ालिक़ (रचयिता) है, जो अकेला है, जिसकी शक्ति असीमित है, और वही इबादत (पूजा) के योग्य है। जो व्यक्ति इन प्राकृतिक घटनाओं पर गहराई से विचार करता है, वह अपनी बुद्धि से यह निष्कर्ष निकालता है कि यह सब कुछ अपने आप नहीं बना, बल्कि एक सर्वशक्तिमान रचयिता की कृति है।


इस आयत से मिलने वाले लाभ:

  1. ईमान की मज़बूती: यह आयत हमें सिखाती है कि कायनात की हर चीज़ अल्लाह की वजूद (अस्तित्व) और उसकी एकता की गवाह है। जब हम आसमान, ज़मीन, रात और दिन के बदलाव को देखते हैं, तो हमारा ईमान और पुख्ता होता है।
  2. चिंतन और विचार की प्रेरणा: अल्लाह ने इंसान को अक्ल दी है ताकि वह इन निशानियों पर ग़ौर करे। यह आयत हमें बताती है कि सच्चा ज्ञान और समझ वही है जो इंसान को अल्लाह की ओर ले जाए।
  3. इबादत में एकाग्रता: जब इंसान इन अद्भुत रचनाओं को देखता है, तो उसका दिल अल्लाह की इबादत की ओर झुकता है और वह अपने रब के सामने नम्र होता है।
  4. जीवन में उद्देश्य की समझ: यह आयत हमें याद दिलाती है कि यह दुनिया बेकार नहीं बनाई गई, बल्कि इसके पीछे एक बुद्धिमानी भरा उद्देश्य है — अल्लाह को पहचानना और उसकी इबादत करना।
  5. विज्ञान और धर्म का सामंजस्य: यह आयत बताती है कि जो लोग ब्रह्मांड की संरचना और प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करते हैं, वे जितना गहराई में जाते हैं, उतना ही अल्लाह की महानता के करीब पहुँचते हैं। इस्लाम ज्ञान और विज्ञान को प्रोत्साहित करता है, बशर्ते वह अल्लाह की पहचान की ओर ले जाए।


📜 आयत 188-192 — आल-इमरान

188لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَفْرَحُونَ بِمَا أَتَوا وَّيُحِبُّونَ أَن يُحْمَدُوا بِمَا لَمْ يَفْعَلُوا فَلَا تَحْسَبَنَّهُم بِمَفَازَةٍ مِّنَ الْعَذَابِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
(ऐ रसूल) तुम उन्हें ख्याल में भी न लाना जो अपनी कारस्तानी पर इतराए जाते हैं और किया कराया ख़ाक नहीं (मगर) तारीफ़ के ख़ास्तगार (चाहते) हैं पस तुम हरगिज़ ये ख्याल न करना कि इनको अज़ाब से छुटकारा है बल्कि उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
189وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
और आसमान व ज़मीन सब ख़ुदा ही का मुल्क है और ख़ुदा ही हर चीज़ पर क़ादिर है
190إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ
इसमें तो शक ही नहीं कि आसमानों और ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के फेर बदल में अक्लमन्दों के लिए (क़ुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियॉ हैं
191الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَٰذَا بَاطِلًا سُبْحَانَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
जो लोग उठते बैठते करवट लेते (अलगरज़ हर हाल में) ख़ुदा का ज़िक्र करते हैं और आसमानों और ज़मीन की बनावट में ग़ौर व फ़िक्र करते हैं और (बेसाख्ता) कह उठते हैं कि ख़ुदावन्दा तूने इसको बेकार पैदा नहीं किया तू (फेले अबस से) पाक व पाकीज़ा है बस हमको दोज़क के अज़ाब से बचा
192رَبَّنَا إِنَّكَ مَن تُدْخِلِ النَّارَ فَقَدْ أَخْزَيْتَهُ ۖ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ
ऐ हमारे पालने वाले जिसको तूने दोज़ख़ में डाला तो यक़ीनन उसे रूसवा कर डाला और जुल्म करने वाले का कोई मददगार नहीं
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अनुवाद — आल-इमरान 190

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Tuesday, August 18, 2026

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