लुकमान · 30/34
अनुवाद उच्चारण — लुकमान
ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ الْبَاطِلُ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ ۝٣٠
Zaalika bi annal laaha Huwal Haqqu wa anna maa yad`oona min doonihil baatilu wa annal laaha Huwal `Aliyyul Kabeer
📖 हिंदी अर्थ
ये (सब बातें) इस सबब से हैं कि ख़ुदा ही यक़ीनी बरहक़ (माबूद) है और उस के सिवा जिसको लोग पुकारते हैं यक़ीनी बिल्कुल बातिल और इसमें शक नहीं कि ख़ुदा ही आलीशान और बड़ा रुतबे वाला है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْحَقّ (अल-हक़्क़): सत्य, जिसका अस्तित्व स्वयं में स्थिर हो और जो कभी समाप्त न हो।
  • الْبَاطِل (अल-बातिल): असत्य, झूठ, जिसका कोई वास्तविक आधार न हो और जो मिथ्या हो।
  • الْعَلِيّ (अल-अली): सर्वोच्च, जो अपनी ज़ात, अपनी क़ुदरत और अपने दबदबे में सबसे ऊपर हो।
  • الْكَبِير (अल-कबीर): महान, जो हर चीज़ से बड़ा हो और जिसके समक्ष सब कुछ छोटा हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन महान सत्यों को स्पष्ट करती है जो ब्रह्मांड की हर रचना में झलकते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह सब कुछ — यानी जो नियम, व्यवस्था और प्रबंधन तुम देख रहे हो — इसलिए है ताकि तुम जान लो कि अल्लाह ही सच्चा सत्य है। वह अपनी ज़ात (अस्तित्व), अपने गुणों और अपने कार्यों में पूर्ण सत्य है। उसके सिवा जो कुछ भी है, वह मिथ्या और असत्य है। जिन्हें लोग अल्लाह के सिवा पुकारते हैं — चाहे वे मूर्तियाँ हों, देवता हों या कोई और — वे सब बातिल हैं, उनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं जो पूजा के योग्य हो। वे न कुछ दे सकते हैं, न कुछ छीन सकते हैं, न किसी की सहायता कर सकते हैं।

फिर अल्लाह तआला अपनी दो महान विशेषताओं का वर्णन करता है: वह अल-अली (सर्वोच्च) है — अपनी ज़ात में, अपनी क़ुदरत में और अपने दबदबे में वह सभी मख़लूक़ात (प्राणियों) से ऊपर है। उसके समक्ष हर चीज़ झुकी हुई है, हर चीज़ उसकी अधीनता स्वीकार करती है। और वह अल-कबीर (महान) है — हर चीज़ से बड़ा, जिसके सामने सारी कायनात छोटी है। उसकी महानता का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता, और उसकी बड़ाई का कोई अंत नहीं। वह इससे पाक है कि उसका कोई साझीदार हो, क्योंकि जो सच्चा सत्य है और सर्वोच्च महान है, उसके लिए कोई शरीक (साझीदार) होना असंभव है।

इस आयत में हमारे लिए एक बड़ी शिक्षा है — कि हम केवल अल्लाह की इबादत करें, उसी से मदद माँगें, और उसी पर भरोसा रखें। जब हमें यह यक़ीन हो जाए कि अल्लाह ही सत्य है और उसके सिवा सब कुछ मिथ्या है, तो हमारा दिल किसी और की ओर नहीं झुकेगा। हमारी नमाज़, हमारी दुआ, हमारी उम्मीदें — सब कुछ उसी की तरफ़ हो जाएँगी। यही वह चीज़ है जो हमें सच्ची शांति और सुकून देती है। जो व्यक्ति अल्लाह को पहचान लेता है, उसका जीवन उद्देश्यपूर्ण हो जाता है, और वह हर मुश्किल में यह जानकर सब्र करता है कि अल्लाह सबसे बड़ा है, सबसे ऊपर है, और वही हर चीज़ पर क़ादिर है।



📜 आयत 28-32 — लुकमान

28مَّا خَلْقُكُمْ وَلَا بَعْثُكُمْ إِلَّا كَنَفْسٍ وَاحِدَةٍ ۗ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌ
तुम सबका पैदा करना और फिर (मरने के बाद) जिला उठाना एक शख्स के (पैदा करने और जिला उठाने के) बराबर है बेशक ख़ुदा (तुम सब की) सुनता और सब कुछ देख रहा है
29أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يُولِجُ اللَّيْلَ فِي النَّهَارِ وَيُولِجُ النَّهَارَ فِي اللَّيْلِ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ كُلٌّ يَجْرِي إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى وَأَنَّ اللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
क्या तूने ये भी ख्याल न किया कि ख़ुदा ही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल कर देता है (तो रात बढ़ जाती है) और दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल कर देता है (तो दिन बढ़ जाता है) उसी ने आफताब व माहताब को (गोया) तुम्हारा ताबेए बना दिया है कि एक मुक़र्रर मीयाद तक (यूँ ही) चलता रहेगा और (क्या तूने ये भी ख्याल न किया कि) जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़ूब वाकिफकार है
30ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ الْبَاطِلُ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ
ये (सब बातें) इस सबब से हैं कि ख़ुदा ही यक़ीनी बरहक़ (माबूद) है और उस के सिवा जिसको लोग पुकारते हैं यक़ीनी बिल्कुल बातिल और इसमें शक नहीं कि ख़ुदा ही आलीशान और बड़ा रुतबे वाला है
31أَلَمْ تَرَ أَنَّ الْفُلْكَ تَجْرِي فِي الْبَحْرِ بِنِعْمَتِ اللَّهِ لِيُرِيَكُم مِّنْ آيَاتِهِ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
क्या तूने इस पर भी ग़ौर नहीं किया कि ख़ुदा ही के फज़ल से कश्ती दरिया में बहती चलती रहती है ताकि (लकड़ी में ये क़ूवत देकर) तुम लोगों को अपनी (कुदरत की) बाज़ निशानियाँ दिखा दे बेशक उस में भी तमाम सब्र व शुक्र करने वाले (बन्दों) के लिए (कुदरत ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ दिखा दे बेशक इसमें भी तमाम सब्र व शुक्र करने वाले (बन्दों) के लिए (क़ुदरते ख़ुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं
32وَإِذَا غَشِيَهُم مَّوْجٌ كَالظُّلَلِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ فَمِنْهُم مُّقْتَصِدٌ ۚ وَمَا يَجْحَدُ بِآيَاتِنَا إِلَّا كُلُّ خَتَّارٍ كَفُورٍ
और जब उन्हें मौज (ऊँची होकर) साएबानों की तरह (ऊपर से) ढॉक लेती है तो निरा खुरा उसी का अक़ीदा रखकर ख़ुदा को पुकारने लगते हैं फिर जब ख़ुदा उनको नजात देकर खुश्की तक पहुँचा देता है तो उनमें से बाज़ तो कुछ देर एतदाल पर रहते हैं (और बाज़ पक्के काफिर) और हमारी (क़ुदरत की) निशानियों से इन्कार तो बस बदएहद और नाशुक्रे ही लोग करते हैं
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अनुवाद — लुकमान 30

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Tuesday, August 18, 2026

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