अनुवाद — Tafsir
यह वही अल्लाह है जो छिपे और प्रकट सब कुछ जानने वाला है, सब पर प्रभुत्व रखने वाला और अपने बंदों पर अत्यंत दयालु है।
शब्दों के अर्थ:
- الْغَيْبِ (अल-ग़ैब): वह सब कुछ जो आँखों से छिपा हो, जैसे भविष्य की घटनाएँ, दिलों के भेद, और वे चीज़ें जो इंद्रियों की पहुँच से परे हैं।
- الشَّهَادَةِ (अश-शहादाह): वह सब कुछ जो दिखाई देता है, सुना जाता है, या जिसे हम महसूस कर सकते हैं — यानी प्रत्यक्ष संसार।
- الْعَزِيزُ (अल-अज़ीज़): सर्वशक्तिमान, जो अपनी ताकत और प्रभुत्व में अजेय है, कोई उसे हरा नहीं सकता।
- الرَّحِيمُ (अर-रहीम): अत्यंत दयालु, जो अपने बंदों पर विशेष रूप से दया करता है।
विस्तृत व्याख्या:
यह आयत उस महान सत्य की ओर इशारा करती है जो पिछली आयतों में वर्णित अल्लाह के कार्यों का निष्कर्ष है। जिसने आकाशों और धरती को छह दिनों में बनाया, जो आकाश से पानी उतारता है और उससे मृत भूमि को जीवित करता है, वही अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है। वह न केवल उन चीज़ों को जानता है जो हमारी आँखों के सामने हैं, बल्कि वह सब कुछ भी जानता है जो हमारी नज़रों से छिपा है — चाहे वह दिलों के राज़ हों, सीने में छिपे भेद हों, या भविष्य के रहस्य। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है, न छोटी और न बड़ी, न खुली और न छिपी।
वह अज़ीज़ है — अर्थात सर्वशक्तिमान और अजेय। उसकी शक्ति के आगे कोई नहीं टिक सकता, उसके फैसले को कोई बदल नहीं सकता। वह जो चाहता है करता है और जो चाहता है आदेश देता है। उसकी शक्ति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता, और वह अपने दुश्मनों से पूरा बदला लेने वाला है।
साथ ही वह रहीम है — अर्थात अपने ईमानवाले बंदों पर अत्यंत दयालु है। उसकी दया उसकी शक्ति के साथ जुड़ी हुई है। वह जितना शक्तिशाली है, उतना ही दयालु भी है। वह अपने बंदों की भलाई चाहता है, उन्हें मार्गदर्शन देता है, उनके पापों को क्षमा करता है, और उन्हें जन्नत की ओर बुलाता है।
यह आयत हमें सिखाती है कि हमारा रब हर चीज़ को देख रहा है और जान रहा है। जब हमें यह यकीन हो जाए कि अल्लाह हमारे अंदर और बाहर सब कुछ जानता है, तो हमें अपने अंदर और बाहर दोनों को सुधारना चाहिए। हमें चाहिए कि हम अकेले में भी वही करें जो अल्लाह को पसंद है, क्योंकि वह हमें देख रहा है। और जब हम गलती कर बैठें, तो उसकी दया से निराश न हों — क्योंकि वह रहीम है, क्षमा करने वाला है। उसकी शक्ति हमें भय देती है, और उसकी दया हमें आशा देती है। इन दोनों के बीच संतुलन ही एक सच्चे मुसलमान की पहचान है।
यह आयत हमें यह भी बताती है कि जो व्यक्ति इस अल्लाह पर ईमान रखता है और उसकी शक्ति और दया को पहचानता है, वह कभी अकेला और असहाय महसूस नहीं करता। उसे मालूम है कि उसका रब हर पल उसके साथ है, उसकी हर बात सुनता है, उसकी हर दुआ जानता है, और उसकी हर ज़रूरत को पूरा करने पर क़ादिर है। यही वह विश्वास है जो दिल को सुकून देता है और जीवन को अर्थ प्रदान करता है।
📜 आयत 4-8 — अस-सजदा
अनुवाद — अस-सजदा 6
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Tuesday, August 18, 2026
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