Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- مَحَارِيبَ (मेहराबें): मस्जिदें, इबादत की जगहें, या ऊँची इमारतें।
- تَمَاثِيلَ (मूर्तियाँ/प्रतिमाएँ): ताँबे और शीशे से बनी आकृतियाँ, जो उस समय की शरीयत में जायज़ थीं।
- جِفَانٍ (जिफ़ान): बड़े-बड़े प्याले या थालियाँ।
- كَالْجَوَابِ (कल-जवाब): "जाबिया" का बहुवचन, यानी बड़े हौज़ (पानी के तालाब) के समान विशाल बर्तन।
- قُدُورٍ رَّاسِيَاتٍ (कुदूरिन रासियात): ऐसी बड़ी देगें (हंडियाँ) जो अपनी जगह पर जमी हुई हों, इतनी बड़ी कि उन्हें हिलाना मुश्किल हो।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के उस दौर का वर्णन करती है जब अल्लाह ने जिन्नात को उनके अधीन कर दिया था। वे जिन्न हज़रत सुलेमान के कहने पर उनके लिए अद्भुत चीज़ें बनाते थे — ऊँची-ऊँची मस्जिदें और इबादतगाहें, ताँबे और शीशे की बनी हुई तस्वीरें (जो उस शरीयत में हलाल थीं), इतने बड़े बर्तन कि वे पानी के हौज़ों जैसे दिखते थे, और ऐसी विशाल देगें जो अपनी जगह से हिलती ही नहीं थीं। यह सब अल्लाह की उस महान शक्ति और करम का प्रदर्शन था जो उसने अपने नबी को दिया था।
इसके बाद अल्लाह तआला ने दाऊद (अलैहिस्सलाम) के खानदान को संबोधित करते हुए कहा: "ऐ दाऊद के घराने वालों! इन नेमतों के बदले शुक्र अदा करो।" यानी अल्लाह ने उन्हें जो कुछ दिया था — राज्य, इल्म, हिकमत, और ये सारी सुविधाएँ — उसका सही तरीक़ा यह था कि वे अल्लाह की इबादत करें, उसकी आज्ञा का पालन करें, और उसके एहसानों को याद रखें। शुक्र सिर्फ़ ज़बान से "शुक्र" कहना नहीं है, बल्कि अल्लाह की नेमतों को उसकी राह में इस्तेमाल करना और उसकी नाफ़रमानी से बचना है।
फिर अल्लाह तआला ने एक गहरी हक़ीक़त बयान की: "मेरे बंदों में से शुक्र करने वाले बहुत कम हैं।" यह एक सामान्य सच्चाई है कि इंसान अक्सर नेमतों को भूल जाता है और उन्हें अपनी ताक़त या किस्मत का नतीजा समझ लेता है। अल्लाह के यहाँ वही बंदे पसंदीदा हैं जो हर हाल में — सुख में भी और दुख में भी — अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) और उनका खानदान उन्हीं क़िल्लत (कम संख्या) वाले शुक्रगुज़ार बंदों में से थे, और यही उनकी महानता का राज़ था।
दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतें जितनी बड़ी होती हैं, उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी भी होती है। जब हमें अल्लाह ने ताक़त, माल, इल्म या कोई और नेमत दी है, तो हमें चाहिए कि उसे अल्लाह की राह में खर्च करें। शुक्र का असली मतलब यह है कि हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की बताई हुई राह पर चलाएँ। और याद रखें — शुक्र करने वालों की संख्या कम है, लेकिन अल्लाह उन्हीं कम लोगों को सबसे ज़्यादा प्यार करता है और उनकी नेमतों में और बरकत देता है। आइए, हम भी उन्हीं क़िल्लत वाले शुक्रगुज़ार बंदों में शामिल होने की कोशिश करें, ताकि अल्लाह की रहमत और मोहब्बत हमारे ऊपर भी हो।
📜 आयत 11-15 — सूरा सबा
अनुवाद — सबा 13
सूरा सबा आयत 13 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ग़रज़ सुलेमान को जो बनवाना मंज़ूर होता ये जिन्नात उनके…सूरा आयत 13/54 — सूरा सबा سبأ (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा सबा सुनें, सूरा सबा अनुवाद, सूरा सबा mp3, सूरा सबा pdf. आयत 11–15. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा सबा
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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