साद · 63/88
अनुवाद उच्चारण — साद
أَتَّخَذْنَاهُمْ سِخْرِيًّا أَمْ زَاغَتْ عَنْهُمُ الْأَبْصَارُ ۝٦٣
Attakhaznaahum sikh riyyan am zaaghat `anhumul absaar
📖 हिंदी अर्थ
क्या हम उनसे (नाहक़) मसखरापन करते थे या उनकी तरफ से (हमारी) ऑंखे पलट गयी हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سِخْرِيًّا: मज़ाक़, ठट्ठा, उपहास — यानी हमने उन्हें मज़ाक़ में उड़ाया था।
  • زَاغَتْ: भटक गईं, हट गईं, टेढ़ी हो गईं।
  • الْأَبْصَارُ: आँखें, दृष्टियाँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस भयानक दृश्य का चित्रण करती है जब जहन्नुम (नर्क) के नेता और सरदार अपने चारों ओर नज़र दौड़ाते हैं और उन लोगों को नहीं पाते जिन्हें वे दुनिया में बुरा और तुच्छ समझा करते थे। वे हैरान और परेशान होकर कहते हैं: "हमें क्या हो गया? हम उन लोगों को अपने साथ आग में क्यों नहीं देख रहे जिन्हें हम दुनिया में अपने से कमतर और नीच समझते थे? क्या हमने उन्हें मज़ाक़ में उड़ाने में ग़लती की थी? क्या वे सचमुच अच्छे लोग थे और हमारा उनका मज़ाक़ उड़ाना हमारी भूल थी? या फिर वे हमारे साथ इसी आग में मौजूद हैं, लेकिन हमारी आँखें उन्हें देख नहीं पा रही हैं?"

यह सवाल उनके दिलों में पछतावे और हैरानी की आग को और भड़का देता है। वे समझते थे कि जिन लोगों को वे दुनिया में बेइज़्ज़त करते थे — जैसे ग़रीब, कमज़ोर, सच्चे ईमान वाले — वे उनसे बदतर हैं, लेकिन आज हक़ीक़त उनके सामने उल्टी नज़र आती है। असल में वे लोग जन्नत में हैं, और ये सरदार जहन्नुम में। उनकी आँखें उन्हें देख नहीं पा रहीं क्योंकि वे वहाँ हैं ही नहीं — वे तो ऊँचे मुक़ाम पर हैं, जबकि ये लोग सबसे निचले दर्जे में।


दावती पहलू (शिक्षाप्रद संदेश):

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है — कभी भी किसी इंसान को उसकी दुनियावी हैसियत, रूप-रंग, माल-दौलत या समाज में उसके दर्जे की वजह से हेय न समझें। अल्लाह के यहाँ इज़्ज़त का पैमाना तक़्वा (परहेज़गारी) है, न कि दौलत या ओहदा। आज जिन लोगों को आप तुच्छ समझते हैं, कल क़यामत के दिन वही आपसे बेहतर हो सकते हैं। यह भी याद रखें कि दुनिया में किसी का मज़ाक़ उड़ाना, उसे नीचा दिखाना, उस पर हँसना — यह सब शैतानी काम है और अल्लाह को बहुत नापसंद है। जो लोग दुनिया में दूसरों को ठट्ठे में उड़ाते हैं, वे आख़िरत में ऐसे पछताएँगे कि उनका पछतावा उन्हें और जला देगा। इसलिए हमें चाहिए कि हम हर इंसान के साथ अच्छा सुलूक करें, किसी को छोटा न समझें, और यह यक़ीन रखें कि अल्लाह के यहाँ सबसे बड़ी इज़्ज़त उसी की है जो उससे डरता है और उसकी राह पर चलता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 61-65 — साद

61قَالُوا رَبَّنَا مَن قَدَّمَ لَنَا هَٰذَا فَزِدْهُ عَذَابًا ضِعْفًا فِي النَّارِ
(फिर वह) अर्ज़ करेगें परवरदिगार जिस शख्स ने हमारा इस (बला) से सामना करा दिया तो तू उस पर हमसे बढ़कर जहन्नुम में दो गुना अज़ाब कर
62وَقَالُوا مَا لَنَا لَا نَرَىٰ رِجَالًا كُنَّا نَعُدُّهُم مِّنَ الْأَشْرَارِ
और (फिर) खुद भी कहेगें हमें क्या हो गया है कि हम जिन लोगों को (दुनिया में) शरीर शुमार करते थे हम उनको यहाँ (दोज़ख़) में नहीं देखते
63أَتَّخَذْنَاهُمْ سِخْرِيًّا أَمْ زَاغَتْ عَنْهُمُ الْأَبْصَارُ
क्या हम उनसे (नाहक़) मसखरापन करते थे या उनकी तरफ से (हमारी) ऑंखे पलट गयी हैं
64إِنَّ ذَٰلِكَ لَحَقٌّ تَخَاصُمُ أَهْلِ النَّارِ
इसमें शक नहीं कि जहन्नुमियों का बाहम झगड़ना ये बिल्कुल यक़ीनी ठीक है
65قُلْ إِنَّمَا أَنَا مُنذِرٌ ۖ وَمَا مِنْ إِلَٰهٍ إِلَّا اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो बस (अज़ाबे खुदा से) डराने वाला हूँ और यकता क़हार खुदा के सिवा कोई माबूद क़ाबिले परसतिश नहीं
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अनुवाद — साद 63

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Tuesday, August 18, 2026

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