अज़-ज़ुमर · 19/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
أَفَمَنْ حَقَّ عَلَيْهِ كَلِمَةُ الْعَذَابِ أَفَأَنتَ تُنقِذُ مَن فِي النَّارِ ۝١٩
Afaman haqqa `alaihi kalimatul `azaab; afa anta tunqizu man fin Naar
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) भला जिस शख्स पर अज़ाब का वायदा पूरा हो चुका हो तो क्या तुम उस शख्स की ख़लासी दे सकते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَقَّ عَلَيْهِ – उस पर साबित हो गई, अनिवार्य हो गई।
  • كَلِمَةُ الْعَذَابِ – यातना की बात, अर्थात अल्लाह का फैसला और आदेश कि वह यातना का हकदार है।
  • تُنقِذُ – तुम बचा सकते हो, छुड़ा सकते हो।

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को संबोधित करते हुए एक महत्वपूर्ण सत्य समझा रहे हैं। जिस व्यक्ति पर अल्लाह की ओर से यातना का फैसला साबित हो चुका है—यानी जो अपने कुफ्र और अवज्ञा पर अड़ा रहा, हठ और जिद के साथ सत्य को ठुकराता रहा, और जिसके बारे में अल्लाह का अटल निर्णय हो चुका है कि वह नरक में जाएगा—तो ऐसे व्यक्ति को कौन बचा सकता है? क्या आप ऐसे लोगों को आग से निकाल सकते हैं?

यह एक ऐसा प्रश्न है जो स्वयं ही उत्तर दे देता है। इसका अर्थ यह है कि हे नबी! आप केवल सत्य का संदेश पहुँचाने वाले हैं, आपका काम लोगों को सीधा रास्ता दिखाना है, लेकिन जिस व्यक्ति का दिल मुहरबंद हो चुका हो और जिसने अपनी जिद और कुफ्र के कारण अल्लाह की यातना को अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया हो, उसे आप हिदायत नहीं दे सकते। आप किसी को नरक से नहीं बचा सकते, यह केवल अल्लाह ही के अधिकार में है। अल्लाह ने कुछ लोगों के लिए पहले ही फैसला सुना दिया था: "ये नरक के लिए हैं, और मुझे इनकी परवाह नहीं।"

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है कि हिदायत और गुमराही पूरी तरह अल्लाह के हाथ में है। हमारा काम केवल अच्छी बात पहुँचाना है, लेकिन दिलों को बदलना अल्लाह का काम है। साथ ही यह भी चेतावनी है कि जो लोग सत्य के सामने हठ और घमंड करते हैं, वे अपने लिए यातना का फैसला स्वयं सील कर लेते हैं।

इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें अपने जीवन में हर पल अल्लाह की रहमत और मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि कौन जानता है कि हमारा अंत कैसा होगा। हमें अपने दिलों को नरम रखना चाहिए, सत्य को स्वीकार करने में देरी नहीं करनी चाहिए, और अल्लाह की ओर लौटने में कोई ढील नहीं बरतनी चाहिए। याद रखें, अल्लाह की रहमत का द्वार तब तक खुला है जब तक कि मौत न आ जाए, लेकिन जो लोग जानबूझकर सत्य को ठुकराते हैं और हठ पर अड़े रहते हैं, वे अपने लिए केवल पछतावा और यातना ही कमाते हैं।



📜 आयत 17-21 — अज़-ज़ुमर

17وَالَّذِينَ اجْتَنَبُوا الطَّاغُوتَ أَن يَعْبُدُوهَا وَأَنَابُوا إِلَى اللَّهِ لَهُمُ الْبُشْرَىٰ ۚ فَبَشِّرْ عِبَادِ
और जो लोग बुतों से उनके पूजने से बचे रहे और ख़ुदा ही की तरफ रूजु की उनके लिए (जन्नत की) ख़ुशख़बरी है
18الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ ۚ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ
तो (ऐ रसूल) तुम मेरे (ख़ास) बन्दों को खुशख़बरी दे दो जो बात को जी लगाकर सुनते हैं और फिर उसमें से अच्छी बात पर अमल करते हैं यही वह लोग हैं जिनकी खुदा ने हिदायत की और यही लोग अक्लमन्द हैं
19أَفَمَنْ حَقَّ عَلَيْهِ كَلِمَةُ الْعَذَابِ أَفَأَنتَ تُنقِذُ مَن فِي النَّارِ
तो (ऐ रसूल) भला जिस शख्स पर अज़ाब का वायदा पूरा हो चुका हो तो क्या तुम उस शख्स की ख़लासी दे सकते हो
20لَٰكِنِ الَّذِينَ اتَّقَوْا رَبَّهُمْ لَهُمْ غُرَفٌ مِّن فَوْقِهَا غُرَفٌ مَّبْنِيَّةٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَعْدَ اللَّهِ ۖ لَا يُخْلِفُ اللَّهُ الْمِيعَادَ
जो आग में (पड़ा) हो मगर जो लोग अपने परवरदिगार से डरते रहे उनके ऊँचे-ऊँचे महल हैं (और) बाला ख़ानों पर बालाख़ाने बने हुए हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं ये खुदा का वायदा है (और) वायदा ख़िलाफी नहीं किया करता
21أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَسَلَكَهُ يَنَابِيعَ فِي الْأَرْضِ ثُمَّ يُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا مُّخْتَلِفًا أَلْوَانُهُ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَاهُ مُصْفَرًّا ثُمَّ يَجْعَلُهُ حُطَامًا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ
क्या तुमने इस पर ग़ौर नहीं किया कि खुदा ही ने आसमान से पानी बरसाया फिर उसको ज़मीन में चश्में बनाकर जारी किया फिर उसके ज़रिए से रंग बिरंग (के गल्ले) की खेती उगाता है फिर (पकने के बाद) सूख जाती है तो तुम को वह ज़र्द दिखायी देती है फिर खुदा उसे चूर-चूर भूसा कर देता है बेशक इसमें अक्लमन्दों के लिए (बड़ी) इबरत व नसीहत है
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 19

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Tuesday, August 18, 2026

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