अज़-ज़ुमर · 36/75
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुमर
أَلَيْسَ اللَّهُ بِكَافٍ عَبْدَهُ ۖ وَيُخَوِّفُونَكَ بِالَّذِينَ مِن دُونِهِ ۚ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ ۝٣٦
Alaisal laahu bikaafin `abdahoo wa yukhawwi foonaka billazeena min doonih; wa mai yudlilil laahu famaa lahoo min haad
📖 हिंदी अर्थ
क्या ख़ुदा अपने बन्दों (की मदद) के लिए काफ़ी नहीं है (ज़रूर है) और (ऐ रसूल) तुमको लोग ख़ुदा के सिवा (दूसरे माबूदों) से डराते हैं और ख़ुदा जिसे गुमराही में छोड़ दे तो उसका कोई राह पर लाने वाला नहीं है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • काफ़ी — पर्याप्त, काफी होने वाला
  • युख़व्विफ़ूनक — वे आपको डराते हैं
  • मिन दूनिही — उस (अल्लाह) के सिवा
  • युद्लिल — गुमराह करे
  • हादी — मार्गदर्शन करने वाला

तफ़सीर:

क्या अल्लाह अपने बंदे (पैगंबर मुहम्मद ﷺ) के लिए पर्याप्त नहीं है? बेशक वह पर्याप्त है! यह एक ऐसा प्रश्न है जो अपने आप में उत्तर समेटे हुए है। अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ के लिए दीन और दुनिया दोनों मामलों में काफी है। उसने अपने नबी की हिफाज़त का जिम्मा लिया है और दुश्मनों के मक्र (चाल) से उन्हें बचाने का वादा किया है।

मगर देखिए इन मुशरिकों की नादानी! वे आपको उन माबूदों से डराते हैं जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते हैं। वे कहते हैं कि हमें डर है कि ये देवता आपको नुकसान पहुंचा देंगे या आपको पागल कर देंगे। यानी वे बेजान बुतों से डराते हैं, जो न खुद कोई नुकसान पहुंचा सकते हैं और न किसी को फायदा दे सकते हैं। कितनी बड़ी जहालत है यह!

फिर अल्लाह तआला फरमाता है: "जिसे अल्लाह गुमराह कर दे, उसके लिए कोई मार्गदर्शन करने वाला नहीं है।" यानी जिसे अल्लाह ने हिदायत से महरूम कर दिया, उसे कोई हिदायत नहीं दे सकता। यह बात उन लोगों के लिए सख्त चेतावनी है जो हक को ठुकराते हैं और बुतों की पूजा पर अड़े रहते हैं।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है — हमें भी अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। जब अल्लाह हमारे साथ है तो किसी की परवाह नहीं। दुनिया की तमाम ताकतें मिलकर भी उस बंदे का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं जिसका साथ अल्लाह दे। यही तो सच्चे मोमिन की पहचान है कि वह अल्लाह पर पूरा भरोसा रखता है और उसकी राह में किसी से नहीं डरता। अल्लाह हमें इसी तौफीक अता फरमाए। आमीन।



📜 आयत 34-38 — सूरा अज़-ज़ुमर

34لَهُم مَّا يَشَاءُونَ عِندَ رَبِّهِمْ ۚ ذَٰلِكَ جَزَاءُ الْمُحْسِنِينَ
ये लोग जो चाहेंगे उनके लिए परवर दिगार के पास (मौजूद) है, ये नेकी करने वालों की जज़ाए ख़ैर है
35لِيُكَفِّرَ اللَّهُ عَنْهُمْ أَسْوَأَ الَّذِي عَمِلُوا وَيَجْزِيَهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ الَّذِي كَانُوا يَعْمَلُونَ
ताकि ख़ुदा उन लोगों की बुराइयों को जो उन्होने की हैं दूर कर दे और उनके अच्छे कामों के एवज़ जो वह कर चुके थे उसका अज्र (सवाब) अता फरमाए
36أَلَيْسَ اللَّهُ بِكَافٍ عَبْدَهُ ۖ وَيُخَوِّفُونَكَ بِالَّذِينَ مِن دُونِهِ ۚ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِنْ هَادٍ
क्या ख़ुदा अपने बन्दों (की मदद) के लिए काफ़ी नहीं है (ज़रूर है) और (ऐ रसूल) तुमको लोग ख़ुदा के सिवा (दूसरे माबूदों) से डराते हैं और ख़ुदा जिसे गुमराही में छोड़ दे तो उसका कोई राह पर लाने वाला नहीं है
37وَمَن يَهْدِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن مُّضِلٍّ ۗ أَلَيْسَ اللَّهُ بِعَزِيزٍ ذِي انتِقَامٍ
और जिस शख्स की हिदायत करे तो उसका कोई गुमराह करने वाला नहीं। क्या ख़दा ज़बरदस्त और बदला लेने वाला नहीं है (ज़रूर है)
38وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۚ قُلْ أَفَرَأَيْتُم مَّا تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ إِنْ أَرَادَنِيَ اللَّهُ بِضُرٍّ هَلْ هُنَّ كَاشِفَاتُ ضُرِّهِ أَوْ أَرَادَنِي بِرَحْمَةٍ هَلْ هُنَّ مُمْسِكَاتُ رَحْمَتِهِ ۚ قُلْ حَسْبِيَ اللَّهُ ۖ عَلَيْهِ يَتَوَكَّلُ الْمُتَوَكِّلُونَ
और (ऐ रसूल) अगर तुम इनसे पूछो कि सारे आसमान व ज़मीन को किसने पैदा किया तो ये लोग यक़ीनन कहेंगे कि ख़ुदा ने, तुम कह दो कि तो क्या तुमने ग़ौर किया है कि ख़ुदा को छोड़ कर जिन लोगों की तुम इबादत करते हो अगर ख़ुदा मुझे कोई तक़लीफ पहुँचाना चाहे तो क्या वह लोग उसके नुक़सान को (मुझसे) रोक सकते हैं या अगर ख़ुदा मुझ पर मेहरबानी करना चाहे तो क्या वह लोग उसकी मेहरबानी रोक सकते हैं (ऐ रसूल) तुम कहो कि ख़ुदा मेरे लिए काफ़ी है उसी पर भरोसा करने वाले भरोसा करते हैं
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीअवतरण स्थान
36आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 36

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Friday, October 2, 2026

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