अज़-ज़ुमर · 66/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَكُن مِّنَ الشَّاكِرِينَ ۝٦٦
Balil laahha fa`bud wa kum minash shaakireen
📖 हिंदी अर्थ
बल्कि तुम ख़ुदा ही कि इबादत करो और शुक्र गुज़ारों में हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • बल – बल्कि, अपितु
  • फ़ा'बुद – तो इबादत करो
  • अश-शाकिरीन – शुक्रगुज़ारों में से

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में अपने नबी ﷺ को और उनके ज़रिए पूरी उम्मत को सीधा और स्पष्ट आदेश दे रहे हैं। फ़रमाते हैं: "बल्कि अल्लाह ही की इबादत करो और शुक्रगुज़ारों में से हो जाओ।"

इसका मतलब यह है कि जो लोग तुम्हें अल्लाह के सिवा औरों की इबादत करने का कहते हैं, उनकी बात मत मानो। अगर इबादत करनी ही है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की करो, क्योंकि इबादत का हक़दार सिर्फ़ वही है। उसका कोई शरीक नहीं, कोई साझीदार नहीं। इबादत को ख़ालिस अल्लाह के लिए ही रखो, उसमें किसी को शामिल मत करो।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और शुक्रगुज़ारों में से हो जाओ।" यानी अल्लाह ने तुम पर जो अनगिनत नेमतें बरसाई हैं — ईमान, हिदायत, इस्लाम, सुरक्षा, रिज़्क़, सेहत — इन सब पर उसका शुक्र अदा करो। शुक्र का मतलब सिर्फ़ ज़बान से "अल्हम्दुलिल्लाह" कहना नहीं है, बल्कि दिल से अल्लाह की नेमतों को पहचानना, ज़बान से उसकी तारीफ़ करना और अपने अंगों को उसकी इबादत और फ़रमाँबरदारी में लगाना है।

शुक्रगुज़ार बंदा वही है जो अल्लाह की हर नेमत को देखकर उसका एहसान मानता है, उसकी तारीफ़ करता है और उस नेमत को अल्लाह की नाफ़रमानी में इस्तेमाल नहीं करता। शुक्र अदा करने से अल्लाह नेमतों में और इज़ाफ़ा करता है, जैसा कि क़ुरआन में फ़रमाया: "अगर तुम शुक्र करोगे तो मैं तुम्हें और ज़्यादा दूँगा।"

यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ अल्लाह की इबादत और उसका शुक्र होना चाहिए। जब बंदा अल्लाह की इबादत करता है और शुक्रगुज़ार बनता है, तो उसका दिल सुकून पाता है, उसकी रूह को तसल्ली मिलती है और उसकी ज़िंदगी में बरकत आती है। अल्लाह की इबादत ही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया की परेशानियों से निजात दिलाता है और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाता है।

तो आओ, हम सब अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित करें, उसकी नेमतों का शुक्र अदा करें और उन लोगों में शामिल हों जिनसे अल्लाह राज़ी है। यही हमारी कामयाबी है, यही हमारी नजात है।



📜 आयत 64-68 — अज़-ज़ुमर

64قُلْ أَفَغَيْرَ اللَّهِ تَأْمُرُونِّي أَعْبُدُ أَيُّهَا الْجَاهِلُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि नादानों भला तुम मुझसे ये कहते हो कि मैं ख़ुदा के सिवा किसी दूसरे की इबादत करूँ
65وَلَقَدْ أُوحِيَ إِلَيْكَ وَإِلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكَ لَئِنْ أَشْرَكْتَ لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ
और (ऐ रसूल) तुम्हारी तरफ और उन (पैग़म्बरों) की तरफ जो तुमसे पहले हो चुके हैं यक़ीनन ये वही भेजी जा की है कि अगर (कहीं) शिर्क किया तो यक़ीनन तुम्हारे सारे अमल अकारत हो जाएँगे और तुम तो ज़रूर घाटे में आ जाओगे
66بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَكُن مِّنَ الشَّاكِرِينَ
बल्कि तुम ख़ुदा ही कि इबादत करो और शुक्र गुज़ारों में हो
67وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَالسَّمَاوَاتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की जैसी क़द्र दानी करनी चाहिए थी उसकी ( कुछ भी ) कद्र न की हालाँकि ( वह ऐसा क़ादिर है कि) क़यामत के दिन सारी ज़मीन (गोया) उसकी मुट्ठी में होगी और सारे आसमान (गोया) उसके दाहिने हाथ में लिपटे हुए हैं जिसे ये लोग उसका शरीक बनाते हैं वह उससे पाकीज़ा और बरतर है
68وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَمَن فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَن شَاءَ اللَّهُ ۖ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَىٰ فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنظُرُونَ
और जब (पहली बार) सूर फँका जाएगा तो जो लोग आसमानों में हैं और जो लोग ज़मीन में हैं (मौत से) बेहोश होकर गिर पड़ेंगें) मगर (हाँ) जिस को ख़ुदा चाहे वह अलबत्ता बच जाएगा) फिर जब दोबारा सूर फूँका जाएगा तो फौरन सब के सब खड़े हो कर देखने लगेंगें
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 66

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सूरा आयत 66/75 — अज़-ज़ुमर الزمر (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अज़-ज़ुमर सुनें, अज़-ज़ुमर अनुवाद, अज़-ज़ुमर mp3, अज़-ज़ुमर pdf. आयत 64–68. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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