अज़-ज़ुमर · 67/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَالسَّمَاوَاتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ ۝٦٧
Wa maa qadarul laaha haqqa qadrihee wal ardu jamee `an qabdatuhoo Yawmal Qiyaamit wassamaawaatu matwiyyaatum biyameenih; Subhaanahoo wa Ta`aalaa `amma yushrikoon
📖 हिंदी अर्थ
और उन लोगों ने ख़ुदा की जैसी क़द्र दानी करनी चाहिए थी उसकी ( कुछ भी ) कद्र न की हालाँकि ( वह ऐसा क़ादिर है कि) क़यामत के दिन सारी ज़मीन (गोया) उसकी मुट्ठी में होगी और सारे आसमान (गोया) उसके दाहिने हाथ में लिपटे हुए हैं जिसे ये लोग उसका शरीक बनाते हैं वह उससे पाकीज़ा और बरतर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • قَدَرُوا – उन्होंने अंदाज़ा नहीं किया, महत्व नहीं समझा
  • حَقَّ قَدْرِهِ – जैसा उसकी शान के लायक है
  • قَبْضَتُهُ – उसकी मुट्ठी में, उसके नियंत्रण में
  • مَطْوِيَّاتٌ – लपेटी हुईं, तह की हुईं
  • بِيَمِينِهِ – उसके दाहिने हाथ में (जैसा उसकी शान के लायक है)
  • سُبْحَانَهُ – वह पाक है, हर कमी से मुक्त है

विस्तृत तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों के बारे में है जो अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार बनाते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इन मुशरिकों ने अल्लाह की क़द्र नहीं की, उसकी असली अज़मत और शान को नहीं पहचाना। अगर वे सच में अल्लाह की अज़मत को समझते, तो कभी उसके साथ किसी और की इबादत नहीं करते। उन्होंने एक कमज़ोर, लाचार मख़लूक़ (पैदा की हुई चीज़) को उस ख़ालिक़-ए-आज़म (महान रचनाकार) के बराबर कर दिया जिसकी क़ुदरत का कोई अंत नहीं।

अल्लाह की अज़मत का अंदाज़ा इससे लगाइए कि क़यामत के दिन पूरी ज़मीन — अपने पहाड़ों, दरियाओं, समुद्रों, पेड़ों और हर चीज़ के साथ — उसकी मुट्ठी में होगी। और सातों आसमान उसके दाहिने हाथ में लपेटे हुए होंगे। यानी जिस अल्लाह की क़ुदरत के सामने यह विशाल ब्रह्मांड एक मुट्ठी भर चीज़ के बराबर है, उसके साथ किसी को शरीक करना कितनी बड़ी नादानी और गुमराही है!

अल्लाह तआला इन सब बातों से पाक और बुलंद है। वह हर उस चीज़ से मुक्त है जो ये मुशरिक उसके बारे में कहते या मानते हैं। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि अल्लाह के "हाथ" और "मुट्ठी" का ज़िक्र क़ुरआन में आया है, लेकिन हम इसकी कैफ़ियत (आकार-प्रकार) नहीं जानते। यह उसी तरह है जैसा अल्लाह की शान के लायक है — न किसी मख़लूक़ के हाथ जैसा, न किसी चीज़ से मिलता-जुलता। हम इस पर ईमान रखते हैं बिना तश्बीह (समानता) और बिना तकीफ़ (आकार निर्धारित किए) के।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह की अज़मत पर ग़ौर करें। जब हम इस ब्रह्मांड को देखते हैं — चाँद, सितारे, पहाड़, समुद्र — तो हमें याद रखना चाहिए कि यह सब उसी की मुट्ठी में है। जिस अल्लाह की क़ुदरत इतनी महान है, उसी की इबादत करना, उसी से डरना और उसी से उम्मीद रखना हमारी ज़िंदगी का असली मक़सद है। यह आयत हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) की तरफ बुलाती है और शिर्क (बहुदेववाद) से सख़्त मना करती है। कितनी खूबसूरत बात है कि हमारा रब इतना महान है कि सारा जहान उसकी मुट्ठी में है, फिर भी वह अपने बंदों के करीब है, उनकी दुआएँ सुनता है और उन पर रहम करता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 65-69 — अज़-ज़ुमर

65وَلَقَدْ أُوحِيَ إِلَيْكَ وَإِلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكَ لَئِنْ أَشْرَكْتَ لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ
और (ऐ रसूल) तुम्हारी तरफ और उन (पैग़म्बरों) की तरफ जो तुमसे पहले हो चुके हैं यक़ीनन ये वही भेजी जा की है कि अगर (कहीं) शिर्क किया तो यक़ीनन तुम्हारे सारे अमल अकारत हो जाएँगे और तुम तो ज़रूर घाटे में आ जाओगे
66بَلِ اللَّهَ فَاعْبُدْ وَكُن مِّنَ الشَّاكِرِينَ
बल्कि तुम ख़ुदा ही कि इबादत करो और शुक्र गुज़ारों में हो
67وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ وَالْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَالسَّمَاوَاتُ مَطْوِيَّاتٌ بِيَمِينِهِ ۚ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की जैसी क़द्र दानी करनी चाहिए थी उसकी ( कुछ भी ) कद्र न की हालाँकि ( वह ऐसा क़ादिर है कि) क़यामत के दिन सारी ज़मीन (गोया) उसकी मुट्ठी में होगी और सारे आसमान (गोया) उसके दाहिने हाथ में लिपटे हुए हैं जिसे ये लोग उसका शरीक बनाते हैं वह उससे पाकीज़ा और बरतर है
68وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَمَن فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَن شَاءَ اللَّهُ ۖ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَىٰ فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنظُرُونَ
और जब (पहली बार) सूर फँका जाएगा तो जो लोग आसमानों में हैं और जो लोग ज़मीन में हैं (मौत से) बेहोश होकर गिर पड़ेंगें) मगर (हाँ) जिस को ख़ुदा चाहे वह अलबत्ता बच जाएगा) फिर जब दोबारा सूर फूँका जाएगा तो फौरन सब के सब खड़े हो कर देखने लगेंगें
69وَأَشْرَقَتِ الْأَرْضُ بِنُورِ رَبِّهَا وَوُضِعَ الْكِتَابُ وَجِيءَ بِالنَّبِيِّينَ وَالشُّهَدَاءِ وَقُضِيَ بَيْنَهُم بِالْحَقِّ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और ज़मीन अपने परवरदिगार के नूर से जगमगा उठेगी और (आमाल की) किताब (लोगों के सामने) रख दी जाएगी और पैग़म्बर और गवाह ला हाज़िर किए जाएँगे और उनमें इन्साफ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ( ज़र्रा बराबर ) ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 67

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Tuesday, August 18, 2026

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