अन-निसा · 127/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَيَسْتَفْتُونَكَ فِي النِّسَاءِ ۖ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِيهِنَّ وَمَا يُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فِي الْكِتَابِ فِي يَتَامَى النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا تُؤْتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرْغَبُونَ أَن تَنكِحُوهُنَّ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الْوِلْدَانِ وَأَن تَقُومُوا لِلْيَتَامَىٰ بِالْقِسْطِ ۚ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِهِ عَلِيمًا ۝١٢٧
Wa yastaftoonaka finnisaaa`i qulil laahu yufteekum feehinna wa maa yutlaa `alaikum fil Kitaabi fee yataaman nisaaa`il laatee laa tu`toonahunna mmaa kutiba lahunnna wa targhaboona an tankihoohunna wal mustad`a feena minal wildaani wa an taqoomoo lilyataamaa bilqist; wa maa taf`aloo min khairin fa innal laaha kaana bihee `Aleemaa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) ये लोग तुमसे (यतीम लड़कियों) से निकाह के बारे में फ़तवा तलब करते हैं तुम उनसे कह दो कि ख़ुदा तुम्हें उनसे (निकाह करने) की इजाज़त देता है और जो हुक्म मनाही का कुरान में तुम्हें (पहले) सुनाया जा चुका है वह हक़ीक़तन उन यतीम लड़कियों के वास्ते था जिन्हें तुम उनका मुअय्यन किया हुआ हक़ नहीं देते और चाहते हो (कि यूं ही) उनसे निकाह कर लो और उन कमज़ोर नातवॉ (कमजोर) बच्चों के बारे में हुक्म फ़रमाता है और (वो) ये है कि तुम यतीमों के हुक़ूक़ के बारे में इन्साफ पर क़ायम रहो और (यक़ीन रखो कि) जो कुछ तुम नेकी करोगे तो ख़ुदा ज़रूर वाक़िफ़कार है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَسْتَفْتُونَكَ – आपसे फ़तवा (निर्णय/मार्गदर्शन) पूछते हैं।
  • يُفْتِيكُمْ – तुम्हें निर्णय/मार्गदर्शन देता है।
  • يَتَامَى – अनाथ (वे महिलाएँ जिनके पिता का देहांत हो चुका हो)।
  • لَا تُؤْتُونَهُنَّ – तुम उन्हें नहीं देते।
  • مَا كُتِبَ لَهُنَّ – जो (हक़) उनके लिए निर्धारित किया गया है (मेहर, विरासत)।
  • تَرْغَبُونَ – तुम चाहते हो / रुचि रखते हो।
  • أَن تَنكِحُوهُنَّ – कि तुम उनसे विवाह करो।
  • الْمُسْتَضْعَفِينَ – कमज़ोर/अशक्त लोग।
  • الْوِلْدَانِ – छोटे बच्चे।
  • بِالْقِسْطِ – न्याय/इंसाफ़ के साथ।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! लोग आपसे महिलाओं के मामलों में फ़तवा पूछते हैं। आप उन्हें बता दें कि अल्लाह तआला स्वयं उनके बारे में निर्णय देता है, और वह भी जो क़ुरआन में अनाथ महिलाओं के संबंध में पढ़ा जाता है। वे अनाथ महिलाएँ जिन्हें तुम उनका हक़ (मेहर और विरासत) नहीं देते, और उनसे विवाह करने की इच्छा भी नहीं रखते—बल्कि उनके धन के लालच में उन्हें विवाह से रोके रखते हो। अल्लाह तुम्हें निर्देश देता है कि उनके साथ न्याय करो और उनके अधिकार पूरे करो।

इसी प्रकार, अल्लाह तुम्हें कमज़ोर बच्चों के बारे में भी निर्णय देता है—कि उन्हें उनका हक़ दो, उन पर अत्याचार न करो, और उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा न करो। और अनाथों के साथ पूर्ण न्याय करने का आदेश देता है, ताकि उनके दुनिया और आख़िरत दोनों के मामले सुधर जाएँ।

तुम जो भी भलाई करोगे—चाहे वह अनाथों के साथ हो या किसी और के साथ—अल्लाह उसे जानता है और उसका पूरा बदला देगा। उसके ज्ञान से कोई चीज़ छिपी नहीं है, और वह तुम्हारे हर अच्छे काम की क़द्र करेगा।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम ने हर कमज़ोर और बेसहारा व्यक्ति—विशेषकर अनाथ महिलाओं और बच्चों—के अधिकारों की रक्षा का पूरा प्रबंध किया है। अल्लाह तआला ने उनके हक़ों को स्पष्ट रूप से बयान कर दिया है, ताकि समाज में न्याय और दया का राज हो। यह हमारे लिए एक बड़ी नेमत है कि हमारा दीन हमें कमज़ोरों के साथ इंसाफ़ करने की तालीम देता है। आइए, हम अपने जीवन में इन शिक्षाओं को अपनाएँ और अल्लाह की रज़ा के लिए भलाई के काम करें—क्योंकि अल्लाह हर अच्छे काम को देखता है और उसका अज्र (बदला) अवश्य देगा। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 125-129 — अन-निसा

125وَمَنْ أَحْسَنُ دِينًا مِّمَّنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ وَاتَّبَعَ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۗ وَاتَّخَذَ اللَّهُ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلًا
और उस शख्स से दीन में बेहतर कौन होगा जिसने ख़ुदा के सामने अपना सरे तसलीम झुका दिया और नेको कार भी है और इबराहीम के तरीके पर चलता है जो बातिल से कतरा कर चलते थे और ख़ुदा ने इब्राहिम को तो अपना ख़लिस दोस्त बना लिया
126وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُّحِيطًا
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही का है और ख़ुदा ही सब चीज़ को (अपनी) कुदरत से घेरे हुए है
127وَيَسْتَفْتُونَكَ فِي النِّسَاءِ ۖ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِيهِنَّ وَمَا يُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فِي الْكِتَابِ فِي يَتَامَى النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا تُؤْتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرْغَبُونَ أَن تَنكِحُوهُنَّ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الْوِلْدَانِ وَأَن تَقُومُوا لِلْيَتَامَىٰ بِالْقِسْطِ ۚ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِهِ عَلِيمًا
(ऐ रसूल) ये लोग तुमसे (यतीम लड़कियों) से निकाह के बारे में फ़तवा तलब करते हैं तुम उनसे कह दो कि ख़ुदा तुम्हें उनसे (निकाह करने) की इजाज़त देता है और जो हुक्म मनाही का कुरान में तुम्हें (पहले) सुनाया जा चुका है वह हक़ीक़तन उन यतीम लड़कियों के वास्ते था जिन्हें तुम उनका मुअय्यन किया हुआ हक़ नहीं देते और चाहते हो (कि यूं ही) उनसे निकाह कर लो और उन कमज़ोर नातवॉ (कमजोर) बच्चों के बारे में हुक्म फ़रमाता है और (वो) ये है कि तुम यतीमों के हुक़ूक़ के बारे में इन्साफ पर क़ायम रहो और (यक़ीन रखो कि) जो कुछ तुम नेकी करोगे तो ख़ुदा ज़रूर वाक़िफ़कार है
128وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِن بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَن يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا ۚ وَالصُّلْحُ خَيْرٌ ۗ وَأُحْضِرَتِ الْأَنفُسُ الشُّحَّ ۚ وَإِن تُحْسِنُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
और अगर कोई औरत अपने शौहर की ज्यादती व बेतवज्जोही से (तलाक़ का) ख़ौफ़ रखती हो तो मियॉ बीवी के बाहम किसी तरह मिलाप कर लेने में दोनों (में से किसी पर) कुछ गुनाह नहीं है और सुलह तो (बहरहाल) बेहतर है और बुख्ल से तो क़रीब क़रीब हर तबियत के हम पहलू है और अगर तुम नेकी करो और परहेजदारी करो तो ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है (वही तुमको अज्र देगा)
129وَلَن تَسْتَطِيعُوا أَن تَعْدِلُوا بَيْنَ النِّسَاءِ وَلَوْ حَرَصْتُمْ ۖ فَلَا تَمِيلُوا كُلَّ الْمَيْلِ فَتَذَرُوهَا كَالْمُعَلَّقَةِ ۚ وَإِن تُصْلِحُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا
और अगरचे तुम बहुतेरा चाहो (लेकिन) तुममें इतनी सकत तो हरगिज़ नहीं है कि अपनी कई बीवियों में (पूरा पूरा) इन्साफ़ कर सको (मगर) ऐसा भी तो न करो कि (एक ही की तरफ़) हमातन माएल हो जाओ कि (दूसरी को अधड़ में) लटकी हुई छोड़ दो और अगर बाहम मेल कर लो और (ज्यादती से) बचे रहो तो ख़ुदा यक़ीनन बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
अन-निसाकुरान सूची
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अनुवाद — अन-निसा 127

सूरा अन-निसा आयत 127 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) ये लोग तुमसे (यतीम लड़कियों) से निकाह के…

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Tuesday, August 18, 2026

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