अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- اللَّذَانِ: वे दो (स्त्री-पुरुष) जो यह कार्य करें।
- يَأْتِيَانِهَا: उस अश्लील कार्य (व्यभिचार) को करें।
- فَآذُوهُمَا: उन दोनों को दण्ड दो (ताड़ना, फटकार, अपमान आदि से)।
- تَابَا: तौबा कर लें (अपने किए पर पश्चाताप करें)।
- أَصْلَحَا: अपने आचरण को सुधार लें।
- فَأَعْرِضُوا عَنْهُمَا: उन्हें छोड़ दो (उन्हें तंग न करो)।
- تَوَّابًا: बहुत अधिक तौबा क़बूल करने वाला।
- رَّحِيمًا: बहुत दयालु।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन दो लोगों (स्त्री-पुरुष) के बारे में है जो व्यभिचार (ज़िना) जैसे अश्लील कार्य में लिप्त हों। उन्हें दण्ड दिया जाए — जैसे मारना, डाँटना-फटकारना, अपमानित करना, और उनसे किनारा करना — ताकि वे इस बुराई से बाज़ आएँ। यह दण्ड उन्हें शर्मिंदा करने और रोकने के लिए था।
लेकिन यदि वे दोनों अपने इस गुनाह से तौबा कर लें और अपने आचरण को सुधार लें, तो उन्हें छोड़ दिया जाए और उन्हें तंग न किया जाए। क्योंकि जो व्यक्ति सच्चे दिल से तौबा कर लेता है, वह ऐसा हो जाता है जैसे उसने कभी गुनाह किया ही न हो। अल्लाह तआला अपने बंदों की तौबा क़बूल करने वाला और उन पर दया करने वाला है।
यह आयत इस्लाम के शुरुआती दौर में उतरी थी, जब व्यभिचार की सज़ा के बारे में पूरा क़ानून नाज़िल नहीं हुआ था। बाद में यह हुक्म मंसूख़ (रद्द) हो गया और अल्लाह ने स्पष्ट सज़ा निर्धारित कर दी — कुंवारे (जिन्होंने विवाह नहीं किया) के लिए सौ कोड़े और एक साल के लिए देश से निष्कासन, और विवाहित (शादीशुदा) के लिए रज्म (पत्थर मारकर मौत की सज़ा)।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला है: चाहे गुनाह कितना भी बड़ा हो, अल्लाह तआला अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है। यह अल्लाह की रहमत की सबसे बड़ी निशानी है।
- इस्लाम में सज़ा का उद्देश्य सुधार है: सज़ा सिर्फ़ बदला लेने के लिए नहीं, बल्कि इंसान को बुराई से रोकने और उसे सुधारने के लिए दी जाती है। जब इंसान सुधर जाए, तो उसे छोड़ देना चाहिए।
- समाज में पवित्रता का महत्व: इस्लाम समाज को पाक और पवित्र रखने पर बहुत ज़ोर देता है। व्यभिचार जैसी बुराइयाँ समाज को तबाह कर देती हैं, इसलिए उन्हें रोकना ज़रूरी है।
- अल्लाह की रहमत से निराश न होना: यह आयत उन लोगों के लिए बहुत बड़ी खुशख़बरी है जो गुनाह कर बैठते हैं और फिर पछताते हैं। अल्लाह उन्हें माफ़ करने के लिए तैयार है।
- इस्लामी क़ानून की हिकमत: इस्लाम में सज़ाएँ इसलिए निर्धारित की गई हैं ताकि समाज में अमन और सुकून बना रहे। ये सज़ाएँ इंसान की इज़्ज़त और समाज की सलामती के लिए हैं।
📜 आयत 14-18 — अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 16
सूरा अन-निसा आयत 16 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुम लोगों में से जिनसे बदकारी सरज़द हुई हो…सूरा आयत 16/176 — अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-निसा सुनें, अन-निसा अनुवाद, अन-निसा mp3, अन-निसा pdf. आयत 14–18. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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