अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- كَفَرُوا: अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान न लाना, उसे नकारना।
- وَظَلَمُوا: अपने ऊपर अत्याचार करना, यानी कुफ्र पर डटे रहना और सच्चाई को छिपाना।
- لَمْ يَكُنِ اللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ: अल्लाह का यह तरीका नहीं कि वह उन्हें माफ करे।
- وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ طَرِيقًا: और न ही उन्हें किसी ऐसे रास्ते पर चलाए जो उन्हें नजात (मुक्ति) तक पहुँचाए।
तफसीर:
यह आयत उन लोगों के बारे में है जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान नहीं लाया और अपने कुफ्र पर अड़े रहे। उन्होंने अपनी जानों पर जुल्म किया, क्योंकि उन्होंने सच्चाई को जानते हुए भी उसे कबूल नहीं किया और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सच्ची निशानियों को छिपाया। अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे लोगों के लिए माफी का कोई रास्ता नहीं है, और न ही अल्लाह उन्हें कोई ऐसा रास्ता दिखाएगा जो उन्हें जहन्नुम के अज़ाब से बचा सके। उनके लिए हिदायत का दरवाजा बंद हो चुका है, क्योंकि उन्होंने खुद उसे ठुकरा दिया। यह उनके लिए अल्लाह की ओर से एक कड़ी चेतावनी है कि कुफ्र और जुल्म पर मरने वालों का अंजाम बुरा है।
फायदे और सबक:
- यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत और माफी उन लोगों के लिए है जो अपनी गलती का एहसास करके तौबा करें, लेकिन जो लोग जानबूझकर सच्चाई को नकारें और उसे छिपाएँ, उनके लिए माफी की कोई उम्मीद नहीं।
- हिदायत अल्लाह के हाथ में है, और वह उसे उन्हीं को देता है जो सच्चाई के लिए अपना दिल खोलते हैं। जो लोग हठ और अहंकार से सच्चाई को ठुकराते हैं, उनके दिल अल्लाह की तरफ से बंद कर दिए जाते हैं।
- इस आयत से हमें यह भी सबक मिलता है कि हमें अपने ईमान की हिफाजत करनी चाहिए और कभी भी सच्चाई को छिपाना नहीं चाहिए, क्योंकि सच्चाई छिपाना भी एक तरह का जुल्म है।
- यह हमें अल्लाह के दीन की सच्चाई को कबूल करने की तरफ बुलाती है, ताकि हम उन लोगों में से न हों जिनके लिए माफी और हिदायत का दरवाजा बंद कर दिया गया है।
📜 आयत 166-170 — अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 168
सूरा अन-निसा आयत 168 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया और (उस पर)…सूरा आयत 168/176 — अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-निसा सुनें, अन-निसा अनुवाद, अन-निसा mp3, अन-निसा pdf. आयत 166–170. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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