अन-निसा · 21/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
وَكَيْفَ تَأْخُذُونَهُ وَقَدْ أَفْضَىٰ بَعْضُكُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ وَأَخَذْنَ مِنكُم مِّيثَاقًا غَلِيظًا ۝٢١
Wa kaifa taakhuzoonahoo wa qad afdaa ba`dukum ilaa ba`dinw wa akhazna minkum meesaaqan ghaleezaa
📖 हिंदी अर्थ
और क्या तुम उसको (वापस लोगे हालॉकि तुममें से) एक दूसरे के साथ ख़िलवत कर चुका है और बीवियॉ तुमसे (निकाह के वक्त नुक़फ़ा वगैरह का) पक्का क़रार ले चुकी हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَفْضَىٰ بَعْضُكُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ: एक-दूसरे से संबंध स्थापित करना, अर्थात वैवाहिक संबंध और अंतरंगता।
  • مِيثَاقًا غَلِيظًا: पक्का और मज़बूत अहद व पैमान (वचन)।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में पतियों को संबोधित करते हुए फरमाता है कि जब तुम अपनी पत्नियों को तलाक़ दे दो, तो उन्हें दिया गया मह्र (दहेज) वापस लेना तुम्हारे लिए किस तरह जायज़ हो सकता है? हालाँकि तुम में से हर एक दूसरे के साथ घुल-मिल चुका है, और उन्होंने तुमसे एक पक्का और मज़बूत अहद लिया है।

यह वही पवित्र वचन है जो निकाह के समय अल्लाह के नाम पर लिया जाता है — कि या तो पत्नी को अच्छे तरीके से रखो या भलाई के साथ रिहा करो। इस वचन में पति-पत्नी के बीच मोहब्बत, रहमत, और एक-दूसरे के राज़ जानने का रिश्ता शामिल है।

जब इतनी गहरी और पवित्र बंदिशें हों, तो उसके बाद मह्र वापस लेना कितनी बड़ी बेइंसाफ़ी और शर्मनाक बात है! यह अल्लाह की नज़र में बहुत बुरा काम है, और इससे बचना चाहिए।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में शादी का रिश्ता सिर्फ़ एक क़ानूनी मुआमला नहीं, बल्कि एक पवित्र अहद है — जिसमें मोहब्बत, इज़्ज़त और एक-दूसरे के हुक़ूक़ का ख़याल रखना ज़रूरी है। अल्लाह ने औरतों को इज़्ज़त दी है और उनके हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त का हुक्म दिया है। जो शख्स इस अहद को तोड़ता है या औरतों के हुक़ूक़ में कमी करता है, वह अल्लाह की नाराज़गी का सामना करेगा।

इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने घरों में मोहब्बत और रहमत का माहौल बनाएँ, औरतों के साथ इंसाफ़ और भलाई से पेश आएँ, और उनके दिलों को ठेस पहुँचाने वाले कामों से बचें। यही अल्लाह की रज़ा का ज़रिया है और यही हमारे समाज को सुखी और खुशहाल बनाता है।



📜 आयत 19-23 — सूरा अन-निसा

19يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا ۖ وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا بِبَعْضِ مَا آتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّا أَن يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ ۚ وَعَاشِرُوهُنَّ بِالْمَعْرُوفِ ۚ فَإِن كَرِهْتُمُوهُنَّ فَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَيَجْعَلَ اللَّهُ فِيهِ خَيْرًا كَثِيرًا
ऐ ईमानदारों तुमको ये जायज़ नहीं कि (अपने मुरिस की) औरतों से (निकाह कर) के (ख्वाह मा ख्वाह) ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और जो कुछ तुमने उन्हें (शौहर के तर्के से) दिया है उसमें से कुछ (आपस से कुछ वापस लेने की नीयत से) उन्हें दूसरे के साथ (निकाह करने से) न रोको हॉ जब वह खुल्लम खुल्ला कोई बदकारी करें तो अलबत्ता रोकने में (मज़ाएक़ा (हर्ज)नहीं) और बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो (तो भी सब्र करो क्योंकि) अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और ख़ुदा तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे
20وَإِنْ أَرَدتُّمُ اسْتِبْدَالَ زَوْجٍ مَّكَانَ زَوْجٍ وَآتَيْتُمْ إِحْدَاهُنَّ قِنطَارًا فَلَا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئًا ۚ أَتَأْخُذُونَهُ بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُّبِينًا
और अगर तुम एक बीवी (को तलाक़ देकर उस) की जगह दूसरी बीवी (निकाह करके) तबदील करना चाहो तो अगरचे तुम उनमें से एक को (जिसे तलाक़ देना चाहते हो) बहुत सा माल दे चुके हो तो तुम उनमें से कुछ (वापस न लो) क्या तुम्हारी यही गैरत है कि (ख्वाह मा ख्वाह) बोहतान बॉधकर या सरीही जुर्म लगाकर वापस ले लो
21وَكَيْفَ تَأْخُذُونَهُ وَقَدْ أَفْضَىٰ بَعْضُكُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ وَأَخَذْنَ مِنكُم مِّيثَاقًا غَلِيظًا
और क्या तुम उसको (वापस लोगे हालॉकि तुममें से) एक दूसरे के साथ ख़िलवत कर चुका है और बीवियॉ तुमसे (निकाह के वक्त नुक़फ़ा वगैरह का) पक्का क़रार ले चुकी हैं
22وَلَا تَنكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُم مِّنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۚ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَمَقْتًا وَسَاءَ سَبِيلًا
और जिन औरतों से तुम्हारे बाप दादाओं से (निकाह) जमाअ (अगरचे ज़िना) किया हो तुम उनसे निकाह न करो मगर जो हो चुका (वह तो हो चुका) वह बदकारी और ख़ुदा की नाख़ुशी की बात ज़रूर थी और बहुत बुरा तरीक़ा था
23حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَاتُكُمْ وَبَنَاتُكُمْ وَأَخَوَاتُكُمْ وَعَمَّاتُكُمْ وَخَالَاتُكُمْ وَبَنَاتُ الْأَخِ وَبَنَاتُ الْأُخْتِ وَأُمَّهَاتُكُمُ اللَّاتِي أَرْضَعْنَكُمْ وَأَخَوَاتُكُم مِّنَ الرَّضَاعَةِ وَأُمَّهَاتُ نِسَائِكُمْ وَرَبَائِبُكُمُ اللَّاتِي فِي حُجُورِكُم مِّن نِّسَائِكُمُ اللَّاتِي دَخَلْتُم بِهِنَّ فَإِن لَّمْ تَكُونُوا دَخَلْتُم بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ وَحَلَائِلُ أَبْنَائِكُمُ الَّذِينَ مِنْ أَصْلَابِكُمْ وَأَن تَجْمَعُوا بَيْنَ الْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا
(मुसलमानों हसबे जेल) औरतें तुम पर हराम की गयी हैं तुम्हारी माएं (दादी नानी वगैरह सब) और तुम्हारी बेटियॉ (पोतियॉ) नवासियॉ (वगैरह) और तुम्हारी बहनें और तुम्हारी फुफियॉ और तुम्हारी ख़ालाएं और भतीजियॉ और भंजियॉ और तुम्हारी वह माएं जिन्होंने तुमको दूध पिलाया है और तुम्हारी रज़ाई (दूध शरीक) बहनें और तुम्हारी बीवीयों की माँए और वह (मादर ज़िलो) लड़कियां जो तुम्हारी गोद में परवरिश पा चुकी हो और उन औरतों (के पेट) से (पैदा हुई) हैं जिनसे तुम हमबिस्तरी कर चुके हो हाँ अगर तुमने उन बीवियों से (सिर्फ निकाह किया हो) हमबिस्तरी न की तो अलबत्ता उन मादरज़िलों (लड़कियों से) निकाह (करने में) तुम पर कुछ गुनाह नहीं है और तुम्हारे सुलबी लड़को (पोतों नवासों वगैरह) की बीवियॉ (बहुएं) और दो बहनों से एक साथ निकाह करना मगर जो हो चुका (वह माफ़ है) बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
21आयत

अनुवाद — अन-निसा 21

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Thursday, October 1, 2026

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