अन-निसा · 57/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۖ لَّهُمْ فِيهَا أَزْوَاجٌ مُّطَهَّرَةٌ ۖ وَنُدْخِلُهُمْ ظِلًّا ظَلِيلًا ۝٥٧
Wallazeena aamanoo wa `amilus saalihaati sanud khiluum jannaatin tajree min tahtihal anhaaru khaalideena feehaaa abadaa, lahum feehaaa azwaajum mutahharatun wa nudkhiluhum zillan zaleelaa
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम किए हम उनको अनक़रीब ही (बेहिश्त के) ऐसे ऐसे (हरे भरे) बाग़ों में जा पहुंचाएंगे जिन के नीचे नहरें जारी होंगी और उनमें हमेशा रहेंगे वहां उनकी साफ़ सुथरी बीवियॉ होंगी और उन्हे घनी छॉव में ले जाकर रखेंगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ظِلًّا ظَلِيلًا: घना और स्थायी छाया, जिसमें न धूप की तपिश हो और न ठंड की सिहरन।

तफ़सीर (व्याख्या):

जिन लोगों ने अल्लाह पर ईमान लाया और उसके रसूल (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की रिसालत की तस्दीक़ की, और अपने ईमान के साथ अच्छे कर्म भी किए—यानी अपने जीवन को अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) और उसकी पसंदीदा चीज़ों पर स्थिर किया—तो अल्लाह तआला उन्हें ऐसी जन्नतों में दाखिल करेगा जिनके महलों और पेड़ों के नीचे नहरें बहती होंगी। वे उनमें हमेशा हमेशा रहेंगे, कभी निकाले नहीं जाएँगे और न ही उन्हें कभी मौत आएगी। उनके लिए उन जन्नतों में पाक-साफ़ पत्नियाँ होंगी, जिन्हें अल्लाह ने हर प्रकार की गंदगी, बुराई और कमी से पाक किया होगा—न उनमें कोई बुरा स्वभाव होगा, न कोई नापाकी, बल्कि वे पूर्णतः स्वच्छ और पवित्र होंगी। इसके अलावा, अल्लाह उन्हें ऐसी घनी और स्थायी छाया में दाखिल करेगा जो न धूप से तपेगी और न ठंड से सताएगी—एक ऐसा सुखदायी वातावरण जिसमें न कोई कष्ट होगा और न कोई तकलीफ़।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. यह आयत ईमान और अच्छे कर्मों के संयोजन की अहमियत सिखाती है—सिर्फ़ ईमान काफ़ी नहीं, बल्कि उसके साथ नेक अमल भी ज़रूरी है।
  2. अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा हर उस इंसान के लिए खुला है जो सच्चे दिल से ईमान लाए और अपने कर्मों को सुधारे—चाहे उसका अतीत कैसा भी रहा हो।
  3. जन्नत की नेमतें सिर्फ़ खाने-पीने तक सीमित नहीं, बल्कि वहाँ पाक साथी, सुखद वातावरण और हर प्रकार की राहत मिलेगी—यह इंसान को दुनिया की बेहतरीन ज़िंदगी की तरफ़ राग़िब करती है।
  4. अल्लाह का वादा सच्चा है—जो लोग उसकी राह पर चलेंगे, उन्हें वह ऐसा अनगिनत इनाम देगा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। यह बात मुसलमान के दिल में अल्लाह की मुहब्बत और उम्मीद को बढ़ाती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 55-59 — अन-निसा

55فَمِنْهُم مَّنْ آمَنَ بِهِ وَمِنْهُم مَّن صَدَّ عَنْهُ ۚ وَكَفَىٰ بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا
फिर कुछ लोग तो इस (किताब) पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुई आग काफ़ी है
56إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا سَوْفَ نُصْلِيهِمْ نَارًا كُلَّمَا نَضِجَتْ جُلُودُهُم بَدَّلْنَاهُمْ جُلُودًا غَيْرَهَا لِيَذُوقُوا الْعَذَابَ ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَزِيزًا حَكِيمًا
(याद रहे) कि जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया उन्हें ज़रूर अनक़रीब जहन्नुम की आग में झोंक देंगे (और जब उनकी खालें जल कर) जल जाएंगी तो हम उनके लिए दूसरी खालें बदल कर पैदा करे देंगे ताकि वह अच्छी तरह अज़ाब का मज़ा चखें बेशक ख़ुदा हरचीज़ पर ग़ालिब और हिकमत वाला है
57وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۖ لَّهُمْ فِيهَا أَزْوَاجٌ مُّطَهَّرَةٌ ۖ وَنُدْخِلُهُمْ ظِلًّا ظَلِيلًا
और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम किए हम उनको अनक़रीब ही (बेहिश्त के) ऐसे ऐसे (हरे भरे) बाग़ों में जा पहुंचाएंगे जिन के नीचे नहरें जारी होंगी और उनमें हमेशा रहेंगे वहां उनकी साफ़ सुथरी बीवियॉ होंगी और उन्हे घनी छॉव में ले जाकर रखेंगे
58۞ إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَن تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَىٰ أَهْلِهَا وَإِذَا حَكَمْتُم بَيْنَ النَّاسِ أَن تَحْكُمُوا بِالْعَدْلِ ۚ إِنَّ اللَّهَ نِعِمَّا يَعِظُكُم بِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ كَانَ سَمِيعًا بَصِيرًا
ऐ ईमानदारों ख़ुदा तुम्हें हुक्म देता है कि लोगों की अमानतें अमानत रखने वालों के हवाले कर दो और जब लोगों के बाहमी झगड़ों का फैसला करने लगो तो इन्साफ़ से फैसला करो (ख़ुदा तुमको) इसकी क्या ही अच्छी नसीहत करता है इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा सबकी सुनता है (और सब कुछ) देखता है
59يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنكُمْ ۖ فَإِن تَنَازَعْتُمْ فِي شَيْءٍ فَرُدُّوهُ إِلَى اللَّهِ وَالرَّسُولِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا
ऐ ईमानदारों ख़ुदा की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो पस अगर तुम ख़ुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान रखते हो तो इस अम्र में ख़ुदा और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है
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अनुवाद — अन-निसा 57

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Tuesday, August 18, 2026

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