अन-निसा · 77/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ كَخَشْيَةِ اللَّهِ أَوْ أَشَدَّ خَشْيَةً ۚ وَقَالُوا رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا الْقِتَالَ لَوْلَا أَخَّرْتَنَا إِلَىٰ أَجَلٍ قَرِيبٍ ۗ قُلْ مَتَاعُ الدُّنْيَا قَلِيلٌ وَالْآخِرَةُ خَيْرٌ لِّمَنِ اتَّقَىٰ وَلَا تُظْلَمُونَ فَتِيلًا ۝٧٧
Alam tara ilal lazeena qeela lahum kuffooo aidiyakum wa aqeemus Salaata w aaatuz Zakaata falammaa kutiba `alaihimul qitaalu izaa fareequm minhum yakhshawnnan naasa kakhashyatil laahi aw ashadda khashyah; wa qaaloo Rabbanaa lima katabta `alainal qitaala law laaa akhkhartanaa ilaaa ajalin qareeb; qul mataa`ud dunyaa qaleelunw wal Aakhiratu khairul limanit taqaa wa laa tuzlamoona fateelaa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों (के हाल) पर नज़र नहीं की जिनको (जेहाद की आरज़ू थी) और उनको हुक्म दिया गया था कि (अभी) अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद (उनपर वाजिब किया गया तो) उनमें से कुछ लोग (बोदेपन में) लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई ख़ुदा से डरे बल्कि उससे कहीं ज्यादा और (घबराकर) कहने लगे ख़ुदाया तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी (ऐ रसूल) उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो (ख़ुदा से) डरता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है
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अनुवाद — Tafsir

अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ को ख़िताब करते हुए फ़रमाया: क्या आपने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं डाली जिनसे पहले कहा गया था कि अपने हाथों को (जिहाद से) रोके रखो, नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो? यह बात उस वक़्त थी जब जिहाद का हुक्म नहीं आया था। फिर जब अल्लाह ने उन पर जिहाद फ़र्ज़ किया और वे मदीना हिजरत करके आए, तो उनमें से एक गिरोह ऐसा था जिस पर यह हुक्म बहुत भारी गुज़रा। वे लोगों (मक्का के मुशरिकीन) से ऐसा डरने लगे जैसा अल्लाह से डरना चाहिए, बल्कि उससे भी ज़्यादा डर उनके दिलों में पैदा हो गया। उन्होंने कहा: ऐ हमारे रब! तूने हम पर जिहाद क्यों फ़र्ज़ किया? काश तूने हमें थोड़ी सी मोहलत और दे दी होती, ताकि हम दुनिया के मज़े ले लेते। यह बात उनकी दुनिया से मुहब्बत और आराम-पसंदी की वजह से निकली।

अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ को हुक्म दिया कि आप उन्हें जवाब दें: दुनिया का सामान चाहे कितना ही ज़्यादा हो, वह बहुत थोड़ा और फ़ानी है, जल्द ही ख़त्म होने वाला है। और आख़िरत की नेमतें उस शख्स के लिए बेहतर और हमेशा रहने वाली हैं जो अल्लाह से डरता है, उसके हुक्मों पर अमल करता है और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचता है। और तुमसे तुम्हारे नेक अमलों में कुछ भी कमी नहीं की जाएगी, चाहे वह कितना ही छोटा हो — यहाँ तक कि खजूर की गुठली के बीच के उस बारीक धागे के बराबर भी नहीं, जो फ़तील कहलाता है। अल्लाह तआला हर छोटे-बड़े अमल का पूरा-पूरा बदला देगा।

इस आयत में हमारे लिए बहुत बड़ी नसीहत है कि दुनिया की ज़िंदगी चाहे कितनी ही लंबी और आरामदेह क्यों न लगे, वह आख़िरत के मुक़ाबले में बहुत थोड़ी है। अल्लाह ने जो हुक्म दिया है, उसमें हमारी भलाई ही छिपी है। जिहाद और अल्लाह की राह में कुर्बानी देना दुनिया में बड़ा मुश्किल लगता है, लेकिन इसका अज्र आख़िरत में बेहद अज़ीम है। जो शख्स अल्लाह से डरता है और उसकी राह पर चलता है, उसके लिए आख़िरत की नेमतें हमेशा रहने वाली हैं। अल्लाह किसी की मेहनत को ज़ाया नहीं करता, चाहे वह अमल कितना ही छोटा क्यों न हो। हमें चाहिए कि दुनिया की फ़ानी चीज़ों के पीछे पड़ने के बजाय आख़िरत की हमेशा रहने वाली नेमतों को तरजीह दें और अल्लाह के हुक्मों पर खुशी-खुशी अमल करें, क्योंकि उसी में हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है।

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📜 आयत 75-79 — अन-निसा

75وَمَا لَكُمْ لَا تُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ الَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْ هَٰذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ أَهْلُهَا وَاجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ وَلِيًّا وَاجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ نَصِيرًا
(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बना
76الَّذِينَ آمَنُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ الطَّاغُوتِ فَقَاتِلُوا أَوْلِيَاءَ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّ كَيْدَ الشَّيْطَانِ كَانَ ضَعِيفًا
(पस देखो) ईमानवाले तो ख़ुदा की राह में लड़ते हैं और कुफ्फ़ार शैतान की राह में लड़ते मरते हैं पस (मुसलमानों) तुम शैतान के हवा ख़ाहों से लड़ो और (कुछ परवाह न करो) क्योंकि शैतान का दाओ तो बहुत ही बोदा है
77أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ كَخَشْيَةِ اللَّهِ أَوْ أَشَدَّ خَشْيَةً ۚ وَقَالُوا رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا الْقِتَالَ لَوْلَا أَخَّرْتَنَا إِلَىٰ أَجَلٍ قَرِيبٍ ۗ قُلْ مَتَاعُ الدُّنْيَا قَلِيلٌ وَالْآخِرَةُ خَيْرٌ لِّمَنِ اتَّقَىٰ وَلَا تُظْلَمُونَ فَتِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों (के हाल) पर नज़र नहीं की जिनको (जेहाद की आरज़ू थी) और उनको हुक्म दिया गया था कि (अभी) अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद (उनपर वाजिब किया गया तो) उनमें से कुछ लोग (बोदेपन में) लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई ख़ुदा से डरे बल्कि उससे कहीं ज्यादा और (घबराकर) कहने लगे ख़ुदाया तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी (ऐ रसूल) उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो (ख़ुदा से) डरता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है
78أَيْنَمَا تَكُونُوا يُدْرِككُّمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنتُمْ فِي بُرُوجٍ مُّشَيَّدَةٍ ۗ وَإِن تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِ اللَّهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِكَ ۚ قُلْ كُلٌّ مِّنْ عِندِ اللَّهِ ۖ فَمَالِ هَٰؤُلَاءِ الْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَدِيثًا
और वहां रेशा (बाल) बराबर भी तुम लोगों पर जुल्म नहीं किया जाएगा तुम चाहे जहॉ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो और उनको अगर कोई भलाई पहुंचती है तो कहने लगते हैं कि ये ख़ुदा की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुंचती है तो (शरारत से) कहने लगते हैं कि (ऐ रसूल) ये तुम्हारी बदौलत है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सब ख़ुदा की तरफ़ से है पस उन लोगों को क्या हो गया है कि र्कोई बात ही नहीं समझते
79مَّا أَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ وَمَا أَصَابَكَ مِن سَيِّئَةٍ فَمِن نَّفْسِكَ ۚ وَأَرْسَلْنَاكَ لِلنَّاسِ رَسُولًا ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ شَهِيدًا
हालॉकि (सच तो यूं है कि) जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुदा की तरफ़ से है और जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुद तुम्हारी बदौलत है और (ऐ रसूल) हमने तुमको लोगों के पास पैग़म्बर बनाकर भेजा है और (इसके लिए) ख़ुदा की गवाही काफ़ी है
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अनुवाद — अन-निसा 77

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Tuesday, August 18, 2026

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