अन-निसा · 78/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
أَيْنَمَا تَكُونُوا يُدْرِككُّمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنتُمْ فِي بُرُوجٍ مُّشَيَّدَةٍ ۗ وَإِن تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِ اللَّهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِكَ ۚ قُلْ كُلٌّ مِّنْ عِندِ اللَّهِ ۖ فَمَالِ هَٰؤُلَاءِ الْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَدِيثًا ۝٧٨
Ainamaa takoonoo yudrikkumul mawtu wa law kuntum fee buroojim mushai yadah; wa in tusibhum hasanatuny yaqooloo haazihee min indil laahi wa in tusibhum saiyi`atuny yaqooloo haazihee min `indik; qul kullum min `indillaahi famaa lihaaa `ulaaa`il qawmi laa yakkaadoona yafqahoona hadeesaa
📖 हिंदी अर्थ
और वहां रेशा (बाल) बराबर भी तुम लोगों पर जुल्म नहीं किया जाएगा तुम चाहे जहॉ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो और उनको अगर कोई भलाई पहुंचती है तो कहने लगते हैं कि ये ख़ुदा की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुंचती है तो (शरारत से) कहने लगते हैं कि (ऐ रसूल) ये तुम्हारी बदौलत है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सब ख़ुदा की तरफ़ से है पस उन लोगों को क्या हो गया है कि र्कोई बात ही नहीं समझते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • बुरूज: किले, ऊँचे महल या मज़बूत क़िले।
  • मुशय्यदा: ऊँची और मज़बूत बनाई गई इमारतें।
  • हसनah: अच्छाई, ख़ुशहाली, फ़तह (विजय) या धन-संपदा।
  • सय्यिअह: बुराई, तकलीफ़, हार या मुसीबत।
  • यफ़क़हून: समझना, गहराई से समझना।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि तुम जहाँ कहीं भी हो, मौत तुम्हें ज़रूर आकर पकड़ेगी, चाहे तुम मज़बूत और ऊँचे किलों के अंदर ही क्यों न छिपे बैठे हो। मौत से बचने की कोई जगह नहीं है, क्योंकि मौत का वक़्त अल्लाह के हाथ में है। यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के जवाब में उतरी जो उहुद की जंग में शहीद हुए मुसलमानों के बारे में कहते थे कि "अगर वे हमारे पास रहते तो न मरते और न मारे जाते।" अल्लाह ने उनकी इस बात को झूठा साबित किया और बताया कि मौत की घड़ी आने पर कोई ताक़त और कोई जगह उसे नहीं रोक सकती।

फिर अल्लाह मुनाफ़िक़ों की एक और बुरी आदत का ज़िक्र करता है: जब उन्हें कोई अच्छाई मिलती है, जैसे बद्र की जंग में फ़तह या ख़ुशहाली, तो वे कहते हैं कि यह अल्लाह की तरफ़ से है। लेकिन जब उन्हें कोई बुराई पहुँचती है, जैसे उहुद की जंग में हार या कोई मुसीबत, तो वे उसे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तरफ़ निस्बत करते हैं और कहते हैं कि यह आपकी वजह से हुआ। अल्लाह ने उन्हें जवाब देने का हुक्म दिया कि कह दो: "सब कुछ अल्लाह ही की तरफ़ से है।" यानी अच्छाई और बुराई दोनों अल्लाह के फ़ैसले और उसकी क़ुदरत से होती हैं। अल्लाह ने उनकी इस नासमझी पर ताज्जुब किया कि ये लोग इतनी साफ़ बात भी क्यों नहीं समझ पाते? उनकी समझ बिल्कुल कमज़ोर है, वे किसी बात को गहराई से नहीं समझते।

फ़ायदे:

  1. मौत से भागना या उससे बचने की कोशिश करना बेकार है, क्योंकि मौत का वक़्त अल्लाह ने तय कर रखा है। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) में ज़िंदगी गुज़ारे और मौत के लिए तैयार रहे।
  2. अच्छाई और बुराई दोनों अल्लाह की तरफ़ से हैं, और इंसान को हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। मुसीबत आने पर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) या किसी इंसान को क़सूरवार ठहराना गलत है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि हर अच्छी और बुरी घटना में अल्लाह की हिकमत (समझदारी) होती है, और मुसलमान को सब्र और शुक्र के साथ हर हाल में अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहना चाहिए।
  4. मुनाफ़िक़ों की आदत होती है कि वे हर बात को अपने फ़ायदे के हिसाब से तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, लेकिन ईमानदार मुसलमान हर हाल में सच्चाई और अल्लाह के फ़ैसले को क़बूल करता है।
  5. यह आयत हमें समझाती है कि अल्लाह के दीन (धर्म) को अच्छी तरह समझना और उस पर अमल करना ही इंसान को सही रास्ते पर ला सकता है।


📜 आयत 76-80 — सूरा अन-निसा

76الَّذِينَ آمَنُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ الطَّاغُوتِ فَقَاتِلُوا أَوْلِيَاءَ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّ كَيْدَ الشَّيْطَانِ كَانَ ضَعِيفًا
(पस देखो) ईमानवाले तो ख़ुदा की राह में लड़ते हैं और कुफ्फ़ार शैतान की राह में लड़ते मरते हैं पस (मुसलमानों) तुम शैतान के हवा ख़ाहों से लड़ो और (कुछ परवाह न करो) क्योंकि शैतान का दाओ तो बहुत ही बोदा है
77أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ كَخَشْيَةِ اللَّهِ أَوْ أَشَدَّ خَشْيَةً ۚ وَقَالُوا رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا الْقِتَالَ لَوْلَا أَخَّرْتَنَا إِلَىٰ أَجَلٍ قَرِيبٍ ۗ قُلْ مَتَاعُ الدُّنْيَا قَلِيلٌ وَالْآخِرَةُ خَيْرٌ لِّمَنِ اتَّقَىٰ وَلَا تُظْلَمُونَ فَتِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों (के हाल) पर नज़र नहीं की जिनको (जेहाद की आरज़ू थी) और उनको हुक्म दिया गया था कि (अभी) अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद (उनपर वाजिब किया गया तो) उनमें से कुछ लोग (बोदेपन में) लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई ख़ुदा से डरे बल्कि उससे कहीं ज्यादा और (घबराकर) कहने लगे ख़ुदाया तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी (ऐ रसूल) उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो (ख़ुदा से) डरता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है
78أَيْنَمَا تَكُونُوا يُدْرِككُّمُ الْمَوْتُ وَلَوْ كُنتُمْ فِي بُرُوجٍ مُّشَيَّدَةٍ ۗ وَإِن تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِ اللَّهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَقُولُوا هَٰذِهِ مِنْ عِندِكَ ۚ قُلْ كُلٌّ مِّنْ عِندِ اللَّهِ ۖ فَمَالِ هَٰؤُلَاءِ الْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَدِيثًا
और वहां रेशा (बाल) बराबर भी तुम लोगों पर जुल्म नहीं किया जाएगा तुम चाहे जहॉ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो और उनको अगर कोई भलाई पहुंचती है तो कहने लगते हैं कि ये ख़ुदा की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुंचती है तो (शरारत से) कहने लगते हैं कि (ऐ रसूल) ये तुम्हारी बदौलत है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि सब ख़ुदा की तरफ़ से है पस उन लोगों को क्या हो गया है कि र्कोई बात ही नहीं समझते
79مَّا أَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ وَمَا أَصَابَكَ مِن سَيِّئَةٍ فَمِن نَّفْسِكَ ۚ وَأَرْسَلْنَاكَ لِلنَّاسِ رَسُولًا ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ شَهِيدًا
हालॉकि (सच तो यूं है कि) जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुदा की तरफ़ से है और जब तुमको कोई फ़ायदा पहुंचे तो (समझो कि) ख़ुद तुम्हारी बदौलत है और (ऐ रसूल) हमने तुमको लोगों के पास पैग़म्बर बनाकर भेजा है और (इसके लिए) ख़ुदा की गवाही काफ़ी है
80مَّن يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا
जिसने रसूल की इताअत की तो उसने ख़ुदा की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ ख्याल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
78आयत

अनुवाद — अन-निसा 78

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Thursday, October 1, 2026

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