फुस्सिलत · 45/54
अनुवाद उच्चारण — फुस्सिलत
وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ فِيهِ ۗ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِي شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ ۝٤٥
Wa laqad aatainaa Moosal Kitaaba fakhtulifa fee; wa lawlaa Kalimatun sabaqat mir Rabbika laqudiya bainahum; wa innahum lafee shakkim minhu mureeb
📖 हिंदी अर्थ
(और नहीं सुनते) और हम ही ने मूसा को भी किताब (तौरैत) अता की थी तो उसमें भी इसमें एख्तेलाफ किया गया और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक बात पहले न हो चुकी होती तो उनमें कब का फैसला कर दिया गया होता, और ये लोग ऐसे शक़ में पड़े हुए हैं जिसने उन्हें बेचैन कर दिया है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَاخْتُلِفَ فِيهِ: उसमें मतभेद किया गया (कुछ ने माना, कुछ ने झुठलाया)।
  • كَلِمَةٌ سَبَقَتْ: एक बात जो पहले से तय हो चुकी है (अर्थात अल्लाह का वादा)।
  • لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ: उनके बीच फैसला कर दिया जाता (यानी सज़ा तुरंत दे दी जाती)।
  • مُرِيبٍ: संदेह पैदा करने वाला, जो दिल को बेचैन कर दे।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने नबी ﷺ को दिलासा देते हुए फ़रमाते हैं कि हमने मूसा (अलैहिस्सलाम) को भी किताब (तौरात) अता की थी, ठीक उसी तरह जैसे हमने आपको क़ुरआन दिया है। लेकिन उस किताब में भी लोगों ने मतभेद किया—कुछ ने उसे माना और कुछ ने झुठलाया। यह कोई नई बात नहीं है कि आपकी उम्मत में भी कुछ लोग क़ुरआन को नहीं मानते। यह तो पैग़म्बरों की सुन्नत (रीति) रही है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि अगर हमारी ओर से एक बात पहले से तय न होती—और वह यह कि फैसला क़ियामत के दिन होगा—तो इन झुठलाने वालों के बीच दुनिया में ही फैसला कर दिया जाता और झुठलाने वालों को तुरंत सज़ा दे दी जाती। लेकिन अल्लाह की रहमत और उसकी हिकमत यह है कि उसने फैसले को क़ियामत तक के लिए टाल दिया है, ताकि लोगों को मौका मिले, तौबा कर सकें, और सच्चे मोमिनों को सब्र का इनाम मिले।

आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है कि ये मुशरिकीन क़ुरआन के बारे में ऐसे संदेह में हैं जो उनके दिलों को बेचैन कर देता है। वे न तो पूरी तरह झुठला पाते हैं और न ही मान पाते हैं—यही उनकी गुमराही है।

दावती पहलू:

इस आयत से हमें सबक मिलता है कि सच्चाई की राह हमेशा कठिन रही है। हर ज़माने में नबियों को झुठलाया गया, लेकिन अल्लाह ने हमेशा अपने नबियों की मदद की और सच्चाई को बुलंद किया। आज भी जो लोग क़ुरआन पर यक़ीन रखते हैं और उस पर अमल करते हैं, अल्लाह उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता। यह आयत हमें सब्र और भरोसे की तालीम देती है—अल्लाह का वादा सच्चा है, फैसला ज़रूर होगा, और सच्चाई की जीत ज़रूर होगी। इसलिए हमें बिना झिझक क़ुरआन को अपनाना चाहिए और उस पर अमल करके दुनिया और आख़िरत की कामयाबी हासिल करनी चाहिए।

🎧 सुनें

📜 आयत 43-47 — फुस्सिलत

43مَّا يُقَالُ لَكَ إِلَّا مَا قَدْ قِيلَ لِلرُّسُلِ مِن قَبْلِكَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغْفِرَةٍ وَذُو عِقَابٍ أَلِيمٍ
(ऐ रसूल) तुमसे से भी बस वही बातें कहीं जाती हैं जो तुमसे और रसूलों से कही जा चुकी हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार बख्शने वाला भी है और दर्दनाक अज़ाब वाला भी है
44وَلَوْ جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا أَعْجَمِيًّا لَّقَالُوا لَوْلَا فُصِّلَتْ آيَاتُهُ ۖ أَأَعْجَمِيٌّ وَعَرَبِيٌّ ۗ قُلْ هُوَ لِلَّذِينَ آمَنُوا هُدًى وَشِفَاءٌ ۖ وَالَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ فِي آذَانِهِمْ وَقْرٌ وَهُوَ عَلَيْهِمْ عَمًى ۚ أُولَٰئِكَ يُنَادَوْنَ مِن مَّكَانٍ بَعِيدٍ
और अगर हम इस क़ुरान को अरबी ज़बान के सिवा दूसरी ज़बान में नाज़िल करते तो ये लोग ज़रूर कह न बैठते कि इसकी आयतें (हमारी) ज़बान में क्यों तफ़सीलदार बयान नहीं की गयी क्या (खूब क़ुरान तो) अजमी और (मुख़ातिब) अरबी (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ईमानदारों के लिए तो ये (कुरान अज़सरतापा) हिदायत और (हर मर्ज़ की) शिफ़ा है और जो लोग ईमान नहीं रखते उनके कानों (के हक़) में गिरानी (बहरापन) है और वह (कुरान) उनके हक़ में नाबीनाई (का सबब) है तो गिरानी की वजह से गोया वह लोग बड़ी दूर की जगह से पुकारे जाते है
45وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ فِيهِ ۗ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِي شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ
(और नहीं सुनते) और हम ही ने मूसा को भी किताब (तौरैत) अता की थी तो उसमें भी इसमें एख्तेलाफ किया गया और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक बात पहले न हो चुकी होती तो उनमें कब का फैसला कर दिया गया होता, और ये लोग ऐसे शक़ में पड़े हुए हैं जिसने उन्हें बेचैन कर दिया है
46مَّنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे क़े लिए और जो बुरा काम करे उसका वबाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं
47۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَاتٍ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَائِي قَالُوا آذَنَّاكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍ
क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ है (यानि वही जानता है) और बगैर उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
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अनुवाद — फुस्सिलत 45

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Tuesday, August 18, 2026

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