फुस्सिलत · 47/54
अनुवाद उच्चारण — फुस्सिलत
۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَاتٍ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَائِي قَالُوا آذَنَّاكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍ ۝٤٧
Ilaihi yuraddu `ilmus Saaa`ah; wa maa takhruju min samaraatim min akmaamihaa wa maa tahmilu min unsaa wa laa tada`u illaa bi`ilmih; wa Yawma yunaadeehim aina shurakaaa`ee qaalooo aazannaaka maa minnaa min shaheed
📖 हिंदी अर्थ
क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ है (यानि वही जानता है) और बगैर उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَكْمَامِهَا: पेड़ों के फलों के आवरण (छिलके या खोल)।
  • آذَنَّاكَ: हमने आपको बता दिया, हमने आपको सूचित कर दिया।
  • شَهِيد: गवाह, साक्षी।

तफ़सीर (व्याख्या):

क़ियामत (प्रलय) के दिन का ज्ञान केवल अल्लाह ही को है। उसके सिवा कोई नहीं जानता कि वह कब आएगी। यह बात उसी अल्लाह की ओर लौटाई जाती है, क्योंकि वही इसका एकमात्र जानने वाला है। यही वह सच्चाई है जिसे हर मुसलमान के दिल में बैठ जाना चाहिए — कि ग़ैब का इल्म सिर्फ़ अल्लाह के पास है।

फिर अल्लाह तआला अपनी उसी असीम ज्ञान और कुदरत की एक और निशानी बयान करता है: कोई फल अपने आवरण (खोल) से नहीं निकलता, कोई मादा गर्भवती नहीं होती और न ही वह अपने बच्चे को जन्म देती है — मगर यह सब अल्लाह के इल्म और उसकी जानकारी से होता है। पेड़ों के फल, माँ के गर्भ, बच्चे का जन्म — हर चीज़ अल्लाह के इल्म में है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। यह अल्लाह की उस महान शक्ति और ज्ञान की ओर इशारा है जो हर जगह, हर वक़्त मौजूद है।

और जब क़ियामत का दिन आएगा, तो अल्लाह तआला मुशरिकों (बहुदेववादियों) को पुकारेगा और उन्हें डाँटते हुए फटकारेगा: "कहाँ हैं मेरे साझीदार, जिन्हें तुम मेरा शरीक मानते थे और उनकी पूजा करते थे?" उस वक़्त वे सब कुछ भूलकर सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ रुजू करेंगे और कहेंगे: "हमने आपको बता दिया — हममें से कोई भी गवाह नहीं है जो यह गवाही दे कि आपका कोई शरीक है।" यानी उस दिन वे खुद अपने झूठे देवताओं से बराअत (बेज़ारी) का इज़हार करेंगे और अपनी ग़लती का इक़रार कर लेंगे, लेकिन वह इक़रार उन्हें कोई फ़ायदा नहीं देगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का इल्म हर चीज़ पर हावी है — चाहे वह छोटी हो या बड़ी, ज़ाहिर हो या पोशीदा। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी के हर पल में यह यक़ीन रखें कि अल्लाह हमें देख रहा है और वह सब कुछ जानता है। यह यक़ीन हमें गुनाहों से रोकता है और नेकी की तरफ़ बढ़ाता है। और यह भी याद रखें कि क़ियामत का दिन ज़रूर आएगा — जब हर इंसान अपने आमाल का सामना करेगा। उस दिन कोई शरीक, कोई सिफ़ारिशी, कोई बहाना काम नहीं आएगा। सिर्फ़ अल्लाह पर ईमान और नेक आमाल ही काम आएंगे। आइए, हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाएँ और उस दिन की तैयारी करें, जब हर राज़ खुल जाएगा और हर इंसान अपने किए का फल पाएगा।

🎧 सुनें

📜 आयत 45-49 — फुस्सिलत

45وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ فِيهِ ۗ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِي شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ
(और नहीं सुनते) और हम ही ने मूसा को भी किताब (तौरैत) अता की थी तो उसमें भी इसमें एख्तेलाफ किया गया और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक बात पहले न हो चुकी होती तो उनमें कब का फैसला कर दिया गया होता, और ये लोग ऐसे शक़ में पड़े हुए हैं जिसने उन्हें बेचैन कर दिया है
46مَّنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे क़े लिए और जो बुरा काम करे उसका वबाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं
47۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَاتٍ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَائِي قَالُوا آذَنَّاكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍ
क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ है (यानि वही जानता है) और बगैर उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं
48وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ
और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं
49لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
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अनुवाद — फुस्सिलत 47

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Tuesday, August 18, 2026

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