फुस्सिलत · 5/54
अनुवाद उच्चारण — फुस्सिलत
وَقَالُوا قُلُوبُنَا فِي أَكِنَّةٍ مِّمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ وَفِي آذَانِنَا وَقْرٌ وَمِن بَيْنِنَا وَبَيْنِكَ حِجَابٌ فَاعْمَلْ إِنَّنَا عَامِلُونَ ۝٥
Wa qaaloo quloobunaa feee akinnatim mimmaa tad`oonaaa ilaihi wa feee aazaaninaa waqrunw wa mim baininaa wa bainika bijaabun fa`mal innanaa `aamiloon
📖 हिंदी अर्थ
और कहने लगे जिस चीज़ की तरफ तुम हमें बुलाते हो उससे तो हमारे दिल पर्दों में हैं (कि दिल को नहीं लगती) और हमारे कानों में गिर्दानी (बहरापन है) कि कुछ सुनायी नहीं देता और हमारे तुम्हारे दरमियान एक पर्दा (हायल) है तो तुम (अपना) काम करो हम (अपना) काम करते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَكِنَّةٍ (अकिन्नह): ढक्कन, आवरण, परदे (यह "किनान" का बहुवचन है)।
  • وَقْرٌ (वक़्र): बहरापन, कानों में भारीपन, सुनने की शक्ति का समाप्त हो जाना।
  • حِجَابٌ (हिजाब): परदा, आड़, रुकावट।

विस्तृत तफ़सीर:

यह आयत उन काफ़िरों और मुशरिकों की उस जिद्दी और अहंकारपूर्ण बात का वर्णन करती है, जो उन्होंने नबी करीम ﷺ से कही थी। जब आप ﷺ उन्हें तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाते थे और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराते थे, तो वे अकड़कर कहते थे: "हमारे दिलों पर परदे पड़े हुए हैं, इसलिए जिस चीज़ की ओर तू हमें बुलाता है, वह हमारे दिलों तक पहुँचती ही नहीं। हमारे कानों में बहरापन है, इसलिए तेरी बातें हम सुनते ही नहीं। और हमारे और तेरे बीच एक परदा है, जो हमें तुझसे अलग करता है।"

यानी उन्होंने तीन चीज़ों का दावा किया: दिलों पर ग़ाफ़िल होने का परदा, कानों में बहरापन, और आपस में एक ऐसी दीवार जो उन्हें आप ﷺ की बात मानने से रोकती है। यह सब कहकर उन्होंने आप ﷺ को निराश करने की कोशिश की और कहा: "तू अपना काम कर, हम अपना काम करेंगे। तू अपने दीन पर चल, हम अपने दीन पर चलेंगे। हम तेरी बात कभी नहीं मानेंगे।"

यह उनकी सख्त ज़िद, हठधर्मिता और सत्य के प्रति अंधेपन का प्रमाण है। उन्होंने अपने दिलों और कानों को बंद कर लिया था, इसलिए हिदायत की रोशनी उनके दिलों में दाखिल नहीं हो सकती थी।


दावती पहलू और सबक:

यह आयत हमें बताती है कि हिदायत पाने के लिए सबसे पहले दिल और कान खुले होने चाहिए। जो व्यक्ति अपने दिल पर अहंकार, जिद और अंधेपन का परदा डाल ले, उसके लिए सत्य की रोशनी बेकार है। अल्लाह तआला ने कुरआन को हिदायत के लिए उतारा है, लेकिन यह हिदायत उन्हीं को मिलती है जो इसे सुनने और समझने की इच्छा रखते हैं।

हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को अल्लाह के ज़िक्र और कुरआन के लिए खुला रखें, क्योंकि जिस दिल में अहंकार और जिद होगी, वह कभी सच्चाई को क़बूल नहीं करेगा। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हम उन लोगों की तरह न बनें जो सत्य को सुनकर भी उससे मुँह मोड़ लेते हैं। बल्कि हमें हमेशा सत्य को सुनने, समझने और उस पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए।

नबी ﷺ ने इन ज़िद्दी लोगों के बावजूद अपना काम जारी रखा — दावत और अल्लाह की तरफ बुलाना। यह हमारे लिए भी सबक है कि हमें हक़ की दावत देते रहना चाहिए, चाहे लोग सुनें या न सुनें। अल्लाह तआला ही हिदायत देने वाला है, और हमारा काम सिर्फ पहुँचाना है।

🎧 सुनें

📜 आयत 3-7 — फुस्सिलत

3كِتَابٌ فُصِّلَتْ آيَاتُهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لِّقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
जिसकी आयतें समझदार लोगें के वास्ते तफ़सील से बयान कर दी गयीं हैं
4بَشِيرًا وَنَذِيرًا فَأَعْرَضَ أَكْثَرُهُمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
ं(नेको कारों को) ख़़ुशख़बरी देने वाली और (बदकारों को) डराने वाली है इस पर भी उनमें से अक्सर ने मुँह फेर लिया और वह सुनते ही नहीं
5وَقَالُوا قُلُوبُنَا فِي أَكِنَّةٍ مِّمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ وَفِي آذَانِنَا وَقْرٌ وَمِن بَيْنِنَا وَبَيْنِكَ حِجَابٌ فَاعْمَلْ إِنَّنَا عَامِلُونَ
और कहने लगे जिस चीज़ की तरफ तुम हमें बुलाते हो उससे तो हमारे दिल पर्दों में हैं (कि दिल को नहीं लगती) और हमारे कानों में गिर्दानी (बहरापन है) कि कुछ सुनायी नहीं देता और हमारे तुम्हारे दरमियान एक पर्दा (हायल) है तो तुम (अपना) काम करो हम (अपना) काम करते हैं
6قُلْ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُوحَىٰ إِلَيَّ أَنَّمَا إِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ فَاسْتَقِيمُوا إِلَيْهِ وَاسْتَغْفِرُوهُ ۗ وَوَيْلٌ لِّلْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि मैं भी बस तुम्हारा ही सा आदमी हूँ (मगर फ़र्क ये है कि) मुझ पर 'वही' आती है कि तुम्हारा माबूद बस (वही) यकता ख़ुदा है तो सीधे उसकी तरफ मुतावज्जे रहो और उसी से बख़शिश की दुआ माँगो, और मुशरेकों पर अफसोस है
7الَّذِينَ لَا يُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُم بِالْآخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ
जो ज़कात नहीं देते और आखेरत के भी क़ायल नहीं
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अनुवाद — फुस्सिलत 5

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Tuesday, August 18, 2026

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