Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أَكِنَّةٍ (अकिन्नह): ढक्कन, आवरण, परदे (यह "किनान" का बहुवचन है)।
- وَقْرٌ (वक़्र): बहरापन, कानों में भारीपन, सुनने की शक्ति का समाप्त हो जाना।
- حِجَابٌ (हिजाब): परदा, आड़, रुकावट।
विस्तृत तफ़सीर:
यह आयत उन काफ़िरों और मुशरिकों की उस जिद्दी और अहंकारपूर्ण बात का वर्णन करती है, जो उन्होंने नबी करीम ﷺ से कही थी। जब आप ﷺ उन्हें तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाते थे और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराते थे, तो वे अकड़कर कहते थे: "हमारे दिलों पर परदे पड़े हुए हैं, इसलिए जिस चीज़ की ओर तू हमें बुलाता है, वह हमारे दिलों तक पहुँचती ही नहीं। हमारे कानों में बहरापन है, इसलिए तेरी बातें हम सुनते ही नहीं। और हमारे और तेरे बीच एक परदा है, जो हमें तुझसे अलग करता है।"
यानी उन्होंने तीन चीज़ों का दावा किया: दिलों पर ग़ाफ़िल होने का परदा, कानों में बहरापन, और आपस में एक ऐसी दीवार जो उन्हें आप ﷺ की बात मानने से रोकती है। यह सब कहकर उन्होंने आप ﷺ को निराश करने की कोशिश की और कहा: "तू अपना काम कर, हम अपना काम करेंगे। तू अपने दीन पर चल, हम अपने दीन पर चलेंगे। हम तेरी बात कभी नहीं मानेंगे।"
यह उनकी सख्त ज़िद, हठधर्मिता और सत्य के प्रति अंधेपन का प्रमाण है। उन्होंने अपने दिलों और कानों को बंद कर लिया था, इसलिए हिदायत की रोशनी उनके दिलों में दाखिल नहीं हो सकती थी।
दावती पहलू और सबक:
यह आयत हमें बताती है कि हिदायत पाने के लिए सबसे पहले दिल और कान खुले होने चाहिए। जो व्यक्ति अपने दिल पर अहंकार, जिद और अंधेपन का परदा डाल ले, उसके लिए सत्य की रोशनी बेकार है। अल्लाह तआला ने कुरआन को हिदायत के लिए उतारा है, लेकिन यह हिदायत उन्हीं को मिलती है जो इसे सुनने और समझने की इच्छा रखते हैं।
हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को अल्लाह के ज़िक्र और कुरआन के लिए खुला रखें, क्योंकि जिस दिल में अहंकार और जिद होगी, वह कभी सच्चाई को क़बूल नहीं करेगा। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हम उन लोगों की तरह न बनें जो सत्य को सुनकर भी उससे मुँह मोड़ लेते हैं। बल्कि हमें हमेशा सत्य को सुनने, समझने और उस पर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए।
नबी ﷺ ने इन ज़िद्दी लोगों के बावजूद अपना काम जारी रखा — दावत और अल्लाह की तरफ बुलाना। यह हमारे लिए भी सबक है कि हमें हक़ की दावत देते रहना चाहिए, चाहे लोग सुनें या न सुनें। अल्लाह तआला ही हिदायत देने वाला है, और हमारा काम सिर्फ पहुँचाना है।
📜 आयत 3-7 — सूरा फुस्सिलत
अनुवाद — फुस्सिलत 5
सूरा फुस्सिलत आयत 5 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और कहने लगे जिस चीज़ की तरफ तुम हमें बुलाते…सूरा आयत 5/54 — सूरा फुस्सिलत فصلت (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा फुस्सिलत सुनें, सूरा फुस्सिलत अनुवाद, सूरा फुस्सिलत mp3, सूरा फुस्सिलत pdf. आयत 3–7. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा फुस्सिलत
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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