फुस्सिलत · 52/54
अनुवाद उच्चारण — फुस्सिलत
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُم بِهِ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ ۝٥٢
Qul araiaitum in kaana min `indil laahi summa kafar tum bihee man adallu mimman huwa fee shiqaqim ba`eed
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफत में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَرَأَيْتُمْ — मुझे बताओ, अपनी राय ज़ाहिर करो।
  • كَفَرْتُم — तुमने इनकार किया, झुठलाया।
  • شِقَاقٍ — विरोध, दुश्मनी, अलगाव।
  • بَعِيدٍ — दूर, गहरा (जो हद से बढ़कर हो)।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप इन झुठलाने वालों से कहिए: "ज़रा मुझे बताओ, अगर यह क़ुरआन वाक़ई अल्लाह की तरफ़ से आया हो, और फिर भी तुमने इसका इनकार किया और इसे झुठलाया, तो उस शख्स से बढ़कर गुमराह (पथभ्रष्ट) और कौन होगा जो सच्चाई से इतनी दूर की दुश्मनी और विरोध में पड़ा हो?"

यह आयत उन लोगों को सोचने पर मजबूर करती है जो क़ुरआन को नज़रअंदाज़ करते हैं या उसका मज़ाक उड़ाते हैं। अगर यह किताब सचमुच अल्लाह की तरफ़ से है—और इसकी सच्चाई के सबूत साफ़ और मज़बूत हैं—तो फिर इसका इनकार करने वाला अपनी जान को किस खतरे में डाल रहा है? वह खुद को अल्लाह की यातना और गज़ब के सामने ला खड़ा कर रहा है।

इस आयत में अल्लाह तआला ने उन लोगों की सबसे बड़ी गुमराही की तरफ इशारा किया है जो हक़ (सच्चाई) को जानने के बाद भी उससे मुँह मोड़ते हैं, और अपनी ज़िद और हठधर्मी की वजह से सच्चाई से इतनी दूर निकल जाते हैं कि उनकी गुमराही की कोई हद नहीं रहती।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें सोचने की दावत देती है कि क़ुरआन को समझकर पढ़ें, उस पर अमल करें, और उसे अपनी ज़िंदगी का रहनुमा बनाएँ। जो शख्स क़ुरआन को अपनाता है, वह सीधे रास्ते पर चलता है और दुनिया और आख़िरत की कामयाबी उसके क़दमों में होती है। और जो इसे ठुकराता है, वह अपनी ही तबाही का सामान करता है। अल्लाह हमें क़ुरआन को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 50-54 — फुस्सिलत

50وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
51وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ
(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चौड़ी दुआएँ करने लगता है
52قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُم بِهِ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ
(ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफत में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है
53سَنُرِيهِمْ آيَاتِنَا فِي الْآفَاقِ وَفِي أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ الْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
हम अनक़रीब ही अपनी (क़ुदरत) की निशानियाँ अतराफ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है
54أَلَا إِنَّهُمْ فِي مِرْيَةٍ مِّن لِّقَاءِ رَبِّهِمْ ۗ أَلَا إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُّحِيطٌ
देखो ये लोग अपने परवरदिगार के रूबरू हाज़िर होने से शक़ में (पड़े) हैं सुन रखो वह हर चीज़ पर हावी है
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अनुवाद — फुस्सिलत 52

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Tuesday, August 18, 2026

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