फुस्सिलत · 51/54
अनुवाद उच्चारण — सूरा फुस्सिलत
وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ ۝٥١
Wa izaaa an`amnaa `alal insaani a`rada wa na-aa bijaani bihee wa izaa massahush sharru fazoo du`aaa`in `areed
📖 हिंदी अर्थ
(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चौड़ी दुआएँ करने लगता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَعْرَضَ: मुँह फेर लिया, ध्यान नहीं दिया।
  • وَنَأَى بِجَانِبِهِ: अपनी तरफ़ से दूर हो गया, अकड़कर किनारे हो गया, यानी घमंड और अहंकार से अलग हट गया।
  • فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ: बहुत अधिक दुआ करने वाला, लंबी-चौड़ी दुआएँ माँगने वाला। अरबी भाषा में "लंबाई और चौड़ाई" का प्रयोग बहुतायत और अधिकता के लिए होता है।

तफ़सीर:

जब हम इंसान पर अपनी रहमत और नेमतें नाज़िल करते हैं—जैसे स्वास्थ्य, धन-दौलत, संतान, और आराम-सुख—तो वह हमारी इबादत से मुँह मोड़ लेता है, शुक्र अदा करना भूल जाता है, और घमंड में आकर अपनी तरफ़ से दूर हो जाता है। वह सच्चाई और हिदायत के सामने झुकने से इनकार करता है, और अपनी बड़ाई के ख्याल में हक़ से किनारा कर लेता है।

लेकिन जैसे ही उसे कोई मुसीबत छू जाती है—चाहे वह बीमारी हो, ग़रीबी हो, या कोई और दुख-दर्द—तो वह अपनी सारी अकड़ भूलकर हमारी तरफ़ रुजू करता है और बहुत अधिक दुआएँ माँगने लगता है। वह अपनी हर ज़रूरत और तकलीफ़ के लिए हमसे फ़रियाद करता है, जैसे उसे हमारी याद केवल मुसीबत के वक़्त ही आती है।

यह इंसान की कमज़ोर फ़ितरत है कि वह सुख के समय अपने रब को भूल जाता है और मुसीबत के समय ही उसे याद करता है। वह नेमत पाकर शुक्र नहीं करता और आज़माइश में पड़कर सब्र नहीं करता। यही उसकी नाक़िस हालत है, जबकि एक सच्चे मोमिन का तरीक़ा यह है कि वह सुख में शुक्र करे और दुख में सब्र करे, और हर हाल में अपने रब से जुड़ा रहे।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी ज़िंदगी के हर पल में अल्लाह का शुक्रगुज़ार होना चाहिए—चाहे हालात खुशहाली के हों या तकलीफ़ के। अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, वह हमें नेमतें देता है ताकि हम उसे पहचानें और उसका शुक्र अदा करें। जब हम सुख में अल्लाह को याद करते हैं, तो वह हमें और नेमतें देता है, और जब हम मुसीबत में सब्र करते हैं, तो वह हमारे दर्जे बुलंद करता है। आइए हम उन बंदों में से बनें जो हर हाल में अपने रब से जुड़े रहते हैं, क्योंकि अल्लाह उन्हीं से मुहब्बत करता है जो शुक्र करने वाले और सब्र करने वाले होते हैं। यही कामयाबी की राह है—दुनिया में भी और आख़िरत में भी।



📜 आयत 49-53 — सूरा फुस्सिलत

49لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ
इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है
50وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ
और अगर उसको कोई तकलीफ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें
51وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ
(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चौड़ी दुआएँ करने लगता है
52قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُم بِهِ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ
(ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफत में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है
53سَنُرِيهِمْ آيَاتِنَا فِي الْآفَاقِ وَفِي أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ الْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
हम अनक़रीब ही अपनी (क़ुदरत) की निशानियाँ अतराफ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है
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अनुवाद — फुस्सिलत 51

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Sunday, October 11, 2026

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