अज़-ज़ुखरुफ · 34/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِئُونَ ۝٣٤
Wa libu yootihim abwaabanw wa sururan `alaihaa yattaki`oon
📖 हिंदी अर्थ
और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते

🎧 सुनें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अबवाबन (أَبْوَابًا): दरवाज़े
  • सुरुरन (سُرُرًا): तख़्त (सिंहासन/पलंग), जिन पर बैठा जाता है
  • यत्तकीऊन (يَتَّكِئُونَ): वे टेक लगाकर बैठते हैं (आराम से)

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि अगर हम चाहते तो उन काफ़िरों को दुनिया की इतनी आसूदगी और आराम की चीज़ें देते कि उनके घरों के दरवाज़े भी चाँदी के बनवा देते, और उनके लिए चाँदी के तख़्त (पलंग) बनवाते जिन पर वे टेक लगाकर बैठते। यानी उनकी दुनियादारी को इस क़दर आलीशान बना देते कि उनके घरों की शानो-शौकत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता।

लेकिन यहाँ अल्लाह तआला यह बताना चाहते हैं कि ये सारी चीज़ें महज़ दुनिया की ज़िंदगी का थोड़ा-सा सामान हैं। यह दुनिया की माल-दौलत और आराम की चीज़ें फ़ानी (नाशवान) हैं, कुछ दिनों के लिए हैं। असली और हमेशा रहने वाला आराम, सुख-चैन और नेअमतें तो आख़िरत के लिए महफ़ूज़ रखी गई हैं।

अल्लाह तआला ने यह नेअमतें अपने डरने वाले, परहेज़गार और नेक बंदों के लिए ज़ख़ीरा (संग्रह) कर रखी हैं। यह दुनिया की चीज़ें तो बहुत ही क़द्र-ओ-क़ीमत रखती हैं, लेकिन आख़िरत की नेअमतों के मुक़ाबले में यह कुछ भी नहीं। जो लोग आज अल्लाह के हुक्मों को नहीं मानते और सिर्फ़ दुनिया की चीज़ों पर इतराते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि यह सब कुछ अस्थायी है।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयो और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की चीज़ों पर दिल मत लगाओ। चाँदी के दरवाज़े और सुनहरे तख़्त भी अगर मिल जाएँ तो यह सब कुछ कुछ दिनों की ज़िंदगी के लिए है। असली कामयाबी उसी की है जो अल्लाह की रज़ा के लिए जिए, नेकी के रास्ते पर चले और आख़िरत की तैयारी करे। अल्लाह ने अपने नेक बंदों के लिए ऐसी नेअमतें तैयार कर रखी हैं जिनका अंदाज़ा किसी ने नहीं किया, न किसी आँख ने देखा और न किसी कान ने सुना। तो आओ, हम दुनिया की चमक-दमक में खोकर आख़िरत को न भूलें, बल्कि अल्लाह की इबादत और नेक कामों से अपनी आख़िरत को संवारें।



📜 आयत 32-36 — अज़-ज़ुखरुफ

32أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
ये लोग तुम्हारे परवरदिगार की रहमत को (अपने तौर पर) बाँटते हैं हमने तो इनके दरमियान उनकी रोज़ी दुनयावी ज़िन्दगी में बाँट ही दी है और एक के दूसरे पर दर्जे बुलन्द किए हैं ताकि इनमें का एक दूसरे से ख़िदमत ले और जो माल (मतआ) ये लोग जमा करते फिरते हैं ख़ुदा की रहमत (पैग़म्बर) इससे कहीं बेहतर है
33وَلَوْلَا أَن يَكُونَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِالرَّحْمَٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ
और अगर ये बात न होती कि (आख़िर) सब लोग एक ही तरीक़े के हो जाएँगे तो हम उनके लिए जो ख़ुदा से इन्कार करते हैं उनके घरों की छतें और वही सीढ़ियाँ जिन पर वह चढ़ते हैं (उतरते हैं)
34وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِئُونَ
और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते
35وَزُخْرُفًا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَالْآخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ
ये सब साज़ो सामान, तो बस दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) साज़ो सामान हैं (जो मिट जाएँगे) और आख़ेरत (का सामान) तो तुम्हारे परवरदिगार के यहॉ ख़ास परहेज़गारों के लिए है
36وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَرِينٌ
और जो शख़्श ख़ुदा की चाह से अन्धा बनता है हम (गोया ख़ुद) उसके वास्ते शैतान मुक़र्रर कर देते हैं तो वही उसका (हर दम का) साथी है
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीRevelation
34आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 34

सूरा अज़-ज़ुखरुफ आयत 34 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर…

सूरा आयत 34/89 — अज़-ज़ुखरुफ الزخرف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अज़-ज़ुखरुफ सुनें, अज़-ज़ुखरुफ अनुवाद, अज़-ज़ुखरुफ mp3, अज़-ज़ुखरुफ pdf. आयत 32–36. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए