अज़-ज़ुखरुफ · 36/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَرِينٌ ۝٣٦
Wa mai ya`shu `an zikrir Rahmaani nuqaiyid lahoo Shaitaanan fahuwa lahoo qareen
📖 हिंदी अर्थ
और जो शख़्श ख़ुदा की चाह से अन्धा बनता है हम (गोया ख़ुद) उसके वास्ते शैतान मुक़र्रर कर देते हैं तो वही उसका (हर दम का) साथी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَعْشُ (य'शु): अर्थात आँखें बंद कर लेना, या देखते हुए भी न देखना, अर्थात जानबूझकर आँखें मूँद लेना और ध्यान न देना।
  • ذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ (ज़िक्र अर-रहमान): रहमान (अल्लाह) की याद, जिसका अर्थ यहाँ कुरआन है।
  • نُقَيِّضْ (नुक़य्यिद): हम नियुक्त कर देते हैं, या हम उस पर हावी कर देते हैं।
  • قَرِين (क़रीन): साथी, सहचर, जो हमेशा साथ रहे।

विस्तृत तफ़सीर:

यह आयत एक अत्यंत गंभीर और चेतावनी भरा संदेश देती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो व्यक्ति रहमान (दयालु अल्लाह) की याद से, यानी कुरआन से, जानबूझकर आँखें फेर लेता है और उस पर ध्यान नहीं देता, उसकी शिक्षाओं को सुनने और उन पर अमल करने से इनकार करता है, तो अल्लाह उसके इस अंधेपन और अहंकार की सज़ा के तौर पर उस पर एक शैतान को नियुक्त कर देता है। यह शैतान उसका स्थायी साथी बन जाता है, जो उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता। वह उसे हमेशा बुराई की ओर ले जाता है, उसे अच्छे कामों से रोकता है और बुरे कामों के लिए उकसाता रहता है।

यह एक ईश्वरीय कानून है कि जब कोई व्यक्ति सत्य को देखते हुए भी उससे मुँह मोड़ता है, तो अल्लाह उसे उसकी हालत पर छोड़ देता है और शैतान उसका साथी बन जाता है। यह कोई बाहरी ज़ुल्म नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के अपने कर्मों का परिणाम है। जैसे ही कोई इंसान कुरआन से दूर होता है, उसका दिल अंधकार में डूब जाता है और शैतान उस पर हावी हो जाता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सच्चाई से आगाह करती है कि कुरआन हमारी रहनुमाई के लिए उतारा गया है। जो इसे पकड़ता है, वह रोशनी में रहता है, और जो इसे छोड़ता है, वह अंधकार में भटकता है। कुरआन वह पवित्र किताब है जो हमें सही रास्ता दिखाती है, हमारे दिलों को सुकून देती है और हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर रहनुमाई करती है।

अगर हम चाहते हैं कि हमारी ज़िंदगी शैतान के हमलों से महफूज़ रहे, तो हमें कुरआन से जुड़ना होगा। इसे पढ़ना होगा, समझना होगा और उस पर अमल करना होगा। जो व्यक्ति कुरआन के साथ जुड़ा रहता है, अल्लाह उसे शैतान के शर से बचाता है। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें कुरआन को सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उस पर ग़ौर करने और उस पर अमल करने के लिए पढ़ना चाहिए।

आइए हम सब अपनी ज़िंदगी में कुरआन को केंद्र में रखें, उसकी तालीमात पर अमल करें, ताकि हम शैतान के जाल से बचे रहें और अल्लाह की रहमत और हिफ़ाज़त में रहें। यही हमारी कामयाबी और सच्ची खुशी का रास्ता है।



📜 आयत 34-38 — अज़-ज़ुखरुफ

34وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِئُونَ
और उनके घरों के दरवाज़े और वह तख्त जिन पर तकिये लगाते हैं चाँदी और सोने के बना देते
35وَزُخْرُفًا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَالْآخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ
ये सब साज़ो सामान, तो बस दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) साज़ो सामान हैं (जो मिट जाएँगे) और आख़ेरत (का सामान) तो तुम्हारे परवरदिगार के यहॉ ख़ास परहेज़गारों के लिए है
36وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَرِينٌ
और जो शख़्श ख़ुदा की चाह से अन्धा बनता है हम (गोया ख़ुद) उसके वास्ते शैतान मुक़र्रर कर देते हैं तो वही उसका (हर दम का) साथी है
37وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ السَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
और वह (शयातीन) उन लोगों को (ख़ुदा की) राह से रोकते रहते हैं बावजूद इसके वह उसी ख्याल में हैं कि वह यक़ीनी राहे रास्त पर हैं
38حَتَّىٰ إِذَا جَاءَنَا قَالَ يَا لَيْتَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ الْقَرِينُ
यहाँ तक कि जब (क़यामत में) हमारे पास आएगा तो (अपने साथी शैतान से) कहेगा काश मुझमें और तुममें पूरब पश्चिम का फ़ासला होता ग़रज़ (शैतान भी) क्या ही बुरा रफीक़ है
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीRevelation
36आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 36

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पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

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