अज़-ज़ुखरुफ · 37/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ السَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ ۝٣٧
Wa innahum la yasuddoo nahum `anis sabeeli wa yahsaboona annahum muhtadoon
📖 हिंदी अर्थ
और वह (शयातीन) उन लोगों को (ख़ुदा की) राह से रोकते रहते हैं बावजूद इसके वह उसी ख्याल में हैं कि वह यक़ीनी राहे रास्त पर हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَيَصُدُّونَهُمْ — वे (शैतान) उन्हें रोकते हैं / बाधा डालते हैं
  • عَنِ السَّبِيلِ — सीधे मार्ग से (अल्लाह के दीन से)
  • وَيَحْسَبُونَ — और वे समझते हैं / गुमान करते हैं
  • مُّهْتَدُونَ — हिदायत पाए हुए / सीधे रास्ते पर

विस्तृत तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों की दुखद स्थिति का वर्णन करती है जो अल्लाह के ज़िक्र से मुँह मोड़ लेते हैं। जब कोई व्यक्ति क़ुरआन और अल्लाह की याद से दूर हो जाता है, तो अल्लाह उस पर एक शैतान को साथी बना देता है जो उसका क़रीनी दोस्त बन जाता है। ये शैतानी साथी उन्हें सीधे रास्ते से रोकते हैं — यानी उन्हें अल्लाह की इबादत, नेक कामों और सच्चे दीन से दूर रखते हैं। वे उनके सामने बुराई को अच्छा, और अच्छाई को बुरा दिखाते हैं, ताकि वे कभी सच्चाई की ओर लौट ही न सकें।

सबसे दुखद बात यह है कि ये लोग अपनी इस गुमराही को ही हिदायत समझते हैं। उन्हें यक़ीन होता है कि वे सही रास्ते पर हैं, जबकि वास्तव में वे सबसे बड़े भटकाव में हैं। शैतान ने उनके दिलों में झूठ को इस क़दर सजाकर पेश किया होता है कि वे उसे ही सच मान बैठते हैं। इसीलिए वे न तो अपनी गलती का एहसास करते हैं और न ही तौबा करते हैं।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी हक़ीक़त से आगाह करती है — कि शैतान का सबसे बड़ा हथियार इंसान को यह भरम देना है कि वह सही रास्ते पर है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह लगातार क़ुरआन और सुन्नत से जुड़ा रहे, अपने अक़ीदे और अमल की जाँच करता रहे, और अल्लाह से हिदायत की दुआ माँगता रहे। जो लोग क़ुरआन से जुड़े रहते हैं, अल्लाह उन्हें शैतान के वस्वसों से बचाता है और उन्हें सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ देता है।

याद रखिए — सच्ची कामयाबी उसी में है कि हम अपने रब की इबादत करें, उसकी किताब को पढ़ें और समझें, और उसके रसूल ﷺ की सुन्नत पर अमल करें। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाएगा। अल्लाह हम सबको शैतान के धोखे से बचाए और हमें सच्ची हिदायत पर साबित क़दम रखे। आमीन।



📜 आयत 35-39 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

35وَزُخْرُفًا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَالْآخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ
ये सब साज़ो सामान, तो बस दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) साज़ो सामान हैं (जो मिट जाएँगे) और आख़ेरत (का सामान) तो तुम्हारे परवरदिगार के यहॉ ख़ास परहेज़गारों के लिए है
36وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَرِينٌ
और जो शख़्श ख़ुदा की चाह से अन्धा बनता है हम (गोया ख़ुद) उसके वास्ते शैतान मुक़र्रर कर देते हैं तो वही उसका (हर दम का) साथी है
37وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ السَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
और वह (शयातीन) उन लोगों को (ख़ुदा की) राह से रोकते रहते हैं बावजूद इसके वह उसी ख्याल में हैं कि वह यक़ीनी राहे रास्त पर हैं
38حَتَّىٰ إِذَا جَاءَنَا قَالَ يَا لَيْتَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ الْقَرِينُ
यहाँ तक कि जब (क़यामत में) हमारे पास आएगा तो (अपने साथी शैतान से) कहेगा काश मुझमें और तुममें पूरब पश्चिम का फ़ासला होता ग़रज़ (शैतान भी) क्या ही बुरा रफीक़ है
39وَلَن يَنفَعَكُمُ الْيَوْمَ إِذ ظَّلَمْتُمْ أَنَّكُمْ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
और जब तुम नाफरमानियाँ कर चुके तो (शयातीन के साथ) तुम्हारा अज़ाब में शरीक होना भी आज तुमको (अज़ाब की कमी में) कोई फायदा नहीं पहुँचा सकता
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
37आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 37

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Saturday, October 3, 2026

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