अल-अहकाफ · 10/35
अनुवाद उच्चारण — अल-अहकाफ
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَكَفَرْتُم بِهِ وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِّن بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَىٰ مِثْلِهِ فَآمَنَ وَاسْتَكْبَرْتُمْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ۝١٠
Qul ara`aytum in kaana min `indil laahi wa kafartum bihee wa shahida shaahidum mim Banee Israaa`eela `alaa mislihee fa aamana wastak bartum innal laaha laa yahdil qawmaz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि भला देखो तो कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की तरफ से हो और तुम उससे इन्कार कर बैठे हालॉकि (बनी इसराईल में से) एक गवाह उसके मिसल की गवाही भी दे चुका और ईमान भी ले आया और तुमने सरकशी की (तो तुम्हारे ज़ालिम होने में क्या शक़ है) बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मन्ज़िल मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَرَأَيْتُمْ — बताओ, देखो (अपनी स्थिति पर विचार करो)
  • شَاهِدٌ — गवाह (जो सत्य की गवाही दे)
  • مِن بَنِي إِسْرَائِيلَ — बनी इस्राईल (इस्राईल की संतान) में से
  • عَلَى مِثْلِهِ — उसके समान (यानी उसी के अनुरूप जो तौरात में मौजूद है)
  • اسْتَكْبَرْتُمْ — तुमने घमंड किया, अहंकार किया

तफ़सीर:

ऐ नबी! आप इन मक्का के मुशरिकों से कहिए: "ज़रा मुझे बताओ — अगर यह क़ुरआन वाक़ई अल्लाह की तरफ़ से आया हो, और तुमने इसे झुठला दिया हो, और बनी इस्राईल का एक गवाह (अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु अन्हु) इसके सच्चे होने पर गवाही दे चुका हो — क्योंकि उसने तौरात में इसकी सच्चाई के निशान पढ़े थे और वह इस पर ईमान ले आया — लेकिन तुम फिर भी घमंड में आकर ईमान लाने से इनकार कर बैठे, तो क्या यह सबसे बड़ा ज़ुल्म और सबसे सख्त कुफ़्र नहीं है?"

यानी जब एक यहूदी आलिम, जो पहले अपनी किताब तौरात पर अटल था, ने क़ुरआन की सच्चाई को पहचान कर ईमान क़बूल कर लिया, तो तुम्हारा उस पर ईमान न लाना और अहंकार करना किसी और वजह से नहीं, बल्कि सिर्फ़ हठ और ज़ुल्म से है। अल्लाह तआला ऐसे ज़ालिमों को हिदायत नहीं देता, जो जानते हुए भी सत्य को ठुकरा दें और अपने घमंड की वजह से रौशनी से मुँह मोड़ लें।

यह आयत उन लोगों के लिए एक बड़ी नसीहत है — जब सच्चाई सामने आ जाए, तो उसे क़बूल करने में देर नहीं करनी चाहिए। अल्लाह उन्हीं को हिदायत देता है जो सत्य के आगे झुक जाएँ, अपने अहंकार को छोड़ दें और अपने रब की तरफ़ लौट आएँ। याद रखिए, जो लोग सत्य को जानकर भी उसका इनकार करते हैं, वे खुद अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं — और अल्लाह ऐसे ज़ालिमों को कभी राह नहीं दिखाता।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का रास्ता इंसान को अहंकार से पाक करता है। जो इंसान अपने अहंकार को छोड़कर अल्लाह के सामने झुक जाता है, अल्लाह उसके दिल में हिदायत का नूर डाल देता है। आइए, हम सब अपने दिलों को अहंकार से पाक करें और सत्य को क़बूल करने में कभी देर न करें — क्योंकि सच्चाई को क़बूल करना ही असली कामयाबी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 8-12 — अल-अहकाफ

8أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ ۖ قُلْ إِنِ افْتَرَيْتُهُ فَلَا تَمْلِكُونَ لِي مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَا تُفِيضُونَ فِيهِ ۖ كَفَىٰ بِهِ شَهِيدًا بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ ۖ وَهُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
क्या ये कहते हैं कि इसने इसको ख़ुद गढ़ लिया है तो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर मैं इसको (अपने जी से) गढ़ लेता तो तुम ख़ुदा के सामने मेरे कुछ भी काम न आओगे जो जो बातें तुम लोग उसके बारे में करते रहते हो वह ख़ूब जानता है मेरे और तुम्हारे दरमियान वही गवाही को काफ़ी है और वही बड़ा बख्शने वाला है मेहरबान है
9قُلْ مَا كُنتُ بِدْعًا مِّنَ الرُّسُلِ وَمَا أَدْرِي مَا يُفْعَلُ بِي وَلَا بِكُمْ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰ إِلَيَّ وَمَا أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ مُّبِينٌ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं कोई नया रसूल तो आया नहीं हूँ और मैं कुछ नहीं जानता कि आइन्दा मेरे साथ क्या किया जाएगा और न (ये कि) तुम्हारे साथ क्या किया जाएगा मैं तो बस उसी का पाबन्द हूँ जो मेरे पास वही आयी है और मैं तो बस एलानिया डराने वाला हूँ
10قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ وَكَفَرْتُم بِهِ وَشَهِدَ شَاهِدٌ مِّن بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَىٰ مِثْلِهِ فَآمَنَ وَاسْتَكْبَرْتُمْ ۖ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि भला देखो तो कि अगर ये (क़ुरान) ख़ुदा की तरफ से हो और तुम उससे इन्कार कर बैठे हालॉकि (बनी इसराईल में से) एक गवाह उसके मिसल की गवाही भी दे चुका और ईमान भी ले आया और तुमने सरकशी की (तो तुम्हारे ज़ालिम होने में क्या शक़ है) बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मन्ज़िल मक़सूद तक नहीं पहुँचाता
11وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا لَوْ كَانَ خَيْرًا مَّا سَبَقُونَا إِلَيْهِ ۚ وَإِذْ لَمْ يَهْتَدُوا بِهِ فَسَيَقُولُونَ هَٰذَا إِفْكٌ قَدِيمٌ
और काफिर लोग मोमिनों के बारे में कहते हैं कि अगर ये (दीन) बेहतर होता तो ये लोग उसकी तरफ हमसे पहले न दौड़ पड़ते और जब क़ुरान के ज़रिए से उनकी हिदायत न हुई तो अब भी कहेंगे ये तो एक क़दीमी झूठ है
12وَمِن قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَىٰ إِمَامًا وَرَحْمَةً ۚ وَهَٰذَا كِتَابٌ مُّصَدِّقٌ لِّسَانًا عَرَبِيًّا لِّيُنذِرَ الَّذِينَ ظَلَمُوا وَبُشْرَىٰ لِلْمُحْسِنِينَ
और इसके क़ब्ल मूसा की किताब पेशवा और (सरासर) रहमत थी और ये (क़ुरान) वह किताब है जो अरबी ज़बान में (उसकी) तसदीक़ करती है ताकि (इसके ज़रिए से) ज़ालिमों को डराए और नेकी कारों के लिए (अज़सरतापा) ख़ुशख़बरी है
अल-अहकाफकुरान सूची
35आयत
मक्कीRevelation
10आयत

अनुवाद — अल-अहकाफ 10

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Tuesday, August 18, 2026

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