अल-अहकाफ · 6/35
अनुवाद उच्चारण — अल-अहकाफ
وَإِذَا حُشِرَ النَّاسُ كَانُوا لَهُمْ أَعْدَاءً وَكَانُوا بِعِبَادَتِهِمْ كَافِرِينَ ۝٦
Wa izaa hushiran naasu kaanoo lahum a`daaa`anw wa kaanoo bi`ibaadatihim kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और जब लोग (क़यामत) में जमा किये जाएगें तो वह (माबूद) उनके दुशमन हो जाएंगे और उनकी परसतिश से इन्कार करेंगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حُشِرَ (हुशिरा): एकत्र किया जाना, इकट्ठा किया जाना।
  • أَعْدَاءً (अ'दाअन): शत्रु, दुश्मन।
  • كَافِرِينَ (काफ़िरीन): इनकार करने वाले, अस्वीकार करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की दुर्दशा का वर्णन करती है जो अल्लाह को छोड़कर मूर्तियों, पत्थरों या अन्य प्राणियों की पूजा करते हैं। जब क़ियामत का दिन आएगा और सभी लोगों को हश्र के मैदान में एकत्र किया जाएगा, तो वे मूर्तियाँ और झूठे देवता जिन्हें ये लोग दुनिया में पुकारते थे, उनके सबसे बड़े दुश्मन बन जाएँगे। वे अपने पूजने वालों को लानत देंगी, उनसे बराअत (अलगाव) जताएँगी और साफ़ इनकार कर देंगी कि उन्हें इनकी पूजा के बारे में कोई जानकारी थी।

यहाँ तक कि वे मूर्तियाँ अपने पूजने वालों के खिलाफ़ गवाही देंगी और कहेंगी कि हम तो बेख़बर थे, ये लोग हमारी पूजा करते थे, हमें इसका ज्ञान तक नहीं था। यह उन लोगों के लिए सबसे बड़ी रुसवाई और शर्मिंदगी का क्षण होगा।

इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत करना कितनी बड़ी भूल है। दुनिया में ये मूर्तियाँ और झूठे देवता न तो कोई लाभ पहुँचा सकते हैं और न ही कोई हानि। आख़िरत में तो वे अपने पूजने वालों के दुश्मन बन जाएँगे।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिर्फ़ एक ही सच्चे मालिक की इबादत की ओर बुलाती है। वह अल्लाह जो रहमान और रहीम है, जो हमारी हर पुकार सुनता है, हर दुआ का जवाब देता है। उसकी इबादत में ही हमारी सच्ची कामयाबी है। जो लोग उसे छोड़कर दूसरों की ओर मुड़ते हैं, वे दुनिया और आख़िरत दोनों में नुक़सान उठाते हैं।

अल्लाह हमें सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे और हमें शिर्क से बचाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 4-8 — अल-अहकाफ

4قُلْ أَرَأَيْتُم مَّا تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ أَرُونِي مَاذَا خَلَقُوا مِنَ الْأَرْضِ أَمْ لَهُمْ شِرْكٌ فِي السَّمَاوَاتِ ۖ ائْتُونِي بِكِتَابٍ مِّن قَبْلِ هَٰذَا أَوْ أَثَارَةٍ مِّنْ عِلْمٍ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
(ऐ रसूल) तुम पूछो कि ख़ुदा को छोड़ कर जिनकी तुम इबादत करते हो क्या तुमने उनको देखा है मुझे भी तो दिखाओ कि उन लोगों ने ज़मीन में क्या चीज़े पैदा की हैं या आसमानों (के बनाने) में उनकी शिरकत है तो अगर तुम सच्चे हो तो उससे पहले की कोई किताब (या अगलों के) इल्म का बक़िया हो तो मेरे सामने पेश करो
5وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّن يَدْعُو مِن دُونِ اللَّهِ مَن لَّا يَسْتَجِيبُ لَهُ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَهُمْ عَن دُعَائِهِمْ غَافِلُونَ
और उस शख़्श से बढ़ कर कौन गुमराह हो सकता है जो ख़ुदा के सिवा ऐसे शख़्श को पुकारे जो उसे क़यामत तक जवाब ही न दे और उनको उनके पुकारने की ख़बरें तक न हों
6وَإِذَا حُشِرَ النَّاسُ كَانُوا لَهُمْ أَعْدَاءً وَكَانُوا بِعِبَادَتِهِمْ كَافِرِينَ
और जब लोग (क़यामत) में जमा किये जाएगें तो वह (माबूद) उनके दुशमन हो जाएंगे और उनकी परसतिश से इन्कार करेंगे
7وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُمْ هَٰذَا سِحْرٌ مُّبِينٌ
और जब हमारी खुली खुली आयतें उनके सामने पढ़ी जाती हैं तो जो लोग काफिर हैं हक़ के बारे में जब उनके पास आ चुका तो कहते हैं ये तो सरीही जादू है
8أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ ۖ قُلْ إِنِ افْتَرَيْتُهُ فَلَا تَمْلِكُونَ لِي مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَا تُفِيضُونَ فِيهِ ۖ كَفَىٰ بِهِ شَهِيدًا بَيْنِي وَبَيْنَكُمْ ۖ وَهُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
क्या ये कहते हैं कि इसने इसको ख़ुद गढ़ लिया है तो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगर मैं इसको (अपने जी से) गढ़ लेता तो तुम ख़ुदा के सामने मेरे कुछ भी काम न आओगे जो जो बातें तुम लोग उसके बारे में करते रहते हो वह ख़ूब जानता है मेरे और तुम्हारे दरमियान वही गवाही को काफ़ी है और वही बड़ा बख्शने वाला है मेहरबान है
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अनुवाद — अल-अहकाफ 6

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Tuesday, August 18, 2026

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