अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- حَسْبُنَا: हमारे लिए काफी है।
- وَجَدْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا: हमने अपने बाप-दादाओं को जिस पर पाया (यानी जिस रास्ते और तरीके पर चलते देखा)।
- لَا يَعْلَمُونَ شَيْئًا: वे कुछ भी नहीं जानते थे (न सही समझ रखते थे, न सच्चाई का ज्ञान)।
- وَلَا يَهْتَدُونَ: और न ही सीधे मार्ग की ओर उन्हें हिदायत (मार्गदर्शन) प्राप्त थी।
तफसीर (व्याख्या):
जब इन काफिरों और मुशरिकों से कहा जाता है कि "आओ, उस किताब की ओर जो अल्लाह ने उतारी है, और रसूल ﷺ की सुन्नत की ओर, ताकि तुम हलाल और हराम को सीखो और समझो," तो वे जवाब देते हैं: "हमारे लिए वही काफी है जो हमने अपने बाप-दादाओं को करते हुए पाया है।" यानी वे अपने पूर्वजों के अंधानुकरण (blind following) को ही अपना धर्म और मार्ग मानते हैं, और अल्लाह के हुक्म और रसूल की शिक्षा को सुनने से इनकार कर देते हैं।
अल्लाह तआला इस पर उन्हें फटकारते हुए फरमाता है: "क्या वे अपने बाप-दादाओं की तक़लीद (अनुकरण) उस समय भी करेंगे, जबकि उनके बाप-दादा न तो कुछ जानते थे और न ही सीधे रास्ते पर थे?" यानी अगर पूर्वज ज्ञान से खाली हों, सत्य को न समझते हों, और हिदायत से महरूम हों, तो उनकी पैरवी करना कितनी बड़ी भूल और गुमराही है। ऐसे लोगों की नकल करने वाला उनसे भी बदतर होता है, क्योंकि वह जानबूझकर अंधेरे में चलने वालों का अनुसरण कर रहा है।
यह आयत उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो सच्चाई को छोड़कर केवल रिवाजों, परंपराओं और पुरखों की चाल-चलन को ही अपना धर्म बना लेते हैं, चाहे वह रास्ता कितना ही गलत और अंधकारमय क्यों न हो।
फायदे और सबक:
- अंधानुकरण (blind following) की मुखालफत: इस आयत से सीख मिलती है कि किसी भी इंसान का अनुसरण तभी जायज़ है जब वह इल्म (ज्ञान) और हिदायत पर हो। बिना ज्ञान और सच्चाई के केवल इसलिए किसी की पैरवी करना कि "हमारे बुज़ुर्ग ऐसा करते थे," बिल्कुल गलत है।
- हक़ (सत्य) को तरजीह देना: हमें हमेशा अल्लाह की उतारी हुई किताब और रसूल ﷺ की सुन्नत को सबसे ऊपर रखना चाहिए। अगर हमारे समाज या खानदान का कोई रिवाज़ कुरान और सुन्नत के खिलाफ हो, तो उसे छोड़ना ही हमारा फर्ज है।
- तहक़ीक़ और समझ की अहमियत: इंसान को चाहिए कि वह अपने दीन को समझकर अपनाए, न कि अंधी नकल करके। अल्लाह ने इंसान को अक्ल दी है ताकि वह सच्चाई को पहचाने और उस पर अमल करे।
- पूर्वजों की गलतियों से बचना: यह आयत हमें सिखाती है कि अगर हमारे बुज़ुर्ग किसी गलत रास्ते पर थे, तो उनकी मुहब्बत हमें उनकी गलतियों पर अड़े रहने का हक नहीं देती। सच्चाई की राह हमेशा बेहतर है, चाहे वह हमारे पूर्वजों के रास्ते से अलग ही क्यों न हो।
- दावत का अंदाज़: इस आयत में दावत का वह तरीका बताया गया है कि लोगों को "अल्लाह की किताब और रसूल की सुन्नत" की ओर बुलाया जाए, न कि किसी व्यक्ति या फिरके की ओर। यही सबसे सही और कामयाब दावत है।
📜 आयत 102-106 — अल-माइदा
अनुवाद — अल-माइदा 104
सूरा अल-माइदा आयत 104 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और जब उनसे कहा जाता है कि जो (क़ुरान) ख़ुदा…सूरा आयत 104/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 102–106. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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