अल-हदीद · 14/29
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हदीद
يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَارْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ الْأَمَانِيُّ حَتَّىٰ جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ وَغَرَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ ۝١٤
Yunaadoonahum alam nakum ma`akum qaaloo balaa wa laakinnakum fatantum anfusakum wa tarabbastum wartabtum wa gharratkumul amaaniyyu hatta jaaa`a amrul laahi wa gharrakum billaahil gharoor
📖 हिंदी अर्थ
(क्यों भाई) क्या हम कभी तुम्हारे साथ न थे तो मोमिनीन कहेंगे थे तो ज़रूर मगर तुम ने तो ख़ुद अपने आपको बला में डाला और (हमारे हक़ में गर्दिशों के) मुन्तज़िर हैं और (दीन में) शक़ किया किए और तुम्हें (तुम्हारी) तमन्नाओं ने धोखे में रखा यहाँ तक कि ख़ुदा का हुक्म आ पहुँचा और एक बड़े दग़ाबाज़ (शैतान) ने ख़ुदा के बारे में तुमको फ़रेब दिया

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَتَنْتُمْ أَنفُسَكُمْ: तुमने अपने आपको नष्ट किया (नफ़ाक़ और गुनाहों के कारण)।
  • وَتَرَبَّصْتُمْ: तुमने (मुसलमानों के लिए) बुरे वक़्त का इंतज़ार किया।
  • وَارْتَبْتُمْ: तुमने (अल्लाह के वादे और क़ियामत पर) शक किया।
  • الْأَمَانِيُّ: झूठी उम्मीदें और ख़्वाहिशें।
  • الْغَرُورُ: शैतान (जो इंसान को धोखा देता है)।

तफ़सीर:

क़ियामत के दिन जब मुनाफ़िक़ (दिखावटी मुसलमान) ईमानवालों से अलग कर दिए जाएँगे, तो वे उन्हें पुकारकर कहेंगे: "क्या हम दुनिया में तुम्हारे साथ नहीं थे? हम भी तो तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़ते थे, रोज़ा रखते थे और इस्लाम के ज़ाहिरी अहकाम पर अमल करते थे!" तब ईमानवाले जवाब देंगे: "हाँ, तुम ज़ाहिरी तौर पर हमारे साथ थे, लेकिन असल में तुमने अपने नफ़ाक़ और गुनाहों से अपनी रूहों को तबाह कर लिया। तुम मुसलमानों की मुसीबत और नुक़सान का इंतज़ार करते रहे, अल्लाह की मदद और आख़िरत के दिन पर शक करते रहे, और झूठी उम्मीदों ने तुम्हें धोखे में रखा। यहाँ तक कि मौत आ गई और तुम उसी हालत में मरे। आख़िरकार शैतान ने तुम्हें अल्लाह के बारे में धोखा दिया — उसने तुम्हें यक़ीन दिलाया कि अल्लाह माफ़ कर देगा, उसकी पकड़ सख्त नहीं होगी, और तुम बच जाओगे।"

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के सामने सिर्फ़ ज़ाहिरी अमल नहीं, बल्कि दिल का ईमान और सच्ची नीयत क़बूल है। हमें चाहिए कि अपने दिलों को नफ़ाक़, शक और झूठी उम्मीदों से पाक रखें, और शैतान के धोखे से बचने के लिए अल्लाह की रहमत और उसके अज़ाब दोनों पर यक़ीन रखें। याद रखें, मौत से पहले तौबा कर लेना ही सबसे बड़ी कामयाबी है, क्योंकि मौत के बाद कोई मौका नहीं मिलेगा। अल्लाह हमें सच्चे दिल से ईमान लाने और शैतान के धोखे से बचने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 12-16 — सूरा अल-हदीद

12يَوْمَ تَرَى الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ يَسْعَىٰ نُورُهُم بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَبِأَيْمَانِهِم بُشْرَاكُمُ الْيَوْمَ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
जिस दिन तुम मोमिन मर्द और मोमिन औरतों को देखोगे कि उन (के ईमान) का नूर उनके आगे आगे और दाहिने तरफ चल रहा होगा तो उनसे कहा (जाएगा) तुमको बशारत हो कि आज तुम्हारे लिए वह बाग़ है जिनके नीचे नहरें जारी हैं जिनमें हमेशा रहोगे यही तो बड़ी कामयाबी है
13يَوْمَ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ لِلَّذِينَ آمَنُوا انظُرُونَا نَقْتَبِسْ مِن نُّورِكُمْ قِيلَ ارْجِعُوا وَرَاءَكُمْ فَالْتَمِسُوا نُورًا فَضُرِبَ بَيْنَهُم بِسُورٍ لَّهُ بَابٌ بَاطِنُهُ فِيهِ الرَّحْمَةُ وَظَاهِرُهُ مِن قِبَلِهِ الْعَذَابُ
उस दिन मुनाफ़िक मर्द और मुनाफ़िक औरतें ईमानदारों से कहेंगे एक नज़र (शफ़क्क़त) हमारी तरफ़ भी करो कि हम भी तुम्हारे नूर से कुछ रौशनी हासिल करें तो (उनसे) कहा जाएगा कि तुम अपने पीछे (दुनिया में) लौट जाओ और (वही) किसी और नूर की तलाश करो फिर उनके बीच में एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी जिसमें एक दरवाज़ा होगा (और) उसके अन्दर की जानिब तो रहमत है और बाहर की तरफ अज़ाब तो मुनाफ़िक़ीन मोमिनीन से पुकार कर कहेंगे
14يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَارْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ الْأَمَانِيُّ حَتَّىٰ جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ وَغَرَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
(क्यों भाई) क्या हम कभी तुम्हारे साथ न थे तो मोमिनीन कहेंगे थे तो ज़रूर मगर तुम ने तो ख़ुद अपने आपको बला में डाला और (हमारे हक़ में गर्दिशों के) मुन्तज़िर हैं और (दीन में) शक़ किया किए और तुम्हें (तुम्हारी) तमन्नाओं ने धोखे में रखा यहाँ तक कि ख़ुदा का हुक्म आ पहुँचा और एक बड़े दग़ाबाज़ (शैतान) ने ख़ुदा के बारे में तुमको फ़रेब दिया
15فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
तो आज न तो तुमसे कोई मुआवज़ा लिया जाएगा और न काफ़िरों से तुम सबका ठिकाना (बस) जहन्नुम है वही तुम्हारे वास्ते सज़ावार है और (क्या) बुरी जगह है
16۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
क्या ईमानदारों के लिए अभी तक इसका वक्त नहीं आया कि ख़ुदा की याद और क़ुरान के लिए जो (ख़ुदा की तरफ से) नाज़िल हुआ है उनके दिल नरम हों और वह उन लोगों के से न हो जाएँ जिनको उन से पहले किताब (तौरेत, इन्जील) दी गयी थी तो (जब) एक ज़माना दराज़ गुज़र गया तो उनके दिल सख्त हो गए और इनमें से बहुतेरे बदकार हैं
अल-हदीदकुरान सूची
29आयत
मदनीअवतरण स्थान
14आयत

अनुवाद — अल-हदीद 14

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Friday, October 2, 2026

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