अल-मुजादिला · 4/22
अनुवाद उच्चारण — अल-मुजादिला
فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۖ فَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ فَإِطْعَامُ سِتِّينَ مِسْكِينًا ۚ ذَٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ ۗ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝٤
Famal lam yajid fa siyaamu shahraini mutataabi`ayni min qabli any-yatamaaassaa famal lam yastati` fa-it`aamu sitteena miskeena; zaalika litu`minoo billaahi wa rasoolih`wa tilka hudoodul laah; wa lilkaafireena `azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
फिर जिसको ग़ुलाम न मिले तो दोनों की मुक़ारबत के क़ब्ल दो महीने के पै दर पै रोज़े रखें और जिसको इसकी भी क़ुदरत न हो साठ मोहताजों को खाना खिलाना फर्ज़ है ये (हुक्म इसलिए है) ताकि तुम ख़ुदा और उसके रसूल की (पैरवी) तसदीक़ करो और ये ख़ुदा की मुक़र्रर हदें हैं और काफ़िरों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَمَن لَّمْ يَجِدْ: जिसे गुलाम (दास) न मिले या उसे आज़ाद करने की सामर्थ्य न हो।
  • مُتَتَابِعَيْنِ: लगातार दो महीने, बीच में कोई दिन छूटे बिना।
  • يَتَمَاسَّا: पति-पत्नी का एक-दूसरे से शारीरिक संबंध बनाना।
  • حُدُودُ اللَّهِ: अल्लाह की निर्धारित की हुई सीमाएँ और आदेश।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने ज़िहार (ظهار) के बारे में जो आदेश दिए हैं, उन्हीं को आगे बढ़ाते हुए फ़रमाया कि जिस व्यक्ति को गुलाम आज़ाद करने की सामर्थ्य न हो, उस पर अनिवार्य है कि वह लगातार दो महीने रोज़े रखे, और यह रोज़े उस समय से पहले पूरे करने होंगे जब पति-पत्नी एक-दूसरे से शारीरिक संबंध बनाएं। यानी जब तक यह कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) पूरा न हो जाए, तब तक पति के लिए अपनी पत्नी से संबंध बनाना जायज़ नहीं है। और अगर कोई व्यक्ति लगातार दो महीने रोज़े रखने की ताक़त भी न रखता हो — जैसे बीमारी, बुढ़ापा या कोई और वैध कारण हो — तो उसे चाहिए कि साठ मस्कीनों (ग़रीबों) को खाना खिलाए, इतना कि वे पेट भरकर खा सकें।

यह सारा नियम अल्लाह ने इसलिए बनाया है ताकि तुम लोग अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर सच्चा ईमान लाओ, उसके आदेशों को अपने ऊपर लागू करो, और उन पुरानी जाहिलियत की बुरी रस्मों को छोड़ दो जो इस्लाम से पहले रिवाज थीं। ये सारी हदें (सीमाएँ) अल्लाह की निर्धारित की हुई हैं, इनसे आगे बढ़ना या इनमें कोई कमी-बेशी करना जायज़ नहीं है। और जो लोग इन आदेशों को नहीं मानते, उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम एक आसान और व्यावहारिक दीन है। अल्लाह ने हर हालत में रास्ता निकाला है — जिसके पास सामर्थ्य हो वह गुलाम आज़ाद करे, न हो तो रोज़े रखे, और यह भी मुमकिन न हो तो साठ ग़रीबों को खाना खिलाए। यह इस बात की सबसे बड़ी गवाही है कि अल्लाह अपने बंदों पर बोझ नहीं डालता। साथ ही, यह आयत हमें अल्लाह की हदों की पाबंदी की तालीम देती है — कि हम अपनी ज़िंदगी में अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलें, क्योंकि इन्हीं हदों में हमारी भलाई और कामयाबी है। जो इनसे दूर रहेगा, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में नुक़सान उठाएगा। आओ, हम अल्लाह के आदेशों को अपनी ज़िंदगी में अपनाएँ और उसकी रहमत के हक़दार बनें।

🎧 सुनें

📜 आयत 2-6 — अल-मुजादिला

2الَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِنكُم مِّن نِّسَائِهِم مَّا هُنَّ أُمَّهَاتِهِمْ ۖ إِنْ أُمَّهَاتُهُمْ إِلَّا اللَّائِي وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنكَرًا مِّنَ الْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ
तुम में से जो लोग अपनी बीवियों के साथ ज़हार करते हैं अपनी बीवी को माँ कहते हैं वह कुछ उनकी माएँ नहीं (हो जातीं) उनकी माएँ तो बस वही हैं जो उनको जनती हैं और वह बेशक एक नामाक़ूल और झूठी बात कहते हैं और ख़ुदा बेशक माफ करने वाला और बड़ा बख्शने वाला है
3وَالَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِن نِّسَائِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مِّن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۚ ذَٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِهِ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
और जो लोग अपनी बीवियों से ज़हार कर बैठे फिर अपनी बात वापस लें तो दोनों के हमबिस्तर होने से पहले (कफ्फ़ारे में) एक ग़ुलाम का आज़ाद करना (ज़रूरी) है उसकी तुमको नसीहत की जाती है और तुम जो कुछ भी करते हो (ख़ुदा) उससे आगाह है
4فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۖ فَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ فَإِطْعَامُ سِتِّينَ مِسْكِينًا ۚ ذَٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ ۗ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ
फिर जिसको ग़ुलाम न मिले तो दोनों की मुक़ारबत के क़ब्ल दो महीने के पै दर पै रोज़े रखें और जिसको इसकी भी क़ुदरत न हो साठ मोहताजों को खाना खिलाना फर्ज़ है ये (हुक्म इसलिए है) ताकि तुम ख़ुदा और उसके रसूल की (पैरवी) तसदीक़ करो और ये ख़ुदा की मुक़र्रर हदें हैं और काफ़िरों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
5إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ كُبِتُوا كَمَا كُبِتَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَقَدْ أَنزَلْنَا آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ
बेशक जो लोग ख़ुदा की और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त करते हैं वह (उसी तरह) ज़लील किए जाएँगे जिस तरह उनके पहले लोग किए जा चुके हैं और हम तो अपनी साफ़ और सरीही आयतें नाज़िल कर चुके और काफिरों के लिए ज़लील करने वाला अज़ाब है
6يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا ۚ أَحْصَاهُ اللَّهُ وَنَسُوهُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
जिस दिन ख़ुदा उन सबको दोबारा उठाएगा तो उनके आमाल से उनको आगाह कर देगा ये लोग (अगरचे) उनको भूल गये हैं मगर ख़ुदा ने उनको याद रखा है और ख़ुदा तो हर चीज़ का गवाह है
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Tuesday, August 18, 2026

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